भामती (वाचस्पति मिश्र - ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य चतुःसूत्री हिन्दी व्याख्या)
Bhamati of Vachaspati Mishra Hindi
वाचस्पति मिश्र (व्याख्याकार: स्वामी योगेन्द्रानन्द) द्वारा
स्रोत: Brahma Sutra Shankara Bhashya with Vachaspati Mishra Bhamati and Hindi Commentary (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें| ५०६ | ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम् | [ अ. १ पा. ४ सू. १८ |
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परमात्मा वेदितव्यतया श्रावित इति गम्यते। अपि चैवमेके शाखिनो वाजसनेयिनोऽ- स्मिन्नेव बालाक्यजातशत्रुसंवादे स्पष्टं विज्ञानमयशब्देन जीवमाम्नाय तद्व्यतिरिक्तं परमात्मानमामनन्ति—'य एष विज्ञानमयः पुरुषः क्वैष तदाभूत्कुत एतदागात्' (बृ० २।१।१६) इति प्रश्ने। प्रतिवचनेऽपि 'य एषोऽन्तर्हृदय आकाशस्तस्मिञ्छेते' इति। आकाशशब्दश्च परमात्मनि प्रयुक्तः 'दहरोऽस्मिन्नन्तराकाशः (छा० ८।१।१) इत्यत्र। 'सर्व एत आत्मनो व्युच्चरन्ति' इति चोपाधिमतामात्मनामन्यतो व्युच्चरणमामनन्तः परमात्मानमेव कारणत्वेनामनन्तीति गम्यते। प्राणनिराकरणस्यापि सुषुप्तपुरुषोत्था- पनेन प्राणादिव्यतिरिक्तोपदेशोऽभ्युच्चयः ॥ १८ ॥
भामती
स्वप्नजागरावस्थातः परमात्मनो रूपाद् अंशरूपमागमनमिति। न केवलं कौषीतकिब्राह्मणे वाजसनेयेऽप्ये- वमेव प्रश्नोत्तरयोर्जीवव्यतिरिक्तमामनन्ति परमात्मानमित्याह ॐ अपि चैवमेक इति ॐ। नन्वेत्राकाशः शयनस्थानं तत् कुतः परमात्मप्रत्यय इत्यत आह ॐ आकाशशब्दश्च इति ॐ। न तावन्मुख्यस्याका- शस्यात्माधारत्वसम्भवः। यदपि च द्वासप्ततिसहस्रहिताभिधाननाडीसञ्चारेण सुषुप्त्यवस्थायां पुरीतदव- स्थानमुक्तं तदप्यन्तःकरणस्य। तस्माद् दहरोऽस्मिन्नन्तराकाश इतिवदाकाशशब्दः परमात्मनि मन्तव्य इति। प्रथमं भाष्यकृता जीवनिराकरणाय सूत्रमिदमवतारितं तत्र मन्दधियां नेवं प्राणनिराकरणायेति बुद्धिर्मा भूदित्यशायवानाह ॐ प्राणनिराकरणस्यापि इति ॐ। तौ ह बालाक्यजातशत्रू सुप्तं पुरुषमाज- ग्मतुस्तमजातशत्रुर्नामभिरामन्त्रयाञ्चक्रे बृहत्पाण्डुरवासः सोमराजनिति। स आमन्त्र्यमाणो नोत्तस्थौ। तं पाणिनापेषं बोधयाञ्चकार। स होत्तस्थौ स होवाचाजातशत्रुर्यत्रैष एतत् सुप्तोऽभूदित्यादि, सोऽयं सुप्त- पुरुषोत्थापनेन प्राणादिव्यतिरिक्तोपदेश इति ॥ १८ ॥
भामती-व्याख्या
केवल कौषीतकि ब्राह्मण में ही प्रश्नोत्तर के द्वारा जीव-भिन्न ब्रह्म वर्णित नहीं अपितु वाजसनेयी शाखा की बृहदारण्यक उपनिषद् में भी उसी प्रकार ब्रह्म आम्नात है—"अपि चैवमेके शाखिनो वाजसनेयिनः"। यहाँ स्वाप का आधार ब्रह्म न होकर आकाश है, अतः परमात्मा की प्रतिपत्ति क्योंकर होगी? इस प्रश्न का उत्तर है—"आकाशशब्दश्च परमात्मनि प्रयुक्तः"। मुख्याकाश (भूताकाश) आत्मा का आधार कभी नहीं हो सकता। बहत्तर हजार नाड़ियों की चर्चा कर पुरीतति में जो अवस्थान कहा है, वह भी आत्मा का नहीं, अन्तःकरण का है। फलतः "दहरोऽस्मिन्नन्तरकाशः" (छां. ८।१।१) यहाँ जैसे 'आकाश' शब्द परमात्मा का वाचक है, वैसे ही प्रकृत में भी।
भाष्यकार ने पहले जीव का निराकरण करने के लिए इस सूत्र का अवतरण बताया था, उससे मन्दाधिकारियों को यह भ्रम हो सकता था कि इस सूत्र के द्वारा प्राण का निराकरण नहीं किया गया। वह भ्रम न हो, अतः कहा गया है—"प्राणनिराकरणस्यापि।" यह कहा जा चुका है कि बालाकि और अजातशत्रु—दोनों सोए हुए पुरुष के पास गये। उस पुरुष को अजातशत्रु ने नाम लेकर पुकारा—बृहत्पाण्डुरवासा सोमराजन्! वह पुरुष अजात- शत्रु का शब्द न तो सुन सका और न उठा। अजातशत्रु ने फिर उसे हाथ लगाकर जगाया तब वह उठा। तब अजातशत्रु ने कहा—"यत्रैष एतत्सुप्तोऽभूत्"—इत्यादि। सुप्त पुरुष के उत्थापन से यह प्रदर्शित किया कि वह पुरुष प्राणादि से भिन्न है॥ १८॥