भामती (वाचस्पति मिश्र - ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य चतुःसूत्री हिन्दी व्याख्या)
Bhamati of Vachaspati Mishra Hindi
वाचस्पति मिश्र (व्याख्याकार: स्वामी योगेन्द्रानन्द) द्वारा
स्रोत: Brahma Sutra Shankara Bhashya with Vachaspati Mishra Bhamati and Hindi Commentary (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें| ५०८ | ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम् | [ अ. १ पा. ४ सू. १९ |
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भामती
पूर्वकत्वात्तस्य रागविषयेषु तेषु तेषु पतिजायादिषु वैराग्यमुत्पादयितुं याज्ञवल्क्यो न वा अरे पत्युः कामायेत्यादिवाक्यसन्दर्भमुवाच । आत्मोपाधिकं हि प्रियत्वमेषां न तु साक्षात् प्रियाण्येतानि, तस्मादेतेभ्यः पतिजायादिभ्यो विरम्य यत्र साक्षात्प्रेम स एवात्मा वा अरे द्रष्टव्यः श्रोतव्यो मन्तव्यो निदिध्यासितव्यः । वाशब्दोऽवधारणे । आत्मैव द्रष्टव्यः साक्षात्कर्तव्यः । एतत्त्साधनानि च श्रवणादीनि विहितानि श्रोतव्य इत्यादिना । कस्मात् ? आत्मनो वारे दर्शनेन श्रवणादिसाधनेनेदं जगत्सर्वं विदितं भवतीति वाक्यशेषः ।
यतो नामरूपात्मकस्य जगतस्तत्त्वं पारमार्थिकं रूपमात्मैव भुजङ्गस्येव समारोपितस्य तत्त्वं रज्जुस्तस्मादात्मनि विदिते सर्वमिदं जगतत्त्वं विदितं भवति रज्जुभाविव विदितायां समारोपितभुजङ्गस्य तत्त्वं विदितं भवति, यतस्तस्मादात्मैव द्रष्टव्यो न तु तदतिरिक्तं जगत् स्वरूपेण द्रष्टव्यम् । कुतः ? यतो ब्रह्म तं परादाद् ब्राह्मणजातिर्ब्राह्मणोऽहमित्यभिमान इति यावत् । परादात् , पराकुर्यात् , अमृतत्वपदात् । कं ? योऽन्यत्रात्मनो ब्रह्म ब्राह्मणजातिं वेद । एवं क्षत्रादिष्वपि द्रष्टव्यम् । आत्मैव जगतस्तत्त्वं न तु तदतिरिक्तं तदिह्यत्रैव भगवती श्रुतिरुपपत्तिं दृष्टान्तप्रबन्धेनाह । यत् खलु यद्ग्रहं विना न शक्यते ग्रहीतुं तत्ततो न व्यतिरिच्यते । यथा रजतं शुक्तिकाया भुजङ्गो वा रज्जोः दुन्दुभ्यादिशब्दसामान्याद्वा तत्तच्छब्दभेदाः, न गृह्यन्ते च चिद्रूपग्रहणं विना स्थितिकाले नामरूपाणि, तस्मान्न चिदात्मनो भिद्यन्ते तदिदमुक्तं ॐ स यथा
भामती-व्याख्या
उसे लेकर मैं क्या करूँगी, अतः आप (याज्ञवल्क्य) जिस तत्त्व-ज्ञान के प्रभाव से इस धन-धान्यादि से सम्पन्न गृहस्थाश्रम को तुच्छ और हेय समझ रहे हैं, उस तत्त्व का उपदेश करें, जो कि अमृतत्व (मोक्ष) का सच्चा साधन है]। मैत्रेयी की उस प्रार्थना पर याज्ञवल्क्य ने सोचा कि एक सच्चे मुमुक्षु को मोक्ष के साधनीभूत ब्रह्मज्ञान का उपदेश करना है किन्तु उसके लिए सत्पात्र होना चाहिए, वैराग्य ही एकमात्र वह उपाय है, जो कि अपेक्षित सत्पात्रता एवं तत्त्वज्ञान में अपेक्षित परिव्रज्यादि साधन-सम्पत्ति का मार्ग प्रशस्त करता है, अतः वैराग्य का उत्पादन करने के लिए कहा—"न वा अरे पत्युः कामाय पतिः प्रियो भवति", (बृह० उ० ४।५।६) अर्थात् पुरुषों को पत्नी आदि और स्त्रियों को पति आदि अनात्म पदार्थ इसलिए प्रिय नहीं होते कि वे स्वरूपतः सुखरूप हैं, अपि तु आनन्दस्वरूप आत्मा की लिप्सा के लिए वे प्यारे लगते हैं । आत्मा में अनौपाधिक प्रियत्व और पत्नी आदि में औपाधिक प्रियत्व है । अतः पति-पत्नी आदि समस्त प्रपञ्च से विरत होकर साक्षात् प्रेमास्पद आत्मा का दर्शन, श्रवण, मननादि करना चाहिए—"आत्मा वा अरे द्रष्टव्यः श्रोतव्यो मन्तव्यो निदिध्यासितव्यः" (बृह० उ० ४।५।६) यहाँ 'वा' शब्द अवधारणार्थक है, अतः 'आत्मैव द्रष्टव्यः' यह अर्थ पर्यवसित होता है । आत्म-दर्शन के साधनीभूत श्रवणादि का विधान 'श्रोतव्यः' इत्यादि वाक्य से किया गया है । फलतः श्रवणादिसाधनक आत्म-वेदन सम्पन्न हो जाने पर समस्त जगत् विदित हो जाता है, क्योंकि नाम-रूपात्मक आरोपित जगत् का आत्मा मौलिक तत्त्व वैसे ही है, जैसे कि आरोपित सर्प का रज्जु तत्त्व । रज्जुरूप आधार तत्त्व के विदित हो जाने पर उसमें आरोपित सर्पादि का विदित हो जाना नैसर्गिक है, अतः प्रपञ्च का अधिष्ठानभूत आत्मतत्त्व ही द्रष्टव्य है, उससे अतिरिक्त जगत् स्वरूपेण द्रष्टव्य नहीं, क्योंकि "ब्रह्म तं परादाद् योऽन्यत्रात्मनो ब्रह्म वेद" (बृह० उ० ४।५।७) अर्थात् जो वही ब्रह्म (ब्राह्मण) उस व्यक्ति को श्रेयोमार्ग से च्युत कर देता है, जो व्यक्ति उस ब्राह्मण को आत्मा से भिन्न स्वरूपेण सत् मानता है [जैसे मिथ्या दृष्ट सर्प ही मिथ्यादर्शी का घातक होता है, वैसे ही प्रत्येक मिथ्या दृष्ट पदार्थ मिथ्यादर्शी का भ्रंशक होता है]। इसी प्रकार क्षत्रियादि भी मिथ्यादर्शी को कल्याण-मार्ग से वञ्चित कर देते हैं । सारांश यह है कि आत्मा