भामती (वाचस्पति मिश्र - ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य चतुःसूत्री हिन्दी व्याख्या)
Bhamati of Vachaspati Mishra Hindi
वाचस्पति मिश्र (व्याख्याकार: स्वामी योगेन्द्रानन्द) द्वारा
स्रोत: Brahma Sutra Shankara Bhashya with Vachaspati Mishra Bhamati and Hindi Commentary (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें४७६ | ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम् | [ अ. १ पा. ४ सू. ८
एकः पुरुषो जुषमाणः प्रीयमाणः सेवमानो वाऽनुशेते । तामेवाविद्ययाऽऽत्मत्वेनोपगम्य सुखी दुःखी मूढोऽहमित्यविवेकतया संसरति । अन्यः पुनरजः पुरुष उत्पन्नविवेकज्ञानो विरक्तो जहात्येनां प्रकृतिं भुक्तभोगां कृतभोगापवर्गां परित्यजति, मुच्यत इत्यर्थः । तस्माच्छ्रुतिमूलैव प्रधानादिकल्पना कापिलानामिति । एवं प्राप्ते ब्रूमः—नानेन मन्त्रेण श्रुतिमत्त्वं सांख्यवादस्य शक्यमाश्रयितुम् । न ह्ययं मन्त्रः स्वातन्त्र्येण कंचिदपि वादं
भामती
वात् । तथा च तत्सपत्नीनां दुःखं तत्कस्य हेतोस्ततः प्रति रजःसमुद्भवात् । तथा चैत्रस्य तामविन्दतो मोहो विषादः स कस्य हेतोस्तं प्रति तमःसमुद्भवात् । नर्मदया च सर्वे भावा व्याख्याताः। तदिदं त्रैगुण्यान्वितत्वं प्रजानाम् । अनुशेत इति व्याचष्टे ॐ तामेवाविद्यया इति ॐ । विषया हि शब्दादयः प्रकृतिविकारास्त्रैगुण्येन सुखदुःखमोहात्मान इन्द्रियमनोऽहङ्कारप्रणालिकया बुद्धिसत्त्वमपसंक्रामन्ति । तेन तद्बुद्धिसत्त्वं प्रधानविकारः सुखदुःखमोहात्मकं शब्दादिरूपेण परिणमते । चितिशक्तिस्त्वपरिणामिन्यप्रतिसंक्रमापि बुद्धिसत्त्वादात्मनो विवेकमबुध्यमाना बुद्धिवृत्त्यैव विपर्यासनाविद्यया वृत्तिस्थान् सुखादीन् आत्मन्यभिमन्यमाना सुखादिमतीव बभूव । तदिदमुक्तं सुखी दुःखी मूढोऽहमित्यविवेकतया संसरत्येकः । सत्त्वपुरुषान्यताख्यातिसमुन्मूलितनिखिलवासनाविद्यानुबन्धस्त्वन्यो जहात्येनां प्रकृतिं तदिदमुक्तम् ॐ अन्यः पुनः इति ॐ । भुक्तभोगामिति व्याचष्टे ॐकृतभोगापवर्गाम्ॐ । शब्दाद्युपलब्धिर्भोगः । गुणपुरुषान्यताख्यातिरपवर्गः । अपवृज्यते हि तया पुरुष इति ।
एवं प्राप्तेऽभिधीयते न तावदजो ह्येको जुषमाणोऽनुशेते जहात्येनां भुक्तभोगामजोऽन्य इत्येतदात्म-
भामती-व्याख्या
उसी को देखकर उसकी सपत्नियां दुःखी होती हैं, क्योंकि उनके प्रति वह रजोगुणात्मक है । चैत्रादि पड़ोसी व्यक्तियों को जिन्हें वह स्त्री प्राप्त नहीं होती, दूर से देख-देख कर मोह होता है, क्योंकि उनके प्रति वह तमोरूप होती है । इसी प्रकार प्रत्येक प्राकृत पदार्थ त्रिगुणात्मक है ।
श्रुतिगत 'अनुशेते' शब्द की व्याख्या की जा रही है—"तामेवाविद्ययाऽऽत्मत्वेनोपगम्य सुखी दुःखी मूढोऽहमित्यविवेकतया संसरति"। अर्थात् प्रकृति के विकारभूत शब्दादि विषय त्रैगुण्यसमन्वित होने के कारण सुख-दुःख-मोहात्मक होते हैं। वे इन्द्रिय, मन और अहंकार के माध्यम से बुद्धिगत सत्त्व में संक्रान्त हो जाते हैं, अतः बुद्धिगत सत्त्व सुख-दुःख-मोह-समन्वित होने के कारण शब्दादिरूपेण परिणत होता है । इसके विपरीत चैतन्य पुरुष सुखादि से असंक्रान्त होने के कारण अपरिणामी होता है फिर भी बुद्धिगत सत्त्व से विवेक-ज्ञान न होने के कारण चिदात्मा बुद्धि-सत्त्व को अपना स्वरूप और उसके सुखादि को अपना ही धर्म मानकर अपने को सुखादिमान् मान लेता है ! जो पुरुष सत्त्व और पुरुष की विवेक-ख्याति के द्वारा निखिल वासनाओं से युक्त अविद्या के सम्बन्ध का विच्छेद कर डालता है, वह पुरुष इस प्रकृति का परित्याग कर देता है, भाष्यकार यही कह रहे हैं—"अन्यः पुनरजः पुरुषः" । श्रुतिगत "भुक्तभोगाम्"—इस विशेषण की व्याख्या है—"कृतभोगापवर्गाम्"। शब्दादि विषयों की उपलब्धि का नाम भोग एवं सत्त्व और पुरुष की अन्यता ( भेद ) की ख्याति का नाम अपवर्ग है [ यहाँ मोक्षार्थक 'अपवर्ग' पद मोक्ष के साधनोभूत सत्त्वपुरुषान्यताख्याति के लिए प्रयुक्त हुआ है ] क्योंकि इस अन्यताख्याति के द्वारा ही पुरुष अपवृक्त ( मुक्त ) होता है ।
सिद्धान्त—पहली बात तो यह है कि "अजो ह्येको जुषमाणोऽनुशेते, जहात्येनां भुक्तभोगामजोऽन्यः"—यह वाक्य आत्मनानात्व का प्रतिपादक नहीं, अपितु लोक-सिद्ध आत्मनानात्व का अनुवाद करके बन्ध और मोक्ष का प्रतिपादन करता है । वह अनूद्यमाव