भामती (वाचस्पति मिश्र - ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य चतुःसूत्री हिन्दी व्याख्या)
Bhamati of Vachaspati Mishra Hindi
वाचस्पति मिश्र (व्याख्याकार: स्वामी योगेन्द्रानन्द) द्वारा
स्रोत: Brahma Sutra Shankara Bhashya with Vachaspati Mishra Bhamati and Hindi Commentary (उद्गम)
पृष्ठ 477, कुल 639 में से
संदर्भ में पढ़ेंअव्यक्तशब्दस्य शरीरपरत्वम् ] हिन्दीसहितभामतीसंवलितम् ४५९
( बृ० ३।२ ) इति श्रुतिप्रसिद्धेः । विषयेभ्यश्च मनसः परत्वं, मनोमूलत्वाद्विषयेन्द्रियव्य- वहारस्य । मनसस्तु परा बुद्धिः, बुद्धिं ह्यारुह्य भोग्यजातं भोक्तारमुपसर्पति । 'बुद्धेरात्मा महान्परः', यः स 'आत्मानं रथिनं विद्धि' इति रथित्वेनोपक्षिप्तः । कुतः ? आत्म- शब्दात् । भोक्तुश्च भोगोपकरणात्परत्वोपपत्तेः । महत्त्वं चास्य स्वामित्वादुपपन्नम् । अथवा – 'मनो महान्मतिर्ब्रह्मा पूर्बुद्धिः ख्यातिरीश्वरः' । प्रज्ञा संविद्विदितिश्चैव स्मृतिश्च
भामती
पुरुषपशुमिति । न चैतानि स्वरूपतो वशीकर्त्तुमीशते, यावदस्मै पुरुषपशवे गन्धरसनामरूपशब्दकामकर्म- स्पर्शान्नोपहरन्ति । अत एव गन्धादयोऽष्टावतिग्रहाः, तदुपहारेण ग्रहाणां ग्रहत्वोपपत्तेः । तदिदमुक्तम् — ❀ इन्द्रियाणां ग्रहत्वं विषयाणामतिग्रहत्वमिति श्रुतिप्रसिद्धेरिति ❀ । ग्रहत्वेनेन्द्रियैः साम्येऽपि मनसः स्वगतेन विशेषेणार्थेभ्यः परत्वमाह ❀ विषयेभ्यश्च मनसः परत्वमिति ❀ । कस्मात् पुमान् रथित्वेनोपक्षिप्तो गृह्यते इत्यत आह ❀ आत्मशब्दादिति ❀ । तत्प्रत्यभिज्ञानादित्यर्थः । श्रेष्ठत्वे हेतुमाह ❀ भोक्तुश्चेति ❀ । तदनेन जीवात्मा स्वामितया महानुक्तः । अथवा श्रुतिस्मृतिभ्यां हैरण्यगर्भी बुद्धिरात्मशब्देनोच्यत इत्याह ❀ अथवेति ❀ । ❀ पूरिति ❀ । भोग्यजातस्य बुद्धिरधिकरणमिति बुद्धिः पूः, तदेवं सर्वासां बुद्धीनां
भामती-व्याख्या
करता है, अतः विषयों को अतिग्रह ( सुदृढ़ या साक्षात् बन्धन ) कहा गया है, इस प्रकार ] इन्द्रियों की अपेक्षा गन्धादि विषयों का प्राधान्य सिद्ध होता है। प्रधान होने के कारण विषयों को इन्द्रियों की अपेक्षा पर ( श्रेष्ठ ) कहा है। ( १ ) घ्राण, ( २ ) जिह्वा, ( ३ ) वाक्, ( ४ ) चक्षु, ( ५ ) श्रोत्र, ( ६ ) मन, ( ७ ) हस्त और ( ८ ) त्वक् इन आठ इन्द्रियों को ग्रह इसी लिए कहा है कि 'गृह्णन्ति वशीकुर्वन्ति पुरुषम्'—इस व्युत्पत्ति के अनुसार इन्द्रियगण जीव को अपने वश में कर लेते हैं। इन्द्रियों में साक्षात् नियोजकता नहीं, अपि तु गन्धादि विषयों का उपहार देकर ही घ्राणादि पुरुष के आसञ्जक या मोहक होते हैं, अत एव गन्धादि आठ विषयों को अतिग्रह ग्रहत्व ( बन्धकता ) के सम्पादक कहा है। यही भाष्यकारने कहा है—"इन्द्रियाणां ग्रहत्वं विषयाणामतिग्रहत्वमिति श्रुति- प्रसिद्धेः"। मन भी इन्द्रिय होने के कारण अन्य इन्द्रियों के समान ही ग्रह ही है, तथापि विषय की अपेक्षा उस की परता ( श्रेष्ठता ) का कारण यह है कि "मनोमूलत्वाद् विषयेन्द्रिय- व्यवहारस्य"। विषय और इन्द्रियों का सन्निकर्षादि मन के ही आधीन है, अतः विषय की अपेक्षा भी मन को पर ( श्रेष्ठ ) कहा है। मन से बुद्धि पर और बुद्धि से भी श्रेष्ठ जो आत्मा कहा गया है, वह वही भोक्ता आत्मा है, जो कि “आत्मानं रथिनं विद्धि” (कठ० १।३।४) यहाँ पर ‘रथी’ के रूप में वर्णित है, क्योंकि "आत्मशब्दात्"। अर्थात् “आत्मानं रथिनं विद्धि” और “बुद्धेरात्मा महान् परः'—इन दोनों वाक्यों में एक ही ‘आत्म’ शब्द का प्रयोग होने से एक ही भोक्ता पुरुष की प्रत्यभिज्ञा होती है। भोक्ता की श्रेष्ठता में हेतु-प्रदर्शन किया जाता है—"भोक्तुश्च भोगोपक- रणात् परत्वोपपत्तेश्च"। जीवात्मा भोक्ता है, उसी के लिए सभी भोग्य पदार्थों एवं भोग के साधनों का निर्माण हुआ है, अतः उसका भोग्यादि से श्रेष्ठ होना स्वाभाविक है। इस प्रकार जीवात्मा सभी भोग्य-वर्ग का स्वामी होने के कारण महान् कहा गया है—"बुद्धेरात्मा महान् परः"। अथवा श्रुतियों और स्मृतियों के द्वारा हिरण्यगर्भ की बुद्धि को ‘आत्मा’ शब्द के द्वारा अभिहित किया गया है—"अथवा सांख्याचार्य 'महानात्मा' शब्द के द्वारा 'महत्तत्त्व' का ग्रहण किया करते हैं, उसमें जैसी महत्ता ( व्यापकता ) विवक्षित है, वैसी जीव की व्यष्टि बुद्धि में नहीं, अतः हिरण्यगर्भ की समष्टि बुद्धि का ग्रहण करना अधिक न्याय-संगत है, क्योंकि "मनो महान्