भारतकोश
भामती (वाचस्पति मिश्र - ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य चतुःसूत्री हिन्दी व्याख्या)

भामती (वाचस्पति मिश्र - ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य चतुःसूत्री हिन्दी व्याख्या)

Bhamati of Vachaspati Mishra Hindi

वाचस्पति मिश्र (व्याख्याकार: स्वामी योगेन्द्रानन्द) द्वारा

स्रोत: Brahma Sutra Shankara Bhashya with Vachaspati Mishra Bhamati and Hindi Commentary (उद्गम)

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४७४ ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम् [ अ. १ पा. ४ सू. ८

( २ चमसाधिकरणम् । सू० ८—१० ) चमसवदविशेषात् ॥ ८ ॥

पुनरपि प्रधानवाद्यशब्दत्वं प्रधानस्यासिद्धमित्याह । कस्मात् ? मन्त्रवर्णात् — ‘अजामेकां लोहितशुक्लकृष्णां बह्वीः प्रजाः सृजमानां सरूपाः । अजो ह्येको जुषमाणोऽनुशेते जहात्येनां भुक्तभोगामजोऽन्यः’ (श्वे० ४।५) इति । अत्र हि मन्त्रे लोहितशुक्लकृष्णशब्दै रजःसत्त्वतमांस्यभिधीयन्ते । लोहितं रजः, रञ्जनात्मकत्वात् । शुक्लं सत्त्वं, प्रकाशात्मकत्वात् । कृष्णं तमः, आवरणात्मकत्वात् । तेषां साम्यावस्थाऽवयवधर्मैरव्यपदिश्यते लोहितशुक्लकृष्णेति । न जायत इति चाजा स्यात् , ‘मूलप्रकृतिरविकृतिः’


भामती

अजाशब्दो यद्यपि छागायां रूढस्तथाप्यध्यात्मविद्याधिकारान्न तत्र वर्तितुमर्हति । तस्माद्रूढेरसम्भवाद्योगेन वर्तयितव्यः । तत्र किं स्वतन्त्रं प्रधानमनेन मन्त्रवर्णेनानूद्यतामुत पारमेश्वरी मायाशक्तिस्तेजोऽबन्नव्याक्रियाकारणमुच्यताम् ? किं तावत् प्राप्तं ? प्रधानमेवेति । तथाहि—यादृशं प्रधानं सांख्यैः स्मर्यते तादृशमेवास्मिन्मन्त्रेऽनानतिरिक्तं प्रतीयते, सा हि प्रधानलक्षणा प्रकृतिर्न जायत इत्यजा च एका च लोहितशुक्लकृष्णा च । यद्यपि लोहितत्वादयो वर्णा न रजःप्रभृतिषु सन्ति, तथापि लोहितं कुसुम्भादि रञ्जयति


भामती-व्याख्या

इस प्रकार सांख्य-सम्मत महत् पदार्थ ही सत् या अर्थक्रियाकारी सिद्ध होता है। यह सत्ता या सत्त्व इस लिए कहलाता है कि वह प्रकृतिगत सत्त्वगुण का विकार है ] । किन्तु “बुद्धेरात्मा महान् परः” ( कठ० १।३।१० ) इत्यादि श्रुति-वाक्यों में 'महत्' पद का अर्थ बुद्धि नहीं अपि तु चैतन्य पुरुष है, क्योंकि 'आत्म' शब्द के प्रयोग का सामञ्जस्य जडात्मिका बुद्धि में सम्भव नहीं ॥ ७ ॥

विषय“अजमेकां लोहितशुक्लकृष्णाम्” ( श्वेता० ४।४ ) इस श्रुति का 'अजा' शब्द विचारणीय है।

संशय—उक्त श्रुति में प्रयुक्त 'अजा' को लेकर सन्देह होता है कि यद्यपि 'अजा' शब्द लोक-वेद-व्यवहारतः छाग ( बकरी ) में रूढ है [ लोक और वेद में बकरी के लिए यद्यपि ङीषन्त 'छागी' शब्द का प्रयोग अधिक हुआ है, तथापि शांखायन ( ७।१० ) और शतपथ ( ३।३।३।४ ) आदि ब्राह्मण ग्रन्थों में टाबन्त 'छागा' शब्द भी प्रयुक्त हुआ है ] । तथापि अध्यात्मविद्या का प्रकरण होने के कारण यहाँ 'अजा' शब्द छागी का बोधक नहीं हो सकता, अतः रूढ़ि का परित्याग कर एवं यौगिक शक्ति का सहारा लेकर किसी अर्थ का आविष्कार करना होगा। तब 'न जायते इत्यजा'—ऐसी व्युत्पत्ति के अनुसार 'अजा' शब्द के द्वारा सांख्यसम्मत प्रधान ( प्रकृति ) का ग्रहण किया जाय ? अथवा तेज, जल और पृथिवी की संवलितावस्थारूप पारमेश्वरी शक्ति ( माया ) ?

पूर्वपक्ष—यहाँ 'अजा' शब्द से सांख्य-सम्मत प्रधान तत्त्व का ही ग्रहण करना चाहिए, क्योंकि सांख्याचार्यों ने प्रधान तत्त्व का जो स्वरूप अपने दर्शन में अभिहित किया है, ज्यों-का-त्यों उक्त श्रुति में प्रतीत होता है। वह प्रधानरूप प्रकृति अनादि है, उत्पन्न नहीं होती, अतः अजा ( जन्म-रहिता ) कही जाती है, एक है और लोहितशुक्लकृष्णरूपा है। यद्यपि रजोगुणादि में लोहितत्वादि ( रक्तत्वादि वर्ण नहीं होते, तथापि जैसे कुसुम्भ ( वर्रें का फूल ) आदि स्वयं रक्त ( लाल ) होकर अपने सम्पर्क में आनेवाले वस्त्रादि को अभिरञ्जित कर ( लाल बना ) देते हैं, वैसे ही रजोगुणादि अपने सम्बन्धित कार्यादि को रजोगुणात्मक बना

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