भामती (वाचस्पति मिश्र - ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य चतुःसूत्री हिन्दी व्याख्या)
Bhamati of Vachaspati Mishra Hindi
वाचस्पति मिश्र (व्याख्याकार: स्वामी योगेन्द्रानन्द) द्वारा
स्रोत: Brahma Sutra Shankara Bhashya with Vachaspati Mishra Bhamati and Hindi Commentary (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंअजांशब्दस्य मायापरत्वम् ] हिन्दीसहितभामतीसंवलितम् ४७५
इत्यभ्युपगमात् । नन्वजाशब्दश्छागायां रूढः । बाढम्, सा तु रूढिरिह नाश्रयितुं शक्या, विद्याप्रकरणात् । सा च बह्वीः प्रजास्त्रैगुण्यान्विता जनयति । तां प्रकृतिमन
भामती
रजोऽपि रञ्जयतीति लोहितम् । एवं प्रसन्नं पाथः शुक्लं सत्त्वमपि प्रसन्नमिति शुक्लम् । एवमावरकं मेघादि कृष्णं तमोऽप्यावरकमिति कृष्णम् । परेणापि नाव्याकृतस्य स्वरूपेण लोहितत्वादियोग आस्थेयः, किन्तु तत्कार्यस्य तेजोऽबन्नस्य रोहितत्वादि कारण उपचरणीयम् । कार्यसारूप्येण वा कारणे कल्पनीयं तदस्माकमपि तुल्यम् । 'अजो ह्येको जुषमाणोऽनुशेते जहात्येनां भुक्तभोगामजोऽन्यः' इति स्वात्मभेदश्रवणात् सांख्यस्मृतेरेवात्र मन्त्रवर्णे प्रत्यभिज्ञानं न त्वव्याकृतप्रक्रियायाः । तस्यामेकात्म्याभ्युपगमेनात्मभेदाभावात् । तस्मात् स्वतन्त्रं प्रधानं नाशब्दमिति प्राप्तम् । ॐ तेषां साम्यावस्था अवयवधर्मैरिति ॐ । अवयवाः प्रधानस्यैकस्य सत्त्वरजस्तमांसि तेषां धर्मा लोहितत्वादयस्तैरिति । ॐ प्रजास्त्रैगुण्यान्विताः इति ॐ । सुखदुःखमोहात्मिकाः । तथाहि — मैत्रदारेषु नर्मदायां मैत्रस्य सुखं तत् कस्य हेतोस्तं प्रति सत्त्वसमुद्भू-
भामती-व्याख्या
देते हैं। जैसे स्वच्छ जल शुक्ल कहलाता है, वैसे सत्त्वगुण भी स्वच्छ होने से शुक्ल कहा जाता है। इसी प्रकार प्रकाश के अवरोधक मेघादि को कृष्ण कहते हैं, तमोगुण भी सत्त्वादि का अवरोधक है, अतः कृष्ण कहा गया है । रजोगुणादि में लोहितत्वादि उपचार केवल सांख्याचार्यों को ही नहीं करना पड़ता, अपि तु वेदान्तियों को भी अपनी अव्याकृत माया में लोहितत्वादि का उपचार मानना पड़ता है, क्योंकि माया में भी स्वरूपतः लोहितत्वादि का योग सम्भव नहीं, अपि तु उसके कार्यभूत तेज, जल और पृथिवी में वर्तमान लोहितत्वादि मायारूप कारण में उपचरित होते हैं। अथवा तेज आदि रूप कार्य (जन्य) पदार्थों में लोहितत्वादि को देखकर उनके जनकीभूत प्रधानतत्त्व में वस्तुतः लोहितत्वादि के सत्त्व की कल्पना (अनुमिति) हो जाती है; क्योंकि उपादान कारण और कार्य का वेदान्त-मत में सारूप्य माना जाता है। यह सब कुछ हम सांख्यवादी भी कर सकते हैं। उक्त श्रुति में वेदान्त-सिद्धान्त की प्रत्यभिज्ञा नहीं होती, क्योंकि वेदान्ती 'आत्मा' एक ही मानते हैं, किन्तु उक्त श्रुति में बद्ध और मुक्त आत्माओं का भेद (आत्मनानात्व) प्रतिपादित है—"अजो ह्येको जुषमाणोऽनुशेते जहात्येनां भुक्तभोगामजोऽन्यः" (श्वेता० ४।५) । अतः उक्त श्रुति में सांख्य-दर्शन का ही प्रत्यभिज्ञान होता है, वेदान्त-सम्मत अव्याकृतवाद का नहीं। फलतः स्वतन्त्र (किसी चेतन तत्त्व से अधिष्ठित न होकर) प्रधान (प्रकृति) ही जगत् का कारण है, ब्रह्म नहीं और 'ईक्षतेर्नाशब्दम्' (ब्र० सू० १।१।५) इस सूत्र के द्वारा जो प्रकृति को अशब्द (प्रमाण-रहित) कह कर सांख्य-मत का खण्डन किया गया, वह अनुचित है, क्योंकि उक्त श्रुतिरूप शब्द प्रमाण के द्वारा सांख्य-मत प्रमाणित है।
"तेषां साम्यावस्थाऽवयवधर्मैर्लोहितशुक्लकृष्णैति व्यपदिश्यते"—इस भाष्य का अर्थ यह है कि यद्यपि उक्त श्रुति में प्रधानादि शब्दों के द्वारा प्रकृति का प्रतिपादन नहीं किया गया, तथापि रजोगुण, सत्त्वगुण और तमोगुण की साम्यावस्था का नाम प्रकृति है, वह एक है उसके रजोगुणादि अवयव हैं। उनके जो लोहितत्वादि धर्म हैं, उनको प्रवृत्ति-निमित्त मानकर प्रकृति का 'लोहितशुक्लकृष्णा' शब्द के द्वारा अभिधान किया गया है। "सा च बह्वीः त्रैगुण्यान्विता जनयति"। उस अजा (प्रकृति) का प्रत्येक प्रजा (कार्य) सुख, दुःख और मोह—इन तीन गुणों से समन्वित होती है। इस तथ्य का स्पष्टीकरण इस दृष्टान्त के द्वारा हो जाता है कि 'मैत्र' नाम के पुरुष की रूपयौवन-सम्पन्न 'नर्मदा' नाम की पत्नी है, उसको देखकर उसका पति सुख-विभोर हो जाता है, क्योंकि अपने पति के लिए वह सुखरूप (सत्त्वात्मक) है।