भामती (वाचस्पति मिश्र - ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य चतुःसूत्री हिन्दी व्याख्या)
Bhamati of Vachaspati Mishra Hindi
वाचस्पति मिश्र (व्याख्याकार: स्वामी योगेन्द्रानन्द) द्वारा
स्रोत: Brahma Sutra Shankara Bhashya with Vachaspati Mishra Bhamati and Hindi Commentary (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें| ५१० | ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम् | [ अ. १ पा. ४ सू. १९ |
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भामती
स्येयं गतिस्तदा तत्पूर्वकस्य रूपधेयस्य कैव कथेति भावः। न केवलं तदुपादानत्वात्ततो न व्यतिरिच्यते नामरूपप्रपञ्चः, प्रलयसमये च तदनुप्रवेशात्ततो न व्यतिरिच्यते। यथा सामुद्रमेवाम्भः पृथिवीतेजः-सम्पर्कात् काठिन्यमुपगतं सैन्धवखिल्यः, स हि स्वाकरे समुद्रे क्षिप्तोऽम्भ एव भवत्येवं चिदम्भोघो लीनं जगच्चिदेव भवति न तु ततोऽतिरिच्यत इति। एतद्दृष्टान्तप्रबन्धेनाह ॐ स यथा सर्वासामपाम् इत्याविः। दृष्टान्तप्रबन्धमुक्त्वा दार्ष्टान्तिके योजयति ॐ एवं वा अरे इदं महत् इति ॐ। वृद्धत्वेन ब्रह्मोक्तम्। इदं ब्रह्मेत्यर्थः। भूतं सत्यम्, अनन्तं नित्यम्, अपारं सर्वगतं, विज्ञानघनो विज्ञानैकरस इति यावत् । एतेभ्यः कार्यकारणभावेन व्यवस्थितेभ्यो भूतेभ्यः समुत्थाय साम्येनोत्थाय कार्यकारणसङ्घातस्य ह्यवच्छेदाद् दुःखित्वशोकित्वादयस्तदवच्छिन्ने चिदात्मनि तद्विपरीतेऽपि प्रतीयन्ते यथोदकप्रतिबिम्बिते चन्द्रमसि तोयगताः कम्पादयस्तदिदं साम्येनोत्थानं, यदा त्वागमाचार्योपदेशपूर्वकमनननिदिध्यासनप्रकर्षपर्यन्तजोऽस्य ब्रह्मस्वरूपसाक्षात्कार उपावर्तते, तदा निर्मृष्टनिखिलवासनाविद्यामलस्य कार्यकारणसङ्घातभूतस्य विनाशे तान्येव भूतानि नश्यन्त्यनु तदुपाधिश्चिदात्मनः खिल्यभावो विनश्यति । ततो न प्रेत्य कार्यकारणभूतनिवृत्तौ रूपगन्धादिसंज्ञास्तीति ।
भामती-व्याख्या
विशेष यत्न के समुद्भूत होकर तत्त्व या अन्यत्वरूप से निरूपित नहीं होते। ऋगादि पदों के द्वारा नामरूपात्मक प्रपञ्च में से 'नाम' उपलक्षित है। जब 'नाम' पदार्थ की यह गति है, तब 'रूप' पदार्थ की बात ही क्या? क्योंकि नाम के माध्यम से ही 'रूप' की सृष्टि प्रतिपादित है— "वेदशब्देभ्य एवादौ पृथक्संस्थाश्च निर्ममे" (मनु. १.२१)। सृष्टि प्रक्रिया के द्वारा ही नाम-रूपात्मक प्रपञ्च अपने उपादानकारणभूत ब्रह्म से भिन्न सिद्ध नहीं होता, प्रलय के समय भी ब्रह्म में ही प्रवेश कर जाने के कारण ब्रह्म से भिन्न नहीं हो सकता। जैसे समुद्र से समुद्भूत नमक पृथिवी आदि के सम्पर्क से कठिन होकर एक घन (डले) के रूप में आ जाता है, और वही सैन्धव-घन अपने आकर (समुद्र) में प्रक्षिप्त होकर समुद्ररूप हो जाता है। वैसे ही नामरूपात्मक प्रपञ्च भी चैतन्य महासागर से भिन्न नहीं, यह रहस्य एक दृष्टान्त के द्वारा प्रकट किया जाता है— "स यथा सर्वासामपां समुद्र एकायनम्” (बृह. उ. ४।५।१२) दार्ष्टान्त में उसी का समन्वय किया गया है— "एवं वा अरे अयमात्माऽनन्तरोऽ-बाह्यः” । 'इदं महद्भूतमन्तमपारं विज्ञानघन एवैतेभ्यो भूतेभ्य समुत्थाय तान्येवानुविन-श्यति" (बृह. उ. २।४।१२) इस श्रुति में 'इदं' शब्द से ब्रह्म का ग्रहण किया गया है, क्योंकि वही महत् (बृहत्) है। 'भूतम्' का अर्थ 'सत्यम्', 'अनन्तम्' का 'नित्यम्' और 'अपारम्' का 'सर्वगतम्' है। 'विज्ञानघनः' का अर्थ विज्ञान से विजातीय पदार्थों के संसर्ग से रहित वा विज्ञानैकरस है [जैसा कि भाष्यकार ने कहा है— "घनशब्दो जात्यन्तरप्रतिषेधार्थः यथा सुवर्णघनोऽयोगनः ] । आशय यह है कि यद्यपि यह जीवात्मा सत्, चित्, अनन्त, जन्म-मरण से रहित शुद्ध ब्रह्मरूप है। तथापि अविद्या-वश कार्य और करण (स्थूल और सूक्ष्म शरीर) के रूप में परिणत आकाशादि भूतों से अपना समुत्थान (साम्यापत्ति या तादात्म्या-ध्यास अनुभव करता है, उनके दुःखी और सुखी होने पर स्वयं को दुःखी और सुखी समझता है। जैसे जलगत चन्द्र-प्रतिबिम्ब में जल के कम्पनादि धर्म प्रतीत होते हैं, वैसे ही शरीरावच्छिन्न आत्मा में शरीर के कर्तृत्वानि धर्म आरोपित हो जाते हैं।
जब आगम और आचार्य का उपदेश पा कर मानव श्रवण, मनन, निदिध्यासनपूर्वक ब्रह्म का साक्षात्कार कर लेता है, तब समस्त वासनाओं (संस्कारों) से युक्त अविद्यारूप मल विनष्ट हो जाता है, अविद्या के कार्यभूत शरीरादि उपाधियाँ समाप्त हो जाती है, आत्मा का वह खिल्यभाव (तादात्म्याध्यास) सदैव के लिए क्षीण हो जाता है, कर्तृत्वादि का भानरूप