भारतकोश
भामती (वाचस्पति मिश्र - ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य चतुःसूत्री हिन्दी व्याख्या)

भामती (वाचस्पति मिश्र - ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य चतुःसूत्री हिन्दी व्याख्या)

Bhamati of Vachaspati Mishra Hindi

वाचस्पति मिश्र (व्याख्याकार: स्वामी योगेन्द्रानन्द) द्वारा

स्रोत: Brahma Sutra Shankara Bhashya with Vachaspati Mishra Bhamati and Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished639 पृष्ठ

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अव्यक्तशब्दस्य शरीरपरत्वम् | हिन्दीसहितभामतीसंचलितम् ४६९

त्रयाणामेव चैवमुपन्यासः प्रश्नश्च ॥ ६ ॥

इतश्च न प्रधानस्याव्यक्तशब्दवाच्यत्वं ज्ञेयत्वं वा । यस्मात्त्रयाणामेव पदार्था-

भामती

वरप्रदानोपक्रमा हि मृत्युनचिकेतःसंवादवाक्यप्रवृत्तिरासमाप्तेः कठवल्लीनां लक्ष्यते । मृत्युनंचिके- केतसे कुपितेन पित्रा प्रहिताय तुष्टस्त्रीन् वरान् प्रददौ, नचिकेतास्तु प्रथमेन वरेण पितुः सौमनस्यं वव्रे, द्वितीयेनाग्निविद्यां, तृतीयेनात्मविद्याम् , वराणामेष वरस्तृतीय इति वचनात् । न तु तत्र वरप्रदाने प्रधानगोचरे स्तः प्रश्नप्रतिवचने । तस्मात्कठवल्लीह्वग्निसंज्ञोऽपरमात्मपरैव वाक्यप्रवृत्तिर्न त्वप्रक्रान्तप्रधानपरा भवितुमर्हतीत्याह ॐ इतश्च न प्रधानस्याव्यक्तशब्दवाच्यत्वम् इति ॐ । हन्त त इदं प्रवक्ष्यामि गुह्यं

भामती-व्याख्या

निचाय्य तं मृत्युमुखात् प्रमुच्यत” ( कठो० २।३।१५ ) इत्यादि वाक्यों में जो अव्यक्त तत्त्व का निचाय्यत्वेन ( ज्ञेयत्वेन ) उल्लेख माना जाता है, वह संगत नहीं, क्योंकि वहाँ प्राज्ञात्मा ( परमेश्वर ) का प्रकरण है, अतः वही ज्ञेयत्वेन श्रुत है, अव्यक्ततत्त्व नहीं ॥ ५ ॥

इस अधिकरण का विषय-वाक्य जिस उपनिषत् का है, उसकी किसी भी वल्ली ( उपाध्याय ) में सांख्याभिमत प्रधानतत्त्व का प्रतिपादन उपलब्ध नहीं होता, क्योंकि समग्र कठ उपनिषत् नचिकेता और यम का संवादात्मक ग्रन्थ है, जिस का आरम्भ यम के द्वारा वर-प्रदान के रूप में होता है—

तिस्रो रात्रीर्यदवासीगृहे मेऽनश्नन् ब्रह्मन्नतिथिर्नमस्यः ।
नमस्तेऽस्तु ब्रह्मन् स्वस्ति मेऽस्तु तस्मात्प्रति त्रीन् वरान् वृणीष्व ॥

[ यम देव ने कहा—हे नचिकेता ? तू बिना कुछ खाए-पिए मेरे द्वार पर तीन रात पड़ा रहा है, अतः तीन रात्रियों के बदले मुझ से तीन वर माँग ले, जिस से कि मैं उऋण हो सकूँ और मेरा कल्याण हो ] । यह नचिकेता वही है, जिसकी धृष्टता पर उस का पिता वाजश्रवस ( अन्नदानादि में अग्रणी उद्दालक ऋषि ) क्रुद्ध होकर उस ( नचिकेता ) को यमराज के पास प्रेषित कर देता है और यमराज उस पर प्रसन्न होकर वर देता है।

नचिकेता पहला वर माँगता है—“शान्तसंकल्पः सुमना यथा स्याद् वीतमन्युर्गौतमः” [ मेरे ( नचिकेता के ) पिता उद्दालक का उद्वेग और क्रोध शान्त हो जाय एवं मेरे ( नचिकेता के ) प्रति उसका पूर्ववत् सौमनस्य ( वत्सलभाव ) जागृत हो ] । द्वितीय वर के द्वारा अग्नि-विज्ञान माँगता है— 'स त्वमग्निं स्वर्ग्यमध्येषि मृत्यो प्रब्रूहि त्वं श्रद्दधानाय मह्यम् [ हे यम ! आप स्वर्ग-प्राप्ति की साधनभूत अग्नि का ज्ञान रखते हैं। मैं श्रद्धा और विनय के साथ प्रार्थना करता हूँ कि वह विज्ञान मुझे प्रदान करें ] । तृतीय वर में आत्मविद्या की माँग रखी—

येयं प्रेते विचिकित्सा मनुष्येऽस्तीत्येके नायमस्तीति चैके ।
एतद्विद्यामनुशिष्टस्त्वयाऽहं वराणामेष वरस्तृतीयः ॥

[ मनुष्य के मर जाने पर जो यह सन्देह किया जाता है कि कुछ लोग कहते हैं कि आत्मा नहीं मरता, अपि तु जन्मान्तर में भी वही बना रहता है और कुछ लोगों का कहना है कि मनुष्य के मर जाने पर कुछ भी शेष नहीं रहता। ऐसे सन्देहास्पद आत्मा का तत्त्वावबोध मुझे कराएँ ] । प्रधान ( सांख्याभिमत प्रकृति ) के विषय में न तो कोई वर-प्रदान ही किया गया है और प्रश्नोत्तर ही उपलब्ध होते हैं, अतः कठोपनिषत् के प्रतिपाद्य तीन ही विषय हैं—अग्नि, जीव और परमात्मा । इन से अतिरिक्त किसी प्रधानादि विषय को लेकर वहाँ वाक्यों की प्रवृत्ति नहीं पाई जाती— 'यस्मात् त्रयाणामेव पदार्थानामग्निजीवपरमात्मनां वरप्रदानसामर्थ्यात्' । 'हन्त त इदं प्रवक्ष्यामि गुह्यं ब्रह्म सनातनम्'