भारतकोश
भामती (वाचस्पति मिश्र - ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य चतुःसूत्री हिन्दी व्याख्या)

भामती (वाचस्पति मिश्र - ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य चतुःसूत्री हिन्दी व्याख्या)

Bhamati of Vachaspati Mishra Hindi

वाचस्पति मिश्र (व्याख्याकार: स्वामी योगेन्द्रानन्द) द्वारा

स्रोत: Brahma Sutra Shankara Bhashya with Vachaspati Mishra Bhamati and Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished639 पृष्ठ

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द्रष्टृंष्टव्यत्वेन ब्रह्मनिर्देशः ] हिन्दीसहितभामतीसंवलितम् ५७९

भामती दुन्दुभेर्हन्यमानस्य इति ॐ । दुन्दुभिग्रहणेन तद्गतं शब्दसामान्यमुपलक्षयति । न केवलं स्थितिकाले नामरूपप्रपञ्चश्चिदात्मातिरेकेणाग्रहणाच्चिदात्मनो न व्यतिरिच्यतेऽपि तु नामरूपोत्पत्तेः प्रागपि चिद्रूपा-वस्थानात् तदुपादानत्वाच्च नामरूपप्रपञ्चस्य तद्व्यतिरेकः, रज्जूपदानस्येव भुजङ्गस्य रज्जोरव्यतिरेक इत्येतद् दृष्टान्तेन साधयति भगवती श्रुतिः । स यथाऽऽर्द्रेन्धेनेरभ्याहितस्य पृथग्धूमा विनिश्चरन्त्येवं वा अरेऽस्य महतो भूतस्य निःश्वसितमेतद्यदृग्वेद इत्यादिना चतुर्विधो मन्त्र उक्तः, इतिहास इत्यादिनाऽष्टविधं ब्राह्मणमुक्तम् ।

एतदुक्तं भवति — यथाग्निमात्रं प्रथममवगम्यते क्षुद्राणां विस्फुलिङ्गानामुपादानम् । अथ ततो विस्फुलिङ्गा व्युच्चरन्ति न चैतेऽग्नेस्तत्त्वान्यत्वाभ्यां शक्यन्ते निर्वक्तुम् । एवमृग्वेदादयोऽप्यशेषप्रप-ञ्चात् ब्रह्मणो व्युच्चरन्तो न ततस्तत्त्वान्यत्वाभ्यां निरूच्यन्ते श्रृङ्गादिभिर्नामोपलक्ष्यते, यदा च नामधेय-

भामती-व्याख्या ही जगत् का एकमात्र तत्त्व है, उससे अतिरिक्त और कुछ भी नहीं। इसी तथ्य का निगमन भगवती श्रुति ने एक दृष्टान्त के माध्यम से किया है—"स यथा दुन्दुभेर्हन्यमानस्य न बाह्यान् शब्दान् शक्नुयाद् ग्रहणाय, दुन्दुभेस्तु ग्रहणेन दुन्दुभ्याघातस्य वा शब्दो गृहीतः" (बृह० उ० ४।५।८) ! जो पदार्थ जिस वस्तु के ग्रहण के बिना गृहीत नहीं होता, वह पदार्थ उस वस्तु से भिन्न नहीं होता, जैसे रजत शुक्ति से, सर्प रज्जु से, शब्द-विशेष दुन्दुभ्यादि शब्द सामान्य से भिन्न गृहीत नहीं होते, वैसे ही नाम-रूपादि प्रपञ्च अपने स्थिति-काल में भी चिद्रूप-ग्रहण के बिना गृहीत नहीं होता, अतः वह चिदात्मा से भिन्न नहीं । श्रुतिगत 'दुन्दुभि' शब्द के द्वारा शब्द-सामान्य उपलक्षित होता है। नामरूपादि प्रपञ्च केवल अपने स्थिति-काल में ही चिदात्म-ग्रहण के बिना अगृहीत होकर चिदात्मा से अभिन्न सिद्ध नहीं होता, अपि तु अपनी उत्पत्ति से पहले भी चिद्रूपेण अवस्थित होता है, क्योंकि नामरूपादि कार्य चिदुपादानक होने के कारण उपादान कारण से भिन्न कहाँ अवस्थित होगा ? फलतः नामरूपात्मक प्रपञ्च अपनी उत्पत्ति के पूर्व भी चिद्रूप आत्मा से भिन्न वैसे ही नहीं, जैसे रज्जूपदानक सर्प रज्जु से भिन्न नहीं होता। प्रत्येक कार्य अपने उपादान कारण से समुद्भूत होता है—"स यथार्द्रेन्धाग्नेरभ्याहि-तस्य पृथग्धूमा विनिश्चरन्त्येवं वा अरेऽस्य महतो भूतस्य निःश्वसितमेतद् यद् ऋग्वेदो यजुर्वेदः सामवेदोऽथर्वाङ्गिरस इतिहासः पुराणं विद्या उपनिषदः श्लोकाः सूत्राण्यनुव्याख्या-नानि व्याख्यानानि इष्टं हुतमाशितं यामितं च लोका परश्च लोकः सर्वाणि च भूतानि" (बृह० उ० ४।५।११) । 'ऋग्वेदः' इत्यादि से ऋचादि चतुर्विध मन्त्र, 'इतिहासः' इत्यादि से आठ प्रकार का ब्राह्मण-वर्ग वर्णित है [ "तच्चोदकेषु मन्त्राख्या" (जं० सू० २।१।३२) । 'शेषे ब्राह्मणशब्दः' (जै० सू० २।१।३३) इन दोनों सूत्रों में मन्त्र और ब्राह्मण के जो लक्षण किये गये हैं, वे प्रायिक ही बताये गये हैं। इस विषय में वैदिकों के व्यवहार को प्रायः प्रमाण माना गया है। अथर्ववेद के वाक्यों का भी उसी व्यवहार के आधार पर वर्गीकरण किया जा सकता है। वृत्तिकार ने ब्राह्मण वाक्यों का भेद बताते हुए कहा है—

हेतुनिर्वचन निन्दा प्रशंसा संशयो विधिः ।
परक्रिया पुराकल्पो व्यवधारणकल्पना ॥
उपमानं दशेते तु विधयो ब्राह्मणस्य तु ।
एतत् स्यात् सर्ववेदेषु नियतं विधिलक्षणम् ॥ (शाबर० पृ० ४३६)

इन्हीं विधाओं के अनुसार इतिहासादि रूप वैदिक वाक्यों को ब्राह्मण की संज्ञा दी जा सकती है ]। जैसे नन्हीं-नन्ही चिनगारियाँ (विस्फुलिंग) की उपादानकारणभूत अग्नि ही पहले प्रतीत होती है, उसी से चिनगारियाँ फूटती है। चिनगारियाँ वस्तुतः अग्नि से भिन्न न सत् कही जा सकती हैं, न असत् । वैसे ही ऋग्वेदादि पदार्थ ब्रह्म से विना किसी