भामती (वाचस्पति मिश्र - ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य चतुःसूत्री हिन्दी व्याख्या)
Bhamati of Vachaspati Mishra Hindi
वाचस्पति मिश्र (व्याख्याकार: स्वामी योगेन्द्रानन्द) द्वारा
स्रोत: Brahma Sutra Shankara Bhashya with Vachaspati Mishra Bhamati and Hindi Commentary (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें| ४६० | ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम् | [ अ. १ पा. ४ सू. १ |
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परिपठ्यते ।।' इति स्मृतेः, 'यो ब्रह्माणं विदधाति पूर्वं यो वै वेदांश्च प्रहिणोति तस्मै' ( श्वे० ६।१८ ) इति च श्रुतेः, या प्रथमजस्य हिरण्यगर्भस्य बुद्धिः सा सर्वासां बुद्धीनां परा प्रतिष्ठा । सेह महानात्मेत्युच्यते । सा च पूर्वत्र बुद्धिग्रहणेनैव गृहीता सती हिरुगिहोपदिश्यते, तस्या अप्यस्मदीयाभ्यो बुद्धिभ्यः परत्वोपपत्तेः । एतस्मिंस्तु पक्षे परमात्मविषयेणैव परेण पुरुषग्रहणेन रथिन आत्मनो ग्रहणं द्रष्टव्यम् , परमार्थतः परमात्मविज्ञानात्मनोर्भेदाभावात् । तदेवं शरीरमेवैकं परिशिष्यते । इतराणीन्द्रियादीनि प्रकृतान्येव परमपददिदर्शयिषया समनुक्रामन्परिशिष्यमाणेनेहान्त्येनाव्यक्तशब्देन परिशिष्यमाणं प्रकृतं शरीरं दर्शयतीति गम्यते । शरीरेन्द्रियमनोबुद्धिविषयवेदनासंयुक्तस्य ह्यविद्यावतो भोक्तुः शरीरादीनां रथादिरूपककल्पनया संसारमोक्षगतिनिरूपणेन
भामती
प्रथमजहिरण्यगर्भबुद्धेरेकनीडतया हिरण्यगर्भबुद्धेर्महत्त्वं च, आपनादात्मत्वं च । अत एव बुद्धिमात्रात् पृथक्करणमुपपन्नम् । नन्वेतस्मिन् पक्षे हिरण्यगर्भबुद्धेरात्मत्वान्न रथिन आत्मनो भोक्तुरत्रोपादानमिति न रथमात्रं परिशिष्यतेऽपि तु रथवानपीत्यत आह ॐ एतस्मिंस्तु पक्ष इति ॐ । यथा हि समारोपितं प्रतिबिम्बं बिम्बान्न वस्तुतो भिद्यते, तथा न परमात्मनो विज्ञानात्मा वस्तुतो भिद्यते इति परमात्मैव रथवानिहोपात्तस्तेन रथमात्रं परिशिष्टमिति । अथ रथादिरूपककल्पनया शरीरादिषु किं प्रयोजनमित्यत आह ॐ शरीरेन्द्रियमनोबुद्धिविषयवेदनासंयुक्तस्य हीति ॐ । वेदना सुखाद्यनुभवः । प्रत्यर्थमञ्चतीति प्रत्यगात्मेह जीवोऽभिमतस्तस्य ब्रह्मावगतिः । न च जीवस्य ब्रह्मत्वं मानान्तरात्सिद्धं, येनात्र नागमोऽपेक्ष्ये-
भामती-व्याख्या
मतिर्ब्रह्मा पूर्बुद्धिः ख्यातिरीश्वरः । प्रज्ञा संवित् चितिश्चैव स्मृतिश्च परिपठ्यते ॥'' इस स्मृति-वाक्य के द्वारा उसी में महत्त्व, चैतन्य ( आत्मत्व ) प्रतिपादित है। इस श्रुति में हिरण्यगर्भ की बुद्धि को 'पूर' इसी लिए कहा है कि उसी में समस्त जीवों की व्यष्टि बुद्धियाँ वैसे ही अवस्थित होती हैं, जैस पुर या नगर में अनेक घर होते हैं। भोग्य-वर्ग का अधिकरण होने के कारण भी इस बुद्धि को पुरी कहते हैं। यह बुद्धि व्यापक ( व्यापक ) है, अतः आत्मा कही जाती है। जीवों की व्यष्टि बुद्धियों से पृथक् और उनका कारण होने से पर ( श्रेष्ठ ) मानी जाती है। यदि—यही रथरूप बुद्धि आत्मा है, तब इससे भिन्न रथी आत्मा कौन होगा ? इस प्रश्न का उत्तर दिया गया है—एतस्मिंस्तु पक्षे रथिनः परमात्मनो ग्रहणम्” । भोक्ता पुरुष के रूप में परमात्मा का ग्रहण इस लिए किया जाता है कि जैसे समारोपित प्रतिबिम्ब वस्तुतः बिम्ब से भिन्न नहीं होता, वैसे ही परमात्मा से वस्तुत विज्ञानात्मा ( जीव ) भिन्न नहीं होता, अतः रथवान् ( रथी ) के रूप में वहाँ परमात्मा का ग्रहण अनुचित नहीं। शरीरादि में रथादि-रूपक की कल्पना का प्रयोजन भाष्यकार कहते हैं—"शरीरेन्द्रियमनोबुद्धिविषयवेदनासंयुक्तस्य ह्यविद्यावतो भोक्तुः शरीरादीनां रथादि रूपककल्पनया प्रत्यगात्मब्रह्मावगतिरिह विवक्षिता" ! 'वेदना' शब्द का अर्थ है—सुखादि का अनुभव [ बौद्ध साहित्य में वेदना के तीन भेद माने गये हैं—''(१) सुखा वेदना, (२) दुःखा वेदना, (३) असुखदुःखा भावना'' किसी व्यक्ति को देखकर उसके मित्र को सुख एवं शत्रु को दुःख की अनुभूति होती है, किन्तु एक उदासीन ( रागद्वेष-रहित ) व्यक्ति को सुख-दुःख से रहित अनुभूति होती है ] । 'प्रत्यगात्मा' शब्द से यहाँ जीवात्मा विवक्षित है, शब्द की व्युत्पत्ति है—'अर्थमर्थं प्रति प्रत्यर्थम्, प्रत्यर्थमञ्चति अवगच्छतीति प्रत्यक्, प्रत्यक् चासौ आत्मा प्रत्यगात्मा' [प्रति' शब्द के द्वारा कहीं प्रतीप ( विपरीत ) अर्थ भी लिया जाता है, यहाँ हिरण्यगर्भ और जीव का व्यष्टि-समष्टिभाव ध्वनित करने के लिए सर्वज्ञता