भारतकोश
भामती (वाचस्पति मिश्र - ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य चतुःसूत्री हिन्दी व्याख्या)

भामती (वाचस्पति मिश्र - ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य चतुःसूत्री हिन्दी व्याख्या)

Bhamati of Vachaspati Mishra Hindi

वाचस्पति मिश्र (व्याख्याकार: स्वामी योगेन्द्रानन्द) द्वारा

स्रोत: Brahma Sutra Shankara Bhashya with Vachaspati Mishra Bhamati and Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished639 पृष्ठ

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अव्यक्तशब्दस्य शरीरपरत्वम् ] हिन्दीसहितभामतीसंवलितम् ४६१

प्रत्यगात्मब्रह्मभावगतिरिह विवक्षिता। तथा च ‘एष सर्वेषु भूतेषु गूढोत्मा न प्रकाशते। दृश्यते त्वग्र्यया बुद्ध्या सूक्ष्मया सूक्ष्मदर्शिभिः।’ (का० १।३।१२) इति वैष्णवस्य परमपदस्य दुरवगमत्वमुक्त्वा तदवगमार्थं योगं दर्शयति—‘यच्छेद्वा- ङ्मनसी प्राज्ञस्तद्यच्छेज्ज्ञान आत्मनि। ज्ञानमात्मनि महति नियच्छेत्तद्यच्छेच्छान्त आत्मनि।।' (का० १।३।१३) इति। एतदुक्तं भवति — वाचं मनसि संयच्छेत् वागादि- वाह्येन्द्रियव्यापारमुत्सृज्य मनोमात्रेणावतिष्ठेत। मनोऽपि विषयविकल्पाभिमुखं विकल्पदोषदर्शनेन ज्ञानशब्दोदितायां बुद्धावध्यवसायस्वभावायां धारयेत्। तामपि बुद्धिं महत्यात्मनि भोक्तर्यग्रथायां वा बुद्धौ सूक्ष्मतापादनेन नियच्छेत्। महान्तं त्वा- त्मानं शान्त आत्मनि प्रकरणवति परस्मिन्पुरुषे परस्यां काष्ठायां प्रतिष्ठापयेदिति च। तदेवं पूर्वापरालौचनायां नास्त्यत्र परपरिकल्पितस्य प्रधानस्यावकाशः ॥ १ ॥

सूक्ष्मं तु तदर्हत्वात् ॥ २ ॥

उक्तमेतत्प्रकरणपरिशेषाभ्यां शरीरमव्यक्तशब्दं न प्रधानमिति। इदमिदानी- माशङ्क्यते—कथमव्यक्तशब्दार्हत्वं शरीरस्य ? यावता स्थूलत्वात्स्पष्टतरमिदं शरीरं व्यक्तशब्दार्हमस्पष्टवचनस्त्वव्यक्तशब्द इति। अत उत्तरमुच्यते—सूक्ष्मं त्विह कारणा- त्मना शरीरं विवक्ष्यते, सूक्ष्मस्याव्यक्तशब्दार्हत्वात्। यद्यपि स्थूलमिदं शरीरं न स्वयम- व्यक्तशब्दमर्हति, तथापि तस्य त्वारम्भकं भूतसूक्ष्ममव्यक्तशब्दमर्हति। प्रकृतिशब्दश्च विकारे दृष्टः। यथा ‘गोभिः श्रीणीत मत्सरम्’ (ऋ० सं० ९।४६।४) इति। श्रुतिश्च—

भामती

तेत्यत आह ॐ तथा चेति ॐ । वागिति छान्दसो द्वितीयालोपः। शेषमतिरोहितार्थम् ॥ १ ॥ पूर्वपक्षिणोऽनुशयबीजनिराकरणपरं सूत्रम् ॐ सूक्ष्मं तु तदर्हत्वात् ॐ । प्रकृतेर्विकाराणामन- न्यत्वात् प्रकृतेरव्यक्तत्वं विकार उपचर्यते। यथा गोभिः श्रीणीतेति गोशब्दस्तद्विकारे पयसि। अव्यक्तात् कारणाद् विकाराणामनन्यत्वेनाव्यक्तशब्दार्हत्वे प्रमाणमाह ॐ तथा च श्रुतिः इति ॐ । अव्याकृतमव्य-

भामती-व्याख्या

और एकार्थज्ञता या अल्पज्ञता का प्रसङ्ग उपस्थित करने के लिए ‘प्रति’ शब्द से प्रत्येक, अर्थ का ग्रहण किया गया है]। इसी जीव में ब्रह्मरूपता का प्रतिपादन यहाँ विवक्षित है। जीव में ब्रह्मत्व का प्रतिपादन किसी प्रमाणान्तर से नहीं किया गया कि यहाँ उसकी विवक्षा न होती यह कहा जा रहा है—“तथा च तदवगमार्थं योगं दर्शयति”। “यच्छेद् वाक् मनसि”— यहाँ पर “यच्छेद् वाचं मनसि”—ऐसा प्रयोग होना चाहिए था, किन्तु छान्दस (वैदिक) प्रयोगों की निरङ्कुशता को ध्यान में रखकर द्वितीया विभक्ति का लोप माना जाता है। शेष भाष्य स्पष्टार्थक है ॥ १ ॥

पूर्वपक्षी के हृदय में निहित सिद्धान्ती के वक्तव्यपर असन्तोष का निराकरण करने के लिए सूत्र प्रस्तुत किया जाता है--“सूक्ष्मं तु तदर्हत्वात्”। 'अव्यक्त' शब्द से जो शरीर का ग्रहण किया जाता है, उसमें पूर्व जिज्ञासा करता है कि यह शरीर तो व्यक्त (स्थूल) है, इसको अव्यक्त (सूक्ष्म) क्योंकर कहा जा सकता है ? इस जिज्ञासा का उत्तर है—'सूक्ष्मं तु' अर्थात् शरीर के आरम्भक सूक्ष्म भूत वस्तुतः अव्यक्त हैं। वे सूक्ष्म भूत शरीर के आरम्भक या शरीर की प्रकृति एवं शरीर उनका विकार है। प्रकृति और विकार का अभेद माना जाता है। प्रकृति और विकार का अभेद होने के कारण प्रकृति के वाचक शब्द का विकार में भी व्यवहार हो जाता है, अतः सूक्ष्म भूतरूप प्रकृति के वाचक 'अव्यक्त' शब्द का व्यवहार शरीररूप विकार में वैसे ही हो जाता है, जैसे गो के विकारभूत (गव्य) दूध के लिए 'गो'