भामती (वाचस्पति मिश्र - ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य चतुःसूत्री हिन्दी व्याख्या)
Bhamati of Vachaspati Mishra Hindi
वाचस्पति मिश्र (व्याख्याकार: स्वामी योगेन्द्रानन्द) द्वारा
स्रोत: Brahma Sutra Shankara Bhashya with Vachaspati Mishra Bhamati and Hindi Commentary (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंदृष्टृत्वेन ब्रह्मनिर्देशः ] हिन्दीसहितभामतीसंवलितम् ५०७
( ६ वाक्यान्वयाधिकरणम् सू० १९—२२ )
वाक्यान्वयात् ॥ १९॥
बृहदारण्यके मैत्रेयीब्राह्मणेऽधीयते—'न वा अरे पत्युः कामाय—' इत्युपक्रम्य 'न वा अरे सर्वस्य कामाय सर्वं प्रियं भवत्यात्मनस्तु कामाय सर्वं प्रियं भवत्यात्मा वा अरे द्रष्टव्यः श्रोतव्यो मन्तव्यो निदिध्यासितव्यो मैत्रेय्यात्मनो वा अरे दर्शनेन श्रवणेन मत्या विज्ञानेनेदं सर्वं विदितम्' (बृ० ४।५।६) इति, तत्रैतद्विचिकित्स्यते—किं विज्ञानात्मैवायं द्रष्टव्यश्रोतव्यत्वादिरूपेणोपदिश्यत आहोस्वित्परमात्मेति । कुतः पुनरेषा विचिकित्सा ? प्रियसंसूचितेनात्मना भोक्त्रोपक्रमाद्विज्ञानात्मोपदेश इति प्रतिभाति । तथात्मविज्ञानेन सर्वविज्ञानोपदेशात्परमात्मोपदेश इति । किं तावत्प्राप्तम्?
भामती
ननु मैत्रेयीब्राह्मणोपक्रमे याज्ञवल्क्येन गार्हस्थ्याश्रमादुत्तमाश्रमं यियासता मैत्रेय्या भार्ययाः कात्यायन्त्या सहार्थसंविभागकरण उक्ते मैत्रेयी याज्ञवल्क्यं पतिममृतत्वार्थिनी पप्रच्छ—यन्नु म इयं भगोः सर्वा पृथिवी वित्तेन पूर्णा स्यात्किमहं तेनामृता स्यामुत नेति । तत्र नेति होवाच याज्ञवल्क्यः । यथैवोपकरणवतां जीवितं तथैव ते जीवितं स्यादमृतत्वस्य तु नाशास्ति वित्तेन । एवं वित्तेनामृतत्वाशा भवेदपि वित्तसाध्यानि कर्माण्यमृतत्वाय युज्येरन् । तदेव तु नास्ति, ज्ञानसाध्यत्वादमृतत्वस्य । कर्मणां च ज्ञानविरोधिनां तत्सहभावित्वानुपपत्तेरिति भावः । सा होवाच मैत्रेयी येनाहं नामृता स्यां किमहं तेन कुर्यां यदेव भगवान् वेद तदेव मे ब्रूहि । अमृतत्वसाधनज्ञानोपन्यासाय वैराग्य-
भामती-व्याख्या
विषय—"आत्मा वा अरे द्रष्टव्यः श्रोतव्यो मन्तव्यो निदिध्यासितव्यः" (बृह० उ० ४।५।६) यह वाक्य विचारणीय है।
सन्देह—उक्त वाक्य में क्या विज्ञानात्मा (जीव) द्रष्टव्यत्वेन उपदिष्ट है? अथवा ब्रह्म?
पूर्वपक्ष—कर्त्ता-भोक्तारूप जीव का उपक्रम में निर्देश होने के कारण समस्त सन्दर्भ का तात्पर्य जीव के प्रतिपादन में पर्यवसित होता है।
शङ्का—बृहदारण्यकोपनिषद्गत मैत्रेयी ब्राह्मण के उपक्रम में याज्ञवल्क्य ने स्वयं गृहस्थाश्रम के त्याग एवं संन्यासाश्रम में प्रवेश करने की इच्छा से अपनी कात्यायनी और मैत्रेयी नाम की दोनों धर्मपत्नियों को धन का बंटवारा करने के लिए बुलाया और धन के बंटवारे का प्रस्ताव रखा। मैत्रेयी नाम की द्वितीय पत्नी ने जो अमृतत्व (मोक्ष) की कामना करती थी याज्ञवल्क्य से पूछा—"यन्नु म इयं भगोः ! सर्वा पृथिवी वित्तेन पूर्णा स्यात् स्यां त्वहं तेनामृताऽऽहो नेति" (बृह० उ० ४।५।३) अर्थात् हे भगोः (भगवन्!) यदि यह समस्त पृथिवी धन से परिपूर्ण कर मुझे दे दी जाय तो क्या इससे मैं अमृत (मुक्त) हो जाऊँगी ? अथवा नहीं? इस प्रश्न के उत्तर में याज्ञवल्क्य ने कहा—कभी नहीं। इससे केवल इतना होगा कि जैसे अशन-वसनादि साधन-सम्पन्न व्यक्तियों का जीवन लौकिक दृष्ट्या सुखी होता है, वैसा ही तुम्हारा जीवन भी होगा किन्तु "अमृतत्वस्य तु नाशा अस्ति वित्तेन' [मोक्ष-प्राप्ति की धन से कभी आशा नहीं की जा सकती]। इसी प्रकार धन के द्वारा यदि मोक्ष-प्राप्ति की आशा होती तो धन-साध्य यज्ञादि कर्म भी मोक्ष में उपयोगी होते, वह भी नहीं, क्योंकि मोक्ष की प्राप्ति केवल ब्रह्मज्ञान से होती है। कर्म तो ज्ञान के विरोधी हैं, अतः कर्मों में ज्ञान-सहभावित्व भी नहीं हो सकता। तब मैत्रेयी ने कहा—"येनाहं नामृता स्यां किमहं तेन कुर्याम् ? यदेव भगवान् वेद तदेव मे ब्रूहि"