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भामती (वाचस्पति मिश्र - ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य चतुःसूत्री हिन्दी व्याख्या)

Bhamati of Vachaspati Mishra Hindi

वाचस्पति मिश्र (व्याख्याकार: स्वामी योगेन्द्रानन्द) द्वारा

स्रोत: Brahma Sutra Shankara Bhashya with Vachaspati Mishra Bhamati and Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished639 पृष्ठ

द्रष्टृंष्टव्यत्वेन ब्रह्मनिर्देशः ] हिन्दीसहितभामतीसंवलितम् ५७९

भामती दुन्दुभेर्हन्यमानस्य इति ॐ । दुन्दुभिग्रहणेन तद्गतं शब्दसामान्यमुपलक्षयति । न केवलं स्थितिकाले नामरूपप्रपञ्चश्चिदात्मातिरेकेणाग्रहणाच्चिदात्मनो न व्यतिरिच्यतेऽपि तु नामरूपोत्पत्तेः प्रागपि चिद्रूपा-वस्थानात् तदुपादानत्वाच्च नामरूपप्रपञ्चस्य तद्व्यतिरेकः, रज्जूपदानस्येव भुजङ्गस्य रज्जोरव्यतिरेक इत्येतद् दृष्टान्तेन साधयति भगवती श्रुतिः । स यथाऽऽर्द्रेन्धेनेरभ्याहितस्य पृथग्धूमा विनिश्चरन्त्येवं वा अरेऽस्य महतो भूतस्य निःश्वसितमेतद्यदृग्वेद इत्यादिना चतुर्विधो मन्त्र उक्तः, इतिहास इत्यादिनाऽष्टविधं ब्राह्मणमुक्तम् ।

एतदुक्तं भवति — यथाग्निमात्रं प्रथममवगम्यते क्षुद्राणां विस्फुलिङ्गानामुपादानम् । अथ ततो विस्फुलिङ्गा व्युच्चरन्ति न चैतेऽग्नेस्तत्त्वान्यत्वाभ्यां शक्यन्ते निर्वक्तुम् । एवमृग्वेदादयोऽप्यशेषप्रप-ञ्चात् ब्रह्मणो व्युच्चरन्तो न ततस्तत्त्वान्यत्वाभ्यां निरूच्यन्ते श्रृङ्गादिभिर्नामोपलक्ष्यते, यदा च नामधेय-

भामती-व्याख्या ही जगत् का एकमात्र तत्त्व है, उससे अतिरिक्त और कुछ भी नहीं। इसी तथ्य का निगमन भगवती श्रुति ने एक दृष्टान्त के माध्यम से किया है—"स यथा दुन्दुभेर्हन्यमानस्य न बाह्यान् शब्दान् शक्नुयाद् ग्रहणाय, दुन्दुभेस्तु ग्रहणेन दुन्दुभ्याघातस्य वा शब्दो गृहीतः" (बृह० उ० ४।५।८) ! जो पदार्थ जिस वस्तु के ग्रहण के बिना गृहीत नहीं होता, वह पदार्थ उस वस्तु से भिन्न नहीं होता, जैसे रजत शुक्ति से, सर्प रज्जु से, शब्द-विशेष दुन्दुभ्यादि शब्द सामान्य से भिन्न गृहीत नहीं होते, वैसे ही नाम-रूपादि प्रपञ्च अपने स्थिति-काल में भी चिद्रूप-ग्रहण के बिना गृहीत नहीं होता, अतः वह चिदात्मा से भिन्न नहीं । श्रुतिगत 'दुन्दुभि' शब्द के द्वारा शब्द-सामान्य उपलक्षित होता है। नामरूपादि प्रपञ्च केवल अपने स्थिति-काल में ही चिदात्म-ग्रहण के बिना अगृहीत होकर चिदात्मा से अभिन्न सिद्ध नहीं होता, अपि तु अपनी उत्पत्ति से पहले भी चिद्रूपेण अवस्थित होता है, क्योंकि नामरूपादि कार्य चिदुपादानक होने के कारण उपादान कारण से भिन्न कहाँ अवस्थित होगा ? फलतः नामरूपात्मक प्रपञ्च अपनी उत्पत्ति के पूर्व भी चिद्रूप आत्मा से भिन्न वैसे ही नहीं, जैसे रज्जूपदानक सर्प रज्जु से भिन्न नहीं होता। प्रत्येक कार्य अपने उपादान कारण से समुद्भूत होता है—"स यथार्द्रेन्धाग्नेरभ्याहि-तस्य पृथग्धूमा विनिश्चरन्त्येवं वा अरेऽस्य महतो भूतस्य निःश्वसितमेतद् यद् ऋग्वेदो यजुर्वेदः सामवेदोऽथर्वाङ्गिरस इतिहासः पुराणं विद्या उपनिषदः श्लोकाः सूत्राण्यनुव्याख्या-नानि व्याख्यानानि इष्टं हुतमाशितं यामितं च लोका परश्च लोकः सर्वाणि च भूतानि" (बृह० उ० ४।५।११) । 'ऋग्वेदः' इत्यादि से ऋचादि चतुर्विध मन्त्र, 'इतिहासः' इत्यादि से आठ प्रकार का ब्राह्मण-वर्ग वर्णित है [ "तच्चोदकेषु मन्त्राख्या" (जं० सू० २।१।३२) । 'शेषे ब्राह्मणशब्दः' (जै० सू० २।१।३३) इन दोनों सूत्रों में मन्त्र और ब्राह्मण के जो लक्षण किये गये हैं, वे प्रायिक ही बताये गये हैं। इस विषय में वैदिकों के व्यवहार को प्रायः प्रमाण माना गया है। अथर्ववेद के वाक्यों का भी उसी व्यवहार के आधार पर वर्गीकरण किया जा सकता है। वृत्तिकार ने ब्राह्मण वाक्यों का भेद बताते हुए कहा है—

हेतुनिर्वचन निन्दा प्रशंसा संशयो विधिः ।
परक्रिया पुराकल्पो व्यवधारणकल्पना ॥
उपमानं दशेते तु विधयो ब्राह्मणस्य तु ।
एतत् स्यात् सर्ववेदेषु नियतं विधिलक्षणम् ॥ (शाबर० पृ० ४३६)

इन्हीं विधाओं के अनुसार इतिहासादि रूप वैदिक वाक्यों को ब्राह्मण की संज्ञा दी जा सकती है ]। जैसे नन्हीं-नन्ही चिनगारियाँ (विस्फुलिंग) की उपादानकारणभूत अग्नि ही पहले प्रतीत होती है, उसी से चिनगारियाँ फूटती है। चिनगारियाँ वस्तुतः अग्नि से भिन्न न सत् कही जा सकती हैं, न असत् । वैसे ही ऋग्वेदादि पदार्थ ब्रह्म से विना किसी

५१०ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम्[ अ. १ पा. ४ सू. १९

भामती

स्येयं गतिस्तदा तत्पूर्वकस्य रूपधेयस्य कैव कथेति भावः। न केवलं तदुपादानत्वात्ततो न व्यतिरिच्यते नामरूपप्रपञ्चः, प्रलयसमये च तदनुप्रवेशात्ततो न व्यतिरिच्यते। यथा सामुद्रमेवाम्भः पृथिवीतेजः-सम्पर्कात् काठिन्यमुपगतं सैन्धवखिल्यः, स हि स्वाकरे समुद्रे क्षिप्तोऽम्भ एव भवत्येवं चिदम्भोघो लीनं जगच्चिदेव भवति न तु ततोऽतिरिच्यत इति। एतद्दृष्टान्तप्रबन्धेनाह ॐ स यथा सर्वासामपाम् इत्याविः। दृष्टान्तप्रबन्धमुक्त्वा दार्ष्टान्तिके योजयति ॐ एवं वा अरे इदं महत् इति ॐ। वृद्धत्वेन ब्रह्मोक्तम्। इदं ब्रह्मेत्यर्थः। भूतं सत्यम्, अनन्तं नित्यम्, अपारं सर्वगतं, विज्ञानघनो विज्ञानैकरस इति यावत् । एतेभ्यः कार्यकारणभावेन व्यवस्थितेभ्यो भूतेभ्यः समुत्थाय साम्येनोत्थाय कार्यकारणसङ्घातस्य ह्यवच्छेदाद् दुःखित्वशोकित्वादयस्तदवच्छिन्ने चिदात्मनि तद्विपरीतेऽपि प्रतीयन्ते यथोदकप्रतिबिम्बिते चन्द्रमसि तोयगताः कम्पादयस्तदिदं साम्येनोत्थानं, यदा त्वागमाचार्योपदेशपूर्वकमनननिदिध्यासनप्रकर्षपर्यन्तजोऽस्य ब्रह्मस्वरूपसाक्षात्कार उपावर्तते, तदा निर्मृष्टनिखिलवासनाविद्यामलस्य कार्यकारणसङ्घातभूतस्य विनाशे तान्येव भूतानि नश्यन्त्यनु तदुपाधिश्चिदात्मनः खिल्यभावो विनश्यति । ततो न प्रेत्य कार्यकारणभूतनिवृत्तौ रूपगन्धादिसंज्ञास्तीति ।

भामती-व्याख्या

विशेष यत्न के समुद्भूत होकर तत्त्व या अन्यत्वरूप से निरूपित नहीं होते। ऋगादि पदों के द्वारा नामरूपात्मक प्रपञ्च में से 'नाम' उपलक्षित है। जब 'नाम' पदार्थ की यह गति है, तब 'रूप' पदार्थ की बात ही क्या? क्योंकि नाम के माध्यम से ही 'रूप' की सृष्टि प्रतिपादित है— "वेदशब्देभ्य एवादौ पृथक्संस्थाश्च निर्ममे" (मनु. १.२१)। सृष्टि प्रक्रिया के द्वारा ही नाम-रूपात्मक प्रपञ्च अपने उपादानकारणभूत ब्रह्म से भिन्न सिद्ध नहीं होता, प्रलय के समय भी ब्रह्म में ही प्रवेश कर जाने के कारण ब्रह्म से भिन्न नहीं हो सकता। जैसे समुद्र से समुद्भूत नमक पृथिवी आदि के सम्पर्क से कठिन होकर एक घन (डले) के रूप में आ जाता है, और वही सैन्धव-घन अपने आकर (समुद्र) में प्रक्षिप्त होकर समुद्ररूप हो जाता है। वैसे ही नामरूपात्मक प्रपञ्च भी चैतन्य महासागर से भिन्न नहीं, यह रहस्य एक दृष्टान्त के द्वारा प्रकट किया जाता है— "स यथा सर्वासामपां समुद्र एकायनम्” (बृह. उ. ४।५।१२) दार्ष्टान्त में उसी का समन्वय किया गया है— "एवं वा अरे अयमात्माऽनन्तरोऽ-बाह्यः” । 'इदं महद्भूतमन्तमपारं विज्ञानघन एवैतेभ्यो भूतेभ्य समुत्थाय तान्येवानुविन-श्यति" (बृह. उ. २।४।१२) इस श्रुति में 'इदं' शब्द से ब्रह्म का ग्रहण किया गया है, क्योंकि वही महत् (बृहत्) है। 'भूतम्' का अर्थ 'सत्यम्', 'अनन्तम्' का 'नित्यम्' और 'अपारम्' का 'सर्वगतम्' है। 'विज्ञानघनः' का अर्थ विज्ञान से विजातीय पदार्थों के संसर्ग से रहित वा विज्ञानैकरस है [जैसा कि भाष्यकार ने कहा है— "घनशब्दो जात्यन्तरप्रतिषेधार्थः यथा सुवर्णघनोऽयोगनः ] । आशय यह है कि यद्यपि यह जीवात्मा सत्, चित्, अनन्त, जन्म-मरण से रहित शुद्ध ब्रह्मरूप है। तथापि अविद्या-वश कार्य और करण (स्थूल और सूक्ष्म शरीर) के रूप में परिणत आकाशादि भूतों से अपना समुत्थान (साम्यापत्ति या तादात्म्या-ध्यास अनुभव करता है, उनके दुःखी और सुखी होने पर स्वयं को दुःखी और सुखी समझता है। जैसे जलगत चन्द्र-प्रतिबिम्ब में जल के कम्पनादि धर्म प्रतीत होते हैं, वैसे ही शरीरावच्छिन्न आत्मा में शरीर के कर्तृत्वानि धर्म आरोपित हो जाते हैं।

जब आगम और आचार्य का उपदेश पा कर मानव श्रवण, मनन, निदिध्यासनपूर्वक ब्रह्म का साक्षात्कार कर लेता है, तब समस्त वासनाओं (संस्कारों) से युक्त अविद्यारूप मल विनष्ट हो जाता है, अविद्या के कार्यभूत शरीरादि उपाधियाँ समाप्त हो जाती है, आत्मा का वह खिल्यभाव (तादात्म्याध्यास) सदैव के लिए क्षीण हो जाता है, कर्तृत्वादि का भानरूप

द्रष्टव्यत्वेन ब्रह्मनिर्देश ] | हिन्दीसहितभामतोसंवलितम् | ५११

विज्ञानात्मोपदेश इति। कस्मात् ? उपक्रमसामर्थ्यात्। पतिजायापुत्रवित्तादिकं हि भोग्यभूतं सर्वं जगदात्मार्थतया प्रियं भवतीति प्रियसंसूचितं भोक्तारमात्मानमुपक्रम्यानन्तरमिदमात्मनो दर्शनाद्युपदिश्यमानं कस्यान्तरस्यात्मनः स्यात् ? मध्येऽपि 'इदं महद्भूतमन्तमपारं विज्ञानघन एवैतेभ्यो भूतेभ्यः समुत्थाय तान्येवानुविनश्यति न प्रेत्य संज्ञाऽस्ति' इति प्रकृतस्यैव महतो भूतस्य द्रष्टव्यस्य भूतेभ्यः समुत्थानं विज्ञानात्मभावेन ब्रुवन्विज्ञानात्मन एवेदं द्रष्टव्यत्वं दर्शयति। तथा 'विज्ञातारमरे केन विजानीयाद्' इति कर्तृवचनेन शब्देनोपसंहरन्विज्ञानात्मानमेवेहोपदिष्टं दर्शयति । तस्मादात्मविज्ञानेन सर्वविज्ञानवचनं भोक्तृअर्थत्वाद्भोग्यजातस्यौपचारिकं द्रष्टव्यमिति। एवं प्राप्ते ब्रूमः,-

भामती

न प्रेत्य संज्ञास्तीति संज्ञामात्रनिषेधादात्मा नास्तीति मन्यमाना सा मैत्रेयी होवाच, अत्रैव मा भगवान्मुमुहन्नमोहितवान् न प्रेत्य संज्ञास्तीति । स होवाच याज्ञवल्क्यः स्वाभिप्रायं द्वैते हि रूपादिविशेष-संज्ञानिबन्धनो दुःखित्वाद्यभिमानः। आनन्दज्ञानैकरसब्रह्माद्वयानुभवे तु तत् केन कं पश्येत् ब्रह्म वा केन विजानीयात् नहि तदास्य कर्मभावोऽस्ति स्वप्रकाशत्वात्। एतदुक्तं भवति - न संज्ञामात्रं मया व्यासेधि किन्तु विशेषसंज्ञेति। तदेवममृतत्वफलेनोपक्रमान्मध्ये चात्मविज्ञानेन सर्वविज्ञानं प्रतिज्ञाय तदुपपादनात्, उपसंहारे च महद्भूतमन्तमित्यादिना च ब्रह्मरूपाभिधानाद् द्वैतनिन्दया च चाद्वैतगुणकीर्त्तनाद् ब्रह्मैव मैत्रेयीब्राह्मणे प्रतिपाद्यं न जीवात्मेति नास्ति पूर्वपक्ष इत्यनारभ्यमेवेदमधिकरणम् ।

अत्रोच्यते - भोक्तृत्वज्ञातृताजीवरूपोत्थानसमाश्रये मैत्रेयीब्राह्मणे पूर्वपक्षेणोपक्रमः कृतः। पतिजा-यादिभोग्यसम्बन्धो नाभोक्तुर्ब्रह्मणो युज्यते नापि ज्ञातकर्तृत्वमकर्तुः साक्षाच्च महतो भूतस्य विज्ञाना-त्मभावेन समुत्थानाभिधानं विज्ञानात्मन एव द्रष्टव्यत्वमाह। अन्यथा ब्रह्मणो द्रष्टव्यत्वपरेऽस्मिन् ब्राह्मणे तस्य विज्ञानात्मत्वेन समुत्थानाभिधानमनुपयुक्तं स्यात्तस्य तु द्रष्टव्यत्वमुपयुज्यते इत्युपक्रममात्रं

भामती-व्याख्या

विशेष ज्ञान या संज्ञान कभी नहीं होता। "न प्रेत्य संज्ञाऽस्ति" इस प्रकार ज्ञानमात्र का अभाव हो जाने पर आत्मा की सत्ता भी समाप्त हो जायगी—ऐसा समझ कर मैत्रेयी बोली—"अत्रैव मा भगवान् अमूमुहत् 'न प्रेत्यसंज्ञाऽस्तीत्यत्र" अर्थात् आप (याज्ञवल्क्य) ने मुझ (मैत्रेयी) को यह कह कर फिर मोह में डाल दिया कि मरने के बाद किसी प्रकार का भी ज्ञान नहीं रहता। याज्ञवल्क्य ने उत्तर दिया—"न वा अरेऽहं मोहं ब्रवीमि, अलं वा अरे इदं विज्ञानाय यत्र हि द्वैतमिव भवति, तदितर इतरं जिघ्रति। यत्र वा अस्य सर्वमात्मैवाभूत् तत्केन कं जिघ्रेत्" (बृ. उ. ४।५।१४)। अर्थात् जिस (अज्ञान की) अवस्था में द्वैत प्रपञ्च की काल्पनिक सत्ता रहती है, तब रूपादि अनुकूल-प्रतिकूल विषय की प्रतीति से आत्मा में सुखित्व-दुःखित्वादि का भान होता है। आनन्दज्ञानैकरस ब्रह्म की साक्षात्कारावस्था में मैं (याज्ञवल्क्य) ने संज्ञानमात्र का निषेध नहीं किया किन्तु विशेष ज्ञान का ही निराकरण किया है। इस प्रकार जहाँ अमृतत्वरूप फल के संकीर्तन से उपक्रम किया गया, मध्य में आत्मविज्ञान के द्वारा सर्व-ज्ञान की प्राप्ति कही गई और उपसंहार में महद्भूतम्—इत्यादि पदों के द्वारा ब्रह्म का अभिधान किया गया । इतना ही नहीं, द्वैत-निन्दा के द्वारा अद्वैत की स्तुति की गई। ऐसे मैत्रेयी ब्राह्मण का प्रतिपाद्य एकमात्र ब्रह्म ही निश्चित होता है, अतः न तो यहाँ जीवात्मा का सन्देह होता है और जीवात्मा के प्रतिपादन का पूर्व पक्ष । फलतः यह अधिकरण निरर्थक-सा है।

समाधान - मैत्रेयी ब्राह्मण जीवपरक है, ऐसा पूर्वपक्ष में प्रस्तावमात्र किया गया है, वह इस लिए कि भोक्तृत्वादि के द्वारा जो जीव-ब्रह्म के भेद की शङ्का की गई है, उसका समाधान हो सके। ब्रह्म अभोक्ता और अकर्ता है, अतः भोग्य-सम्बन्धरूप भोक्तृत्व और ज्ञान-

५१२ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम्[ अ. १ पा. ४ सू. २०

परमात्मोपदेश एवायम् । कस्मात् ? वाक्यान्वयात् । वाक्यं हीदं पौर्वापर्येणावेक्ष्यमाणं परमात्मानं प्रति अन्वितावयवं लक्ष्यते । कथमिति ? तदुपपाद्यते—'अमृतत्वस्य तु नाशास्ति वित्तेन इति याज्ञवल्क्यादुपश्रुत्य 'येनाहं नामृता स्यां किमहं तेन कुर्यां यदेव भगवान् वेद तदेव मे ब्रूहि' इत्यमृतत्वमाशासानायै मैत्रेय्या याज्ञवल्क्य आत्म-विज्ञानमिदमुपदिशति । न चान्यत्र परमात्मविज्ञानादमृतत्वमस्तीति श्रुतिस्मृतिवादा वदन्ति । तथा चात्मविज्ञानेन सर्वविज्ञानमुच्यमानं नान्यत्र परमकारणविज्ञानान्मुख्य-मवकल्पते । नचैतदौपचारिकमाश्रयितुं शक्यं, यत्कारणमात्मविज्ञानेन सर्वविज्ञानं प्रतिज्ञायानन्तरेण ग्रन्थेन तदेवोपपादयति—'ब्रह्म तं परादाद्योऽन्यत्रात्मनो ब्रह्म वेद' इत्यादिना । यो हि ब्रह्मक्षत्रादिकं जगदात्मनोऽन्यत्र स्वातन्त्र्येण लब्धसद्भावं पश्यति तं मिथ्यादर्शिनं तदेव मिथ्यादृष्टं ब्रह्मक्षत्रादिकं जगतपराकरोतीति भेददृष्टिमपोद्य 'इदं सर्वं यदयमात्मा' इति सर्वस्य वस्तुजातस्यात्माव्यतिरेकमवतारयति । दुन्दुभ्यादि-दृष्टान्तैश्च ( बृ० ४।५।८ ) तमेवान्यतिरेकं द्रढयति 'अस्य महतो भूतस्य निःश्वसि-तमेतद्यदृग्वेदः' ( बृ० ४।५।११ ) इत्यादिना च प्रकृतस्यात्मनो नामरूपकर्मप्रपञ्च-कारणतां व्याचक्षाणः परमात्मानमेनं गमयति । तथैकैकायनप्रक्रियायामपि ( बृ० ४।५।१२ ) सविषयस्य सेन्द्रियस्य सान्तःकरणस्य प्रपञ्चस्यैकायनमनन्तरमबाह्यं कृत्स्नं प्रज्ञानघनं व्याचक्षाणः परमात्मानमेनं गमयति । तस्मात्परमात्मन एवायं दर्शनाद्युप-देश इति गम्यते ॥ १९ ॥

यत्पुनरुक्तं—प्रियसंसूचितोपक्रमाद्विज्ञानात्मन एवायं दर्शनाद्युपदेश इति, अत्र ब्रूमः—

प्रतिज्ञासिद्धेर्लिङ्गमाश्मरथ्यः ॥ २० ॥

अस्त्यत्र प्रतिज्ञा 'आत्मनि विज्ञाते सर्वमिदं विज्ञातं भवति', 'इदं सर्वं यदय-


भामती

पूर्वपक्षः कृतः । ॐ भोक्त्रर्थत्वाच्च भोग्यजातस्येति ॐ तदुपोद्वलनमात्रम् । सिद्धान्तस्तु निगदव्याख्यातेन भाष्येणोक्तः ॥ १९ ॥

तदेवं पौर्वापर्यालोचनया मैत्रेयीब्राह्मणस्य ब्रह्मदर्शनपरत्वे स्थिते भोक्त्रा जीवात्मनोपक्रममा-चार्य्यै देशीयमतेन तावत्समाधत्ते सूत्रकारः— ॐ प्रतिज्ञासिद्धेर्लिङ्गमाश्मरथ्यः ॐ । यथा हि वह्नेर्विकारा व्युच्चरन्तो विस्फुलिङ्गा न वह्नेरत्यन्तं भिद्यन्ते तद्रूपनिरूपणस्वाभाव्यापि ततोऽत्यन्तमभिन्नावह्नेरिव परस्पर-


भामती-व्याख्या

जनकत्वरूप कर्तृत्व के प्रतिपादन का ब्रह्म में कोई उपयोग नहीं। व्यापक एवं भूतरूप ब्रह्म के जीवरूप से समुत्थान ( जन्म ) का प्रतिपादन भी जीव की द्रष्टव्यता सूचित करता है। यदि इस ब्राह्मण में ब्रह्म की द्रष्टव्यता का अभिधान माना जाता है, तब जीवरूप से ब्रह्म की उत्पत्ति का प्रतिपादन अनुपयुक्त हो जाता है और जीव की द्रष्टव्यता का अभिधान मानने पर उक्त समुत्थान का कथन उपयुक्त हो जाता है—इस प्रकार पूर्वपक्षी का उपक्रम मात्र है और "भोक्त्रर्थत्वाच्च भोग्यजातस्य"—ऐसा कहना उस उपक्रम का उपोद्वलक ( पोषक ) है। फलतः पूर्वपक्ष उपपन्न हो जाता है, जिसके निराकरण में अधिकरण की सार्थकता सिद्ध हो जाती है। सिद्धान्त-भाष्य नितान्त सुबोध ॥ १९ ॥

पौर्वापर्य की आलोचना से मैत्रेयी ब्राह्मण की ब्रह्म-दर्शनपरता निश्चित हो जाने पर जो यह प्रश्न उठता है कि भोक्तारूप जीव का उपक्रम इस ब्राह्मण में क्यों किया गया ?

द्रष्टव्यत्वेन ब्रह्मनिर्देशः ] हिन्दीसहितभामतीसंवलितम् ५१३

मात्मा' इति च। तस्याः प्रतिज्ञायाः सिद्धिं सूचयत्येतल्लिङ्गं यत्प्रियसंसूचितस्या- त्मनो द्रष्टव्यत्वादिसंकीर्तनम्। यदि हि विज्ञानात्मा परमात्मनोऽन्यः स्यात्ततः पर- मात्मविज्ञानेऽपि विज्ञानात्मा न विज्ञात इत्येकविज्ञानेन सर्वविज्ञानं यत्प्रतिज्ञातं तद्धीयेत। तस्मात्प्रतिज्ञासिद्धयर्थं विज्ञानात्मपरमात्मनोरभेदांशेनोपक्रमणमित्या- श्मरथ्य आचार्यो मन्यते ॥ २० ॥

उत्क्रमिष्यत एवंभावादित्यौडुलोमिः ॥ २१ ॥

विज्ञानात्मन एव देहेन्द्रियमनोबुद्धिसंघातोपाधिसंपर्कात्कलुषीभूतस्य ज्ञानध्या- नादिसाधनानुष्ठानात् संप्रसन्नस्य देहादिसंघातादुत्क्रमिष्यतः परमात्मैक्योपपत्तेरिदम-

भामती

व्यावृत्त्यभावप्रसङ्गात्, तथा जीवात्मानोऽपि ब्रह्मविकारा न ब्रह्मणोऽत्यन्तं भिद्यन्ते चिद्रूपस्वभावप्रसङ्गा- ज्ञाप्यत्यन्तं न भिद्यन्ते परस्परं व्यावृत्त्यभावप्रसङ्गात्, सर्वज्ञं प्रत्युपदेशवैयर्थ्याच्च। तस्मात् कथम्चिद्भेदो जीवात्मनामभेदश्च। तत्र तद्विज्ञानेन सर्वविज्ञानप्रतिज्ञासिद्धये विज्ञानात्मपरमात्मनोरभेदमुपादाय परमा- त्मनि दर्शयितव्ये विज्ञानात्मनोपक्रम इत्याश्मरथ्य आचार्यो मेने ॥ २० ॥

आचार्यदेशीयान्तरमतेन समाधत्ते — उत्क्रमिष्यत एवंभावादित्यौडुलोमिः। जीवो हि परमात्मनोऽ- त्यन्तं भिन्न एव सन् देहेन्द्रियमनोबुद्ध्युपधानसम्पर्कत्संवदा कलुषस्तस्य च ज्ञानध्यानादिसाधनानुष्ठानात् सम्प्रसन्नस्य देहेन्द्रियादिसङ्घातादुत्क्रमिष्यतः परमात्मनैक्योपपत्तेरिदमभेदेनोपक्रमणम्। एतदुक्तं भवति—

भामती-व्याख्या

उसका उत्तर आचार्य आश्मरथ्य की दृष्टि से दिया जाता है— "प्रतिज्ञासिद्धेर्लिङ्गमाश्मरथ्यः"। जैसे अग्नि से निकलनेवाली अग्नि की विकारभूत चिनगारियां अग्नि से अत्यन्त भिन्न नहीं होतीं, क्योंकि वे भी अग्निरूप ही समझी जाती हैं। इसी प्रकार उन चिनगारियों को अग्नि से अत्यन्त अभिन्न भी नहीं कह सकते, क्योंकि 'अग्नेः विस्फुलिङ्गाः'—यहाँ पर 'अग्नि' पद और 'विस्फुलिङ्ग' पद का परस्पर जो व्यावर्य-व्यावर्तकभाव माना जाता है, वह अत्यन्त अभेद में नहीं बन सकेगा [ जैसे 'शङ्खस्य शुक्लता'— यहाँ पर 'शङ्ख' पद घट-पटादि द्रव्य का एवं 'शुक्लता' पद नीलादि गुणों का व्यावर्तक माना जाता है। वैसे ही 'अग्नेः विस्फुलिङ्गाः' इत्यादि-षष्ठ्यन्त-प्रयोग या उद्देश्य-विधेयभावस्थल पर प्रायः सर्वत्र परस्पर व्यावर्य- व्यावर्तकभाव माना जाता है ]। वैसे ही ब्रह्म के विकारभूत जीवात्मा भी ब्रह्म से न तो अत्यन्त भिन्न होते हैं और न अत्यन्त अभिन्न, क्योंकि एक ब्रह्म के विज्ञान से सभी जीवों का ज्ञान तभी हो सकता है, जब कि जीव और ब्रह्म का अभेद हो और 'आत्मायं द्रष्टव्यः' 'अहं ब्रह्म'—इत्यादि स्थलों पर जीवात्मा के उद्देश्य से द्रष्टव्यत्व या ब्रह्मत्व का विधान तभी हो सकता है, जब कि जीव और ब्रह्म का कुछ भेद भी हो। भेदाभेद-पक्ष में ही जीवरूपेण उपक्रम और एक के विज्ञान से सर्व-विज्ञान की प्रतिज्ञा ये दोनों प्रक्रियाएँ उपपन्न होती हैं—ऐसा आचार्य आश्मरथ्य मानते हैं ॥ २० ॥

आश्मरथ्य के द्वारा उद्भावित पूर्वपक्ष का समाधान आचार्य औडुलोमि के मत से किया जाता है— "उत्क्रमिष्यते एवंभावादित्यौडुलोमिः"। आचार्यवर औडुलोमि का कहना है कि जीव ब्रह्म से अत्यन्त भिन्न है और देह, इन्द्रिय, मन एवं बुद्धिरूप उपाधियों के सम्पर्क से सदैव कलुषित रहता आया है। ज्ञान-ध्यानादि साधनों के अनुष्ठान से विमल होकर देहेन्द्रियादि-संघात से उत्क्रमण करने पर जीव का ब्रह्म से ऐक्य स्थापित हो जाता है, इस भावी ऐक्य ( अभेद ) को ध्यान में रख कर जीव का उपक्रम किया गया है, अतः एक के विज्ञान से सर्व-विज्ञान का प्रतिपादन विरुद्ध नहीं। संसारावस्थाक भेद भी मोक्षावस्थाक

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५१४ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम्[ अ. १ पा. ४ सू. २२

भेदेनोपक्रमणमित्यौडुलोमिराचार्यो मन्यते । श्रुतिश्चैवं भवति — ‘एष संप्रसादोऽस्मा- च्छरीरात्समुत्थाय परं ज्योतिरुपसंपद्य स्वेन रूपेणाभिनिष्पद्यते’ (छा० ८।१२।३) इति । क्वचिच्च जीवाश्रयमपि नामरूपं नदीनिदर्शनेन ज्ञापयति—‘यथा नद्यः स्यन्द- मानाः समुद्रेऽस्तं गच्छन्ति नामरूपे विहाय । तथा विद्वाञ्नामरूपाद्विमुक्तः परात्परं पुरुषमुपैति दिव्यम्’ (मुण्ड० ३।२।८) इति । यथा लोके नद्यः स्वाश्रयमेव नामरूपं विहाय समुद्रमुपयन्त्येवं जीवोऽपि स्वाश्रयमेव नामरूपं विहाय परं पुरुषमुपैतीति हि तत्रार्थः प्रतीयते दृष्टान्तदार्ष्टान्तिकयोस्तुल्यतायै ॥ २१ ॥

अवस्थितेरिति काशकृत्स्नः ॥ २२ ॥

अस्यैव परमात्मनोऽनेनापि विज्ञानात्मभावेनावस्थानादुपपन्नमिदमभेदेनोपक्रमण-


भामती

भविष्यन्तमभेदमपादाय भेदकालेऽप्यभेद उक्तः, यथाहूः पाञ्चरात्रिकाः—
आमुक्तेर्भेद एव स्याज्जीवस्य च परस्य च ।
मुक्तस्य तु न भेदोऽस्ति भेदहेतोरभावतः ॥ इति ।
अत्रैव श्रुतिमुपन्यस्यति ॐ श्रुतिश्चैवम् इति ॐ । पूर्वं देहेन्द्रियाद्युपाधिकृतं कालुष्यमात्मन उक्तं, सम्प्रति स्वाभाविकमेव जीवस्य नामरूपप्रपञ्चाश्रयत्वलक्षणं कालुष्यं पार्थिवानांमणूनामिव श्यामत्वं केवलं पाकेनेव ज्ञानध्यानादिना तदपनोद्य जीवः परात्परतरं पुरुषमुपैतीत्याह ॐ क्वचिच्च जीवाश्रयमपि इति ॐ । नदीनिदर्शनं यथा सोम्येमा नद्य इति ॥ २१ ॥
तदेवमाचार्यदेशीयमतद्वयमुक्त्वाऽत्र परितुष्यन्नाचार्यमतमाह सूत्रकारः— अवस्थितेरिति काशकृत्स्नः । एतद् व्याचष्टे ॐ अस्यैव परमात्मनः इति ॐ । न जीव आत्मनोऽन्यो नापि तद्विकारः किन्त्वात्मैवाविद्यो-पधानकल्पितावच्छेदः, आकाश इव घटमणिकादिकल्पितावच्छेदो घटाकाशो मणिकाकाशो न तु परमा-


भामती-व्याख्या

अभेद में पर्यवसित हो जाता है । पाञ्चरात्रिक आचार्यगण कहते हैं—
आमुक्तेर्भेद एवासीज्जीवस्य परस्य च ।
मुक्तस्य तु न भेदोऽस्ति भेदहेतोरभावतः ॥
इसी मत के समर्थन में श्रुति प्रस्तुत की जाती है—“श्रुतिश्चैवं भवति” एष सम्प्रसादोऽस्मात् शरीरात् समुत्थाय परं ज्योतिरुपसम्पद्य” (छां० ८।१२।३) ।
पहले देहेन्द्रियादि उपाधियों के द्वारा आहित जीवगत कालुष्य कहा गया, अब जीव में नाम-रूपात्मक प्रपञ्च का आश्रयत्वरूप कालुष्य स्वाभाविक कहा जाता है—“क्वचिच्च जीवाश्रयमपि नामरूपं नदीनिदर्शनेन ज्ञापयति” । नदी का दृष्टान्त इस प्रकार है—“यथा नद्यः स्यन्दमानाः समुद्रेऽस्तं गच्छन्ति नामरूपे विहाय” (मुण्ड० ३।२।८) । अर्थात् जैसे नदियाँ अपने स्वाभाविक नाम (गङ्गादि) और रूप (श्वेत प्रवाहादि) का परित्याग करके समुद्र रूप हो जाती हैं, वैसे ही जीव भी अपने स्वाभाविक प्रपञ्चाश्रयत्वरूप कालुष्य को छोड़कर ब्रह्मरूप हो जाता है ॥ २१ ॥
कथित दोनों आचार्यों के मतों में असन्तोष व्यक्त करते हुए आचार्य काशकृत्स्न का सिद्धान्त सूत्रकार ने प्रस्तुत किया है— “अवस्थितेरिति काशकृत्स्नः” । इस सूत्र की भाष्यकार व्याख्या कर रहे हैं— “अस्यैव परमात्मनः” । जीव न तो ब्रह्म से भिन्न है और न उसका विकार, किन्तु ब्रह्म ही अविद्यारूप उपाधि के द्वारा कल्पित भेद से वैसे ही भिन्न प्रतीत होता है, जैसे घटादि उपाधियों से परिच्छिन्न होकर ‘घटाकाश’, ‘मणिकाश’ इत्यादि । घटाकाशादि भी न तो परमाकाश से भिन्न होते हैं और न उसके विकार । इस प्रकार उक्त श्रुति-सन्दर्भ में

[द्रष्टव्यत्वेन ब्रह्मनिर्देशः ] हिन्दीसहितभामतीसंवलितम् ५१५

मिति काशकृत्स्न आचार्यो मन्यते। तथाच ब्राह्मणम्—'अनेन जीवेनात्मनानुप्रविश्य नामरूपे व्याकरवाणि' ( छा० ६।३।२ ) इत्येवंजातीयकं परस्यैवात्मनो जीवभावेनावस्थानं दर्शयति। मन्त्रवर्णश्च—'सर्वाणि रूपाणि विचित्य धीरो नामानि कृत्वाभिवदन् यदास्ते' ( तै० आ० ३।१२।७ ) इत्येवंजातीयकः। न च तेजःप्रभृतीनां सृष्टौ जीवस्य पृथक्सृष्टिः श्रुता, येन परस्मादात्मनोऽन्यस्तद्विकारो जीवः स्यात्। काशकृत्स्नस्याचार्यस्याविकृतः परमेश्वरो जीवो नान्य इति मतम्। आश्मरथ्यस्य तु यद्यपि जीवस्य परस्मादनन्यत्वमभिप्रेतं, तथापि प्रतिज्ञासिद्धेरिति सापेक्षत्वाभिधानात्कार्यकारणभावः कियानप्यभिप्रेत इति गम्यते। औडुलोमिपक्षे पुनः स्पष्टमेवावस्थान्तरापेक्षौ भेदाभेदौ गम्येते। तत्र काशकृत्स्नीयं मतं श्रुत्यनुसारोति गम्यते, प्रतिपिपादयिषिता-

भामती

काशाद्व्यस्तद्विकारो वा । ततश्च जीवात्मनोपक्रमः परमात्मनैवोपक्रमस्तस्य ततोऽभेदात् । स्थूलदर्शिलोकप्रतीतिसौकर्यायौपाधिकेनात्मरूपेणोपक्रमः कृतः । अत्रैव श्रुतिं प्रमाणयति ॐ तथा च इति ॐ । अथ विकारः परमात्मनो जीवः कस्मान्न भवत्याकाशादिवदित्याह ॐ न च तेजःप्रभृतीनाम् इति ॐ । नहि यथा तेजःप्रभृतीनामात्मविकारत्वं श्रूयते एवं जीवस्येति । आचार्यत्रयमतं विभजते ॐ काशकृत्स्नस्याचार्यस्य इति ॐ । आत्यन्तिके सत्यभेदे कार्यकारणभावाभावात् अनात्यन्तिकोऽभेद आस्थेयस्तथा च कथञ्चिद् भेदोऽपीति तमास्थाय कार्यकारणभाव इति । कियानपीत्युक्तं मतत्रयमुक्त्वा काशकृत्स्नीयमतं साधुत्वेन निर्धारयति ॐ तत्र तेषु मध्ये काशकृत्स्नीयं मतम् इति ॐ । आत्यन्तिके हि जीवपरमात्मनोरभेदे तात्त्विकेऽनाद्यविद्योपाधिकल्पितो भेदस्तत्त्वमसीति जीवात्मनो ब्रह्मभावत्वोपदेशश्रवणमनननिदिध्यासनप्रकर्षपर्यन्तजमना साक्षात्कारेण विद्यया शक्यः समूलकाषं कषितुं रज्जुवामहिविभ्रम इव रज्जुतत्त्वसाक्षात्कारेण, राजपुत्रस्येव च म्लेच्छकुले वर्द्धमानस्यात्मनि समारोपितो म्लेच्छभावो राजपुत्रोऽसीति प्राप्तोपदेशेन । न तु मृद्विकार-

भामती-व्याख्या

जीव का उपक्रम वस्तुतः ब्रह्म का ही उपक्रम है, क्योंकि जीव का ब्रह्म से अभेद है। स्थूल में दृष्टिवाले लौकिक व्यक्तियों की सुविधा को ध्यान रख कर औपाधिक रूप से आत्मा का उपक्रम किया गया है। इस अर्थ में श्रुति प्रमाण प्रदर्शित करते हैं—"तथा च ब्राह्मणम्" । जीव ब्रह्म का विकार क्यों नहीं ? इस प्रश्न का उत्तर है—न च तेजः प्रभृतीनां सृष्टौ जीवस्य पृथक् सृष्टिः श्रुतः"। जैसे "तत् तेजोऽसृजत" ( छां० ६।२।३ ) इत्यादि श्रुतियों में तेज आदि की सृष्टि प्रतिपादित है, वैसे जीव की सृष्टि कहीं भी अभिहित नहीं, अतः जीव विकार नहीं हो सकता।

सूत्रित आचार्य-त्रयी के मतों का सिंहावलोकन किया जाता है—"काशकृत्स्नस्याचार्यस्य"। आशय यह है कि आत्यन्तिक अभेद मानने पर कार्य-कारणभाव नहीं बन सकता, अतः जीव और ब्रह्म का अनात्यन्तिक ( कथंचित् ) अभेद मानना होगा, तब कथंचित् भेद भी सम्भव हो जाता है, उस (भेद) को लेकर कार्य-कारणभाव उपपन्न हो जाता है, भाष्यकार ने यही कहा है—"कार्यकारणभावः कियानपि अभिप्रेतः"। तीनों का परिचय देकर उनमें काशकृत्स्नीय मत को उपनिषदंसारी बताया जाता है—'तत्र' अर्थात् 'तेषु मध्ये' "काशकृत्स्नायं मतं श्रुत्यनुसारीति गम्यते"। सारांश यह है कि जीव और ब्रह्म का आत्यन्तिक अभेद तात्त्विक होने पर भी अनादि अविद्यारूप उपाधि के द्वारा कल्पित जो भेद प्रतीत होता है उसका "तत्त्वमसि"—इत्यादि महावाक्यों के द्वारा जीव में ब्रह्मभाव के तात्त्विक श्रवण, मनन और निदिध्यासन के अनुष्ठान से समुत्पन्न अभेद-साक्षात्कार वैसे ही समूल नाश कर दिया करता है, जैसे रज्जु में समुत्पन्न सर्प-भ्रम को रज्जुतत्त्व का साक्षात्कार। अथवा जैसे म्लेच्छ-कुल में परिपोषित होने के कारण राज-पुत्र में समारोपित

५१६ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम्[ अ १ पा. ४ सू. २३

र्थानुसारत्वात् 'तत्त्वमसि' इत्यादिश्रुतिभ्यः। एवं च सति तज्ज्ञानादमृतत्वमवकल्पते। विकारात्मकत्वे हि जीवस्याभ्युपगम्यमाने विकारस्य प्रकृतिसम्बन्धे प्रलयप्रसङ्गान्न तज्ज्ञानादमृतत्वमवकल्पेत। अतश्च स्वाश्रयस्य नामरूपस्यासंभवादुपाध्याश्रयं नामरूपं जीव उपचर्यते। अत एवोत्पत्तिरपि जीवस्य कचिदग्निविस्फुलिङ्गोदाहरणेन श्राव्यमाणोपाध्याश्रयैव वेदितव्या। यदप्युक्तं—प्रकृतस्यैव महतो भूतस्य द्रष्टव्यस्य

भामती

शरावादिः शतशोपि मृन्मृदिति चिन्त्यमानस्तज्जन्मना मृद्भावसाक्षात्कारेण शक्यो निवर्तयितुं, तत् कस्य हेतोः? तस्यापि मृदो भिन्नाभिन्नस्य तात्त्विकत्वात्, वस्तुनस्तु ज्ञानेनोच्छेत्तुमशक्यत्वात्, सोऽयं प्रतिपिपादयिषिताथानुसारः। अपि च जीवस्यात्मविकारत्वे तस्य ज्ञानध्यानादिसाधनानुष्ठानात् स्वप्रकृतावप्यये सति नामृतत्वस्याशास्तीत्यपुरुषार्थत्वममृतत्वप्राप्तिश्रुतिविरोधश्च। काशकृत्स्नमते त्वेतदुभयं नास्तीत्याह एवं सति इति। ननु यदि जीवो न विकारः किन्तु ब्रह्मैव, कथं तर्हि तस्मिन्नामरूपापाध्यत्वश्रुतिः कथञ्च यथग्नेः क्षुद्रा विस्फुलिङ्गा इति ब्रह्मविकारश्रुतिर इत्याशङ्कामुपसंहारव्याजेन निराकरोति अतश्च स्वाश्रयस्य इति। यतः प्रतिपिपादयिषिताथानुसारश्चामृतत्वप्राप्तिश्च विकारपक्षे न सम्भवतः, अतश्चेति योजना। द्वितीयपूर्वपक्षबीजमनयेवं त्रिसूत्र्यापाकरोति यदप्युक्तम् इति। शेषमतिरोहितार्थं व्याख्या-

भामती-व्याख्या

म्लेच्छभाव को 'राजपुत्रोऽसि'—इस प्रकार के आप्तोपदेश से जनित तत्त्व-साक्षात्कार विनष्ट कर दिया करता है। यदि जीवभाव को ब्रह्म का विकार माना जाता, तब ब्रह्म के साक्षात्कार से उसकी निवृत्ति नहीं होती, क्योंकि मृत्तिका के विकारभूत घट, शराव (कसोरा या परई) आदि का विनाश मृत्तिका का सैकड़ों बार चिन्तन या साक्षात्कार करने पर भी नहीं होता। वह क्यों? इस लिए कि घट-शराव आदि मृत्तिका से भिन्नाभिन्न होने पर भी तात्त्विक होते हैं, काल्पनिक नहीं। कल्पना-प्रसूत पदार्थ ही ज्ञान के द्वारा उच्छिन्न होते हैं, वास्तविक वस्तु-तत्त्व नहीं, अतः काशकृत्स्नीय मत वेदान्त में प्रतिपिपादयिषित प्रक्रिया के अनुरूप है। दूसरी बात यह भी है कि जीव को यदि ब्रह्म का विकार माना जाता है, तब वह अपनी प्रकृतिभूत ब्रह्म को अपना स्वरूप मान कर वैसा ही ध्यान का अनुष्ठान करेगा फलतः उसी प्रकृति में लीन हो जायगा। इसे दर्शनकारों ने प्रकृति-लय की संज्ञा देते हुए आत्मा का बन्धन ही माना है, मोक्ष नहीं—"तत्र प्रकृतावात्मज्ञानाद् ये प्रकृतिमुपासते, तेषां प्राकृतिको बन्धः, यः पुराणे प्रकृतिलयान् प्रत्युच्यते—'पूर्ण शतसहस्रं हि तिष्ठन्त्यव्यक्तचिन्तकाः' (सां. त. कौ. पृ. ८६)। प्रकृति-लय से अमृतत्व (मोक्ष) की कोई आशा नहीं, प्रत्युत अमृतत्व-प्राप्ति-बोधक श्रुतियों का विरोध ही उपस्थित होता है। काशकृत्स्नीय मत में अमृतत्व का अभाव और अभेद-श्रुति-विरोध—ये दोनों आपत्तियां नहीं हैं—"एवं च सति तज्ज्ञानादमृतत्वमवकल्पते"। यदि जीव ब्रह्म का विकार नहीं, अपितु ब्रह्मरूप ही है, तब श्रुति ने जीव में नाम और रूप की आश्रयता क्यों कही है? एवं "यथाग्नेः क्षुद्रा विस्फुलिङ्गाः" (बृह० उ० २।१।२०) इत्यादि श्रुतियों ने जीव को ब्रह्म का विकार क्यों कहा है? इन शङ्काओं का निराकरण करते हुए उपसंहार किया जाता है—अतश्च स्वाश्रयस्य नामरूपस्यासम्भवाद् उपाध्याश्रयं नामरूपं जीवे उपचर्यते"। यहाँ 'अतः' शब्द 'यतः' शब्द की नित्य अपेक्षा करता है, इस लिए 'यतः प्रतिपिपादयिषिताथानुसारश्चामृतत्वप्राप्तिश्च विकारपक्षे न सम्भवतः, अतः—ऐसी योजना कर लेनी चाहिए।

[ उक्त स्थल पर जीव के द्रष्टव्यताभिधानरूप पूर्व पक्ष में तीन हेतु प्रस्तुत किए गए—(१) सन्दर्भ-श्रुति के उपक्रम में जीव का प्रतिपादन। (२) उत्थान-श्रुति में जीवाभेदा-

द्रष्टव्यत्वेन ब्रह्मनिर्देशः ] हिन्दीसहितभामतीसंवलितम् ५१७

भूतेभ्यः समुत्थानं विज्ञानात्मभावेन दर्शयन् विज्ञानात्मन एवेदं द्रष्टव्यत्वं दर्शय- तीति। तत्रापीयमेव त्रिसूत्री योजयितव्या—'प्रतिज्ञासिद्धेर्लिङ्गमाश्मरथ्यः'। इदमत्र प्रतिज्ञातम्—'आत्मनि विदिते सर्वं विदितं भवति' 'इदं सर्वं यदयमात्मा' (बृह० २।४।६) इति च। उपपादितं च, सर्वस्य नामरूपकर्मप्रपञ्चस्यैकप्रसवत्वादेकप्रलय- त्वाच्च दुन्दुभ्यादिदृष्टान्तैश्च कार्यकारणयोरव्यतिरेकप्रतिपादनात्। तस्या एव प्रति- ज्ञायाः सिद्धिं सूचयत्येतल्लिङ्गं यन्महतो भूतस्य द्रष्टव्यस्य भूतेभ्यः समुत्थानं विज्ञाना- त्मभावेन कथितमित्याश्मरथ्य आचार्यो मन्यते। अभेदे हि सत्येकविज्ञानेन सर्वं विज्ञानं प्रतिज्ञातमवकल्पत इति।

'उत्क्रमिष्यत एवंभावादित्यौडुलोमिः'। उत्क्रमिष्यतो विज्ञानात्मनो ज्ञानध्याना- दिसामर्थ्यात् संप्रसन्नस्य परेणात्मनैक्यसंभवादिदमभेदाभिधानमित्यौडुलोमिराचार्यो मन्यते।

'अवस्थितेरिति काशकृत्स्नः'। अस्यैव परमात्मनोऽनेनापि विज्ञानात्मभावेनाव- स्थानादुपपन्नमिदमभेदाभिधानमिति काशकृत्स्न आचार्यो मन्यते।

नन्वूच्छेदाभिधानमेतत् 'एतेभ्यो भूतेभ्यः समुत्थाय तान्येवानुविनश्यति न प्रेत्य संज्ञास्ति' (बृह० २।४।१२) इति, कथमेतदभेदाभिधानम्? नैष दोषः, विशेषविज्ञान- विनाशाभिप्रायमेतद्विनाशाभिधानं, नात्मोच्छेदाभिप्रायम्। 'अत्रैव मा भगवान्मुमुहन्न प्रेत्य संज्ञास्ति' इति पर्यनुयुज्य स्वयमेव श्रुत्याऽर्थान्तरस्य दर्शितत्वात्—'न वा अरेऽहं मोहं ब्रवीम्यविनाशी वा अरेऽयमात्मानुच्छित्तिधर्मा मात्रासंसर्गस्त्वस्य भवति' इति। एतदुक्तं भवति—कूटस्थनित्य एवायं विज्ञानघन आत्मा नास्योच्छेदप्रस- ङ्गोऽस्ति। मात्राभिस्त्वस्य भूतेन्द्रियलक्षणाभिरविद्याकृताभिरसंसर्गो विद्यया भवति। संसर्गाभावे च तत्कृतस्य विशेषविज्ञानस्याभावान्न प्रेत्य संज्ञास्तीत्युक्तमिति। यदप्यु- क्तम्—'विज्ञातारमरे केन विजानीयात्' इति कर्तृवचनेन शब्देनोपसंहाराद्विज्ञानात्मन


भामती

तार्थञ्च। तृतीयपूर्वपक्षबीजनिरासे काशकृत्स्नीयेनैवेत्यवधारणं तन्मताश्रयणेनैव तस्य शक्यनिरासत्वात्। ऐकान्तिके ह्यद्वैते आत्मनोऽन्यकर्मकरणे केन कं पश्येदिति आत्मनश्च कर्मत्वं विज्ञातारमरे केन विजानीया- दिति शक्यं निषेद्धुम्। भेदाभेदपक्षे वैकान्तिके वा भेदे सर्वमेतदद्वैताश्रयमशक्यमित्यवधारणस्यार्थः। न केवलं काशकृत्स्नीयदर्शनाश्रयेण भूतपूर्वंगत्या विज्ञातृत्वमपि तु श्रुतिपौर्वापर्यपर्यालोचनयाप्येवमेवेत्याह


भामती-व्याख्या

भिधान और (३) 'विज्ञातृ' शब्द का प्रयोग। इनमें से प्रथम हेतु का निरास जिस त्रिसूत्री के द्वारा किया गया, उसी] त्रिसूत्री के द्वारा द्वितीय हेतु का भी अपाकरण किया जाता है—"यदप्युक्तं प्रकृतस्यैव विज्ञानात्मन एवेदं द्रष्टव्यत्वं दर्शयतीति, तत्रापीयमेव त्रिसूत्री योजयितव्या"। शेष भाष्य स्पष्टार्थक है, जिसकी व्याख्या भी प्रायः पहले की जा चुकी है।

पूर्व पक्ष के तृतीय हेतु का अनुवाद करते हुए निरास किया जाता है—"यदप्युक्तं विज्ञातारमरे केन विजानीयादिति, तदपि काशकृत्स्नीयेनैव दर्शनेन परिहरणीयम्"। यहाँ पर एवकार अवधारणार्थक है अर्थात् महर्षि काशकृत्स्न के मत का आश्रयण करके ही तृतीय हेतु का निरास किया जा सकता है, क्योंकि जीव और ब्रह्म के ऐकान्ति अभेद-पक्ष में ही 'केन कं पश्येत्' (बृ० उ० २।४।१५) इस प्रकार आत्मा से अन्य कर्म और करण कारकों का एवं 'विज्ञातारमरे केन विजानीयात्' (बृह० उ० २।४।१४) इस प्रकार आत्मगत कर्मत्व का 'निषेध किया जा सकता है, भेदाभेद-पक्ष या ऐकान्तिक भेद-पक्ष में यह सब कुछ नहीं किया

५१८ | ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम् | [अ. १ पा. ४ सू. २२

एवेदं द्रष्टव्यत्वमिति तदपि काशकृत्स्नीयेनैव दर्शनेन परिहरणीयम्। अपि च 'यत्र हि द्वैतमिव भवति तदितर इतरं पश्यति' (बृ० २।४।१३) इत्यारभ्याविद्याविषये तस्यैव दर्शनादिलक्षणं विशेषविज्ञानं प्रपञ्च्य 'यत्र त्वस्य सर्वमात्मैवाभूत्तत्केन कं पश्येत्' इत्यादिना विद्याविषये तस्यैव दर्शनादिलक्षणस्य विशेषविज्ञानस्याभावमभिदधाति। पुनश्च विषयाभावेऽपि आत्मानं विजानीयाद् इत्याशङ्क्य 'विज्ञातारमरे केन विजानीयात्' इत्याह। ततश्च विशेषविज्ञानाभावोपपादनपरत्वाद्वाक्यस्य विज्ञानधातुरेव केवलः सम्भूतपूर्वगत्या कर्तृवचनेन तृचा निर्दिष्ट इति गम्यते। दर्शितं तु पुरस्तात् काशकृत्स्नीयस्य पक्षस्य श्रुतिमत्त्वम्। अतश्च विज्ञानात्मपरमात्मनोरविद्याप्रत्युपस्थापि-

भामती

ॐ अपि च यत्र हि इति ॐ। कस्मात् पुनः काशकृत्स्नस्य मतमास्थीयते नेतरेषामाचार्याणामित्यत आह ॐ दर्शितं तु पुरस्ताद् इति। काशकृत्स्नीयस्य मतस्य श्रुतिप्रबन्धोपन्यासेन पुनः श्रुतिमत्त्वं स्मृतिमत्त्वं चोपसंहारोपक्रमपवाह ॐ अतश्च इति ॐ। क्वचित्पाठ आतश्चेति, तस्यावश्यं चेत्यर्थः। जननजरामरणभीतयो विक्रियास्तासां सर्वासां महानज इत्यादिना प्रतिषेधः (परिणामपक्षेऽन्यस्य चान्यभावपक्षे ऐकान्तिकाद्वैतप्रतिपादनपरा एकमेवाद्वितीयमित्यादयो द्वैतदर्शननिन्दापराश्चान्योऽसावन्योऽहमस्मीत्यादयो जन्मजरादिविक्रियां प्रतिषेधपराश्चैष महानज इत्यादयः श्रुतय उपरुध्येरन्। अपि च यदि जीवपरमात्मनोर्भेदाभेदावास्थीयेयातां ततस्तयोर्मिथो विरोधात्समुच्चयाभावादेकस्य बलीयस्त्वे नात्मनि निरपवादं विज्ञानं जायेत, बलीयसेन दुर्बलपक्षावलम्बिनो ज्ञानस्य बाधनात्। अथ तयोस्तुल्यबलत्वेनावगमान्न बलाबलावधारणं, ततः संशये सति न सुनिश्चितार्थमात्मनि ज्ञानं भवेत् सुनिश्चितार्थं च ज्ञानं मोक्षोपायः श्रूयते 'वेदान्तविज्ञान-

भामती-व्याख्या

जा सकता—यह उक्त अवधारण का तात्पर्य है। केवल काशकृत्स्नीय दर्शन के अनुरोध पर ही ब्रह्म में विज्ञातृत्व का व्यवहार पूर्वावस्था को लेकर नहीं किया जाता, अपितु पूर्वापर के वाक्यों की आलोचना से भी वही निष्कर्ष निकलता है—"अपि च 'यत्र हि द्वैतमिव भवति, तदितर इतरं पश्यति' (बृह० उ० २।४।१३) इत्यादि"। काशकृत्स्नीय मत पर ही इतनी आस्था क्यों? अन्य आचार्यों के मतों पर क्यों नहीं? इस प्रश्न का उत्तर है—"दर्शितं तु पुरस्तात् काशकृत्स्नीय पक्षस्य श्रुतिमत्त्वम्"। अनेक श्रौत और स्मार्त वाक्यों का साक्ष्य प्रस्तुत कर काशकृत्स्नीय मत का वर्चस्व स्थापित किया जाता है—"अतश्च विज्ञानात्मपरमात्मनोः"। 'अतः' के स्थान पर कहीं-कहीं 'आतः' पाठ उपलब्ध होता है, जिसका अर्थ है—'अवश्यम्'। जनन, जरा मरण और भय—ये विकार हैं, इनका प्रतिषेध "स वा एष महानज आत्मा अजरोऽमरो ब्रह्म" (बृह. उ. ४।४।२५) इस श्रुति से किया गया है। परिणाम या अन्य कारण से अन्य कार्य की उत्पत्तिरूप आरम्भवाद में "एकमेवाद्वितीयम्" इत्यादि ऐकान्तिक अभेदपरक "अन्योऽसावन्योऽहमस्मि" इत्यादि द्वैत-दर्शन-निन्दापरक एवं 'एष महानजः' इत्यादि जननादि विकार निषेधक श्रुति-वाक्य विरुद्ध पड़ जाते हैं। दूसरी बात यह भी है कि यदि जीव के परमात्मा से भेद और अभेद—दोनों माने जाते हैं, तब कोई भी ज्ञान निर्बाध और असन्दिग्ध न हो सकेगा, क्योंकि भेद और अभेद परस्पर विरुद्ध धर्म हैं, एकत्र समुचित नहीं रह सकते। उनमें एक को प्रबल और दूसरे को दुर्बल मानना होगा, अतः सबलपक्षीय ज्ञान से निर्बलपक्षीय ज्ञान का बाध (अपवाद) हो जायगा और यदि भेद और अभेद दोनों में बलाबल का निश्चय नहीं होता, तब संशयात्मक ज्ञान होगा निश्चितार्थक आत्मज्ञान न हो सकेगा किन्तु सुनिश्चितार्थक आत्मज्ञान को ही मोक्ष का साधन माना गया है—"वेदान्तविज्ञानसुनिश्चितार्थाः" (मुण्ड. ३।२।६)। भाष्यकार

द्रष्टव्यत्वेन ब्रह्मनिर्देशः ] हिन्दीसहितभामतीसंवलितम् ५१९

तनामरूपरचितदेहाद्युपाधिनिमित्तो भेदो न पारमार्थिक इत्येषोऽर्थः सर्वैर्वेदान्तवादि- भिरभ्युपगन्तव्यः । 'सदेव सोम्येदमग्र आसीदेकमेवाद्वितीयम्' (छा० ६।२।१) 'आत्मवेदं सर्वम्' (छा० ७।२५।२), 'ब्रह्मैवेदं सर्वम्' (मुण्ड० २।२।११), 'इदं सर्वं यदद्यमात्मा' (बृ० २।४।६), 'नान्योऽतोऽस्ति द्रष्टा' (बृ० ३।७।२३), 'नान्यदतोऽस्ति द्रष्टृ' (बृ० ६।८।११) इत्येवंरूपाभ्यः श्रुतिभ्यः । स्मृतिभ्यश्च 'वासुदेवः सर्वमिति' (गी० ७।१९), 'क्षेत्रज्ञं चापि मां विद्धि सर्वक्षेत्रेषु भारत' (गी० १३।२), 'समं सर्वेषु भूतेषु तिष्ठन्तं परमेश्वरम्' (गी० १३।२८) इत्येवंरूपाभ्यः, भेददर्शनापवादाच्च 'अन्योऽसावन्योऽहमस्मीति न स वेद यथा पशुः' (बृ० १।४।१०), 'मृत्योः स मृत्यु- माप्नोति य इह नानेव पश्यति' (बृ. ४।४।१९) इत्येवंजातीयकात् । 'स वा एष महानज आत्माऽजरोऽमरोऽमृतोऽभयो ब्रह्म' (बृ० ४ ४।२५) इति चात्मनि सर्वविक्रि- याप्रतिषेधात्, अन्यथा च मुमुक्षूणां निरपवादविज्ञानानुपपत्तेः, सुनिश्चितार्थत्वानुपप- त्तेश्च । निरपवादं हि विज्ञानं सर्वाकाङ्क्षानिवर्तकमात्मविषयमिष्यते, 'वेदान्तविज्ञान- सुनिश्चितार्थाः' (मुण्ड० ३।२।६) इति च श्रुतेः । 'तत्र को मोहः कः शोक एकत्वमनु- पश्यतः' (ईशा० ७) इति च । स्थितप्रज्ञलक्षणस्मृतेश्च (गी० २।५४) । स्थिते च


भामती

सुनिश्चितार्थाः' इति । तदेतदाह ॐ अन्यथा मुमुक्षूणाम् इति ॐ । एकत्वमनुपश्यत इति श्रुतिर्न पुनरेकत्वा- नेकत्वे अनुपश्यत इति । ननु यदि क्षेत्रज्ञपरमात्मनोरभेदो भाविकः, कथं तर्हि व्यपदेशबुद्धिभेदौ क्षेत्रज्ञः परमात्मेति ? कथञ्च नित्यशुद्धबुद्धमुक्तस्वभावस्य भगवतः संसारिता ? अविद्याकृतनामरूपोपाधिवशादिति चेत्, कस्येयमविद्या ? न तावज्जीवस्य, तस्य परमात्मनो व्यतिरेकाभावात् । नापि परमात्मनस्तस्य विद्यैकरसस्य विद्याश्रयत्वानुपपत्तेः । तदत्र संसारित्वासंसारित्वविद्याविद्यावत्त्वरूपविरुद्धधर्मसंसर्गाद् बुद्धि- व्यपदेशभेदाच्चास्ति जीवेश्वरयोर्भेदोऽपि भाविक इत्यत आह ॐ स्थिते च परमात्मक्षेत्रज्ञात्मैकत्वे इति ॐ । न तावद्भेदाभेदावेकत्र भाविकौ भवितुमर्हत इति विप्रपञ्चितं प्रथमे पादे । द्वैतदर्शननिन्दया

भामती-व्याख्या

भी यही कह रहे हैं— "अन्यथा च मुमुक्षूणां निरपवादज्ञानं न स्यात्" । "एकत्वमनुपश्यतः" (ई० ७) इस श्रुति के द्वारा एकत्वानेकत्व-दर्शी (भेदाभेद-दर्शी) का भी निरास किया गया है ।

शङ्का—यदि क्षेत्रज्ञ (जीव) और परमात्मा का अभेद है, तब उनके वाचक शब्द और उनके ज्ञानों का [ क्षेत्रज्ञः, परमात्मा—ऐसा ] भेद क्यों ? नित्य, शुद्ध, बुद्ध और मुक्तस्वरूप परमात्मा जीव के रूप में संसारी क्योंकर बनेगा ? यदि कहा जाय कि अविद्या-जनित नाम-रूप उपाधि के द्वारा ब्रह्म में कर्तृत्ववादि संसार आरोपित हो जाता है, तब जिज्ञासा होती है कि वह अविद्या किस की है ? जीव की नहीं हो सकती, क्योंकि वह ब्रह्म से भिन्न नहीं और वह अविद्या परमात्मा को भी नहीं हो सकती, क्योंकि विद्यैकरस्वरूप ब्रह्म अविद्या का आश्रय नहीं हो सकता [ आचार्य भास्कर की यही आपत्ति है— "कथं तस्य संसारित्वमिति चेत्, अविद्या- कृतनामरूपोपाधिवशादिति । तत्र ब्रूमः---कस्येयमविद्या ? न तावज्जीवस्य, वस्तुभूतस्य तस्यानभ्युपगमात् । नापीश्वरस्य, नित्यविज्ञानप्रकाशत्वादाज्ञानं विरुध्यते" (ब्र. सू. भास्कर पृ० ८२)] ।

समाधान—उक्त शङ्का का समाधान भाष्यकार ने किया है— "क्षेत्रज्ञपरमात्मैकत्व- विषये सम्यग्दर्शने क्षेत्रज्ञः परमात्मेति नाममात्रभेदात्" । भेद और अभेद दोनों एकत्र नहीं रह सकते—इस तथ्य का विस्तार से वर्णन प्रथम पाद में किया जा चुका है । द्वैतदर्शन की निन्दा और ऐकान्तिक अद्वैत के प्रतिपादन में ही सभी वेदान्त-वाक्यों का तात्पर्य पूर्वापर की

५२०ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम्[ अ. १ पा. ४ सू. २२

क्षेत्रज्ञपरमात्मैकत्वविषये सम्यग्दर्शने क्षेत्रज्ञः परमात्मेति नाममात्रभेदात्, क्षेत्रज्ञोऽयं परमात्मनो भिन्नः परमात्माऽयं क्षेत्रज्ञाद्भिन्न इत्येवंजातीयक आत्मभेदविषयो निर्बन्धो निरर्थकः। एको ह्ययमात्मा नाममात्रभेदेन बहुधाभिधीयत इति। नहि 'सत्यं ज्ञान-

भामती

चेकान्तिकाद्वैतप्रतिपादनपराः पौर्वापर्यालोचनया सर्वे वेदान्ताः प्रतीयन्ते। तत्र यथा बिम्बवदवदातान्तः- स्विके प्रतिबिम्बानामभेदेऽपि नीलमणिकृपाणकाचाद्युपधानभेदात् काल्पनिकौ जीवानां भेदो बुद्धिशब्दव्यपदेश- भेदौ वर्तयतः-इदं बिम्बमवदातमभिमानि च प्रतिबिम्बानि नीलोत्पलपलाशश्यामनानि वृत्तदीर्घादिभेदभाञ्जि बहूनीति, एवं परमात्मनः शुद्धस्वभावाज्जीवानामभेव ऐकान्तिकेऽप्यनिर्वचनीयानाद्यविद्योपधानभेदात् काल्पनिकौ जीवानां भेदो बुद्धिव्यपदेशभेदावयं च परमात्मा विशुद्धविज्ञानानन्दस्वभावः, इमे च जीवा अविद्याशोकदुःखाद्युपद्रवभाज इति वर्तयति। अविद्योपधानं च यद्यपि विद्यास्वभावे परमात्मनि न साक्षा- दस्ति, तथापि तत्प्रतिबिम्बकल्पजीवद्वारेण परस्मिन्नुच्यते। न चैवमन्योन्याश्रयो जीवविभागाश्रयाविद्या, अविद्याश्रयश्च जीवविभाग इति, बीजाङ्कुरवदनादित्वात्। अत एव कामुद्दिश्यैष ईश्वरो मायामारचयत्य- नर्थकामुद्देश्यानां सर्गादौ जीवानामभावात्, कथं चात्मानं संसारिणं विविधवेदनाभाजं कुर्यादित्याद्यनुयोगो निरवकाशः। न खल्वादिमान् संसारो नाप्यादिमानविद्याजीवविभागो येनानुयुज्येतेति। अत्र च नाम- ग्रहणेनाविद्यामुपलक्षयति। स्यादेतत्-यदि न जीवाद् ब्रह्म भिद्यते हन्त जीवः स्फुट इति ब्रह्मापि तथा स्यात्तथा च निहितं गुहायामिति नोपपद्यत इत्यत आह ॐ नहि सत्यम् इति ॐ। यथा हि बिम्बस्य मणि-

भामती-व्याख्या

आलोचना से पर्यवसित होता है। वहाँ जैसे शुभ्र बिम्ब से प्रतिबिम्ब का अभेद होने पर भी नीलमणि, कृपाण काचादि उपाधियों के भेद से बिम्ब और प्रतिबिम्ब का काल्पनिक भेद जीवों की दृष्टि में ज्ञान और शब्द का भेद उत्पन्न कर देता है—'इदं 'बिम्बमवदातम्', 'इमानि प्रतिबिम्बानि' नीलोत्पलपलाशश्यामनानि वृत्तदीर्घादिभेदभाञ्जि बहूनि'। वैसे ही शुद्ध-स्वरूपवाले परमात्मा से जीवों का ऐकान्तिक अभेद होने पर भी अनिर्वचनीय अनादि अविद्या-रूप उपाधि के भेद से जीवों का काल्पनिक भेद ही उनके शब्दों और ज्ञानों का भेद उत्पन्न कर देता है—'अयं परमात्मा विशुद्धविज्ञानानन्दस्वभावः', 'इमे जीवा अविद्याशोकदुःखाद्युपद्रवभाजः'। यद्यपि अविद्यारूप उपाधि विद्यात्मक ब्रह्म में साक्षात् नहीं है, तथापि उस के प्रतिबिम्बभूत जीवों के माध्यम से ब्रह्म में उपचरित है। जीवों को अविद्या का आश्रय मानने पर 'जीवविभागाश्रयाऽविद्या, अविद्याश्रयश्च जीवविभागः'—इस प्रकार का अन्योन्याश्रयत्व क्यों नहीं? इस प्रश्न का उत्तर है—'बीजाङ्कुरवदनादित्वात्'। (१) सृष्टि के आरम्भ में जीवों की सत्ता न होने के कारण किसके उद्देश्य से ईश्वर माया की रचना करता है? एवं ईश्वर अपने को संसारी और विविध वेदनाओं का आश्रय क्योंकर बनाता है? इत्यादि प्रश्न भी अत एव निराधार हो जाते हैं कि न तो यह संसार अनादिमान् (सादि) है, और न अविद्या एवं जीव का विभाग ही आदिमान् है कि यह सादितामूलक आक्षेप हो जाता। "नाममात्रभेदात्"—इस भाष्य-वाक्य में "नाम' पद अविद्या का उपलक्षक है, अतः जीव और ब्रह्म में आविद्यक या अवस्तुभूत भेद का लाभ होता है।

यदि जीव ब्रह्म से भिन्न नहीं, तब जैसे जीव सभी व्यक्तियों को स्पष्ट अनुभव में आता है, वैसे ही ब्रह्म स्फुट क्यों नहीं? यदि ब्रह्म भी स्पष्ट अनुभव-गम्य है, तब उसके लिए "निहितं गुहायाम्" (तै० उ० २।१) ऐसा कहना उचित कैसे होगा इस प्रश्न का उत्तर है—"न हि 'सत्यं ज्ञानमनन्तं ब्रह्म' इत्यादि"। जैसे एक बिम्ब की मणि, कृपाणादि अनेक गुहाएँ होती हैं, वैसे ही एक ब्रह्म की जीवों के भेद से अनेक यविद्यारूप गुहाएँ हैं। जैसे प्रतिबिम्ब

दृष्टव्यत्वेन ब्रह्मनिर्देशः ] हिन्दीसहितभामतीसंवलितम् ५२१

मनन्तं ब्रह्म । यो वेद निहितं गुहायाम्' ( तै० २।६ ) इति कांचिदेवैकां गुहामधिकृत्यै- तदुक्तम् । न च ब्रह्मणोऽन्यो गुहायां निहितोऽस्ति, 'तत्सृष्ट्वा तदेवानुप्राविशत्' ( तै० २।६ ) इति स्रष्टुरेव प्रवेशश्रवणात् । ये तु निर्बन्धं कुर्वन्ति ते वेदान्तार्थं बाध- मानाः श्रेयोद्वारं सम्यग्दर्शनमेव बाधन्ते । कृतकमनित्यं च मोक्षं कल्पयन्ति । न्यायेन च न संगच्छन्त इति ॥ २२ ॥


भामती

कृपाणादयो गुहा एवं ब्रह्मणोऽपि प्रतिजीवं भिन्ना अविद्या गुहा इति । यथा प्रतिबिम्बेषु भासमानेषु बिम्बं तदभिन्नमपि गुह्यमेवं जीवेषु भासमानेषु तदभिन्नमपि ब्रह्म गुह्यम् । अस्तु तर्हि ब्रह्मणोऽन्यद् गुह्यमित्यत आह ॐ न च ब्रह्मणोऽन्यः इति ॐ । ये त्वाश्मरथ्यप्रभृतयः ॐ निर्बन्धं कुर्वन्ति ते वेदान्तार्थम् इति ॐ । ब्रह्मणः सर्वात्मना भागशो वा परिणामाभ्युपगमे तस्य कार्यत्वादनित्यत्वाच्च तदाश्रितो मोक्षोऽपि तथा स्यात् । यदि त्वेवमपि मोक्षं नित्यमकृतकं ब्रूयुस्तत्राह ॐ न्यायेन इति ॐ । एवं ये नदीसमुद्रनिदर्शनेना- मुक्तेर्भेदं मुक्तस्य चाभेदं जीवस्यातिष्ठन्त, तेषामपि न्यायेनासङ्गतिः, न जातु घटः पटो भवति । ननूक्तं यथा नदी समुद्रो भवतीति । का पुनर्नद्यभिषताऽभ्युपगतः । किं पाथःपरमाणव उतेषां संस्थानभेद, आहो- स्वित्तदारब्धोऽवयवी ? तत्र संस्थानभेदस्य वाऽवयविनो वा समुद्रनिवेशे विनाशात्, कस्य समुद्रेणैकता ? नदीपाथःपरमाणूनान्तु समुद्रपाथःपरमाणुभ्यः पूर्वावस्थितेभ्यो भेद एव नाभेदः, एवं समुद्रादपि तेषां भेद एव ।

भामती-व्याख्या

पदार्थों के स्फुटरूप में अवभासित होने पर बिम्बवस्तु प्रतिबिम्ब से अभिन्न होकर भी गुह्य [ गुहा में अवस्थित अस्फुटरूप से प्रतीयमान ] होती है, वैसे ही जीवों के स्फुटरूप में अनुभूत होने पर ब्रह्म जीवाभिन्न होकर भी गुह्य है । ब्रह्म से भिन्न अन्य किसी पदार्थ को गुह्य क्यों नहीं माना जाता ? इस प्रश्न का उत्तर है— "न च ब्रह्मणोऽन्यो गुहायां निहितोऽस्ति"

"ये तु"—यहाँ 'ये' पद से आश्मरथ्यादि भेदवादी आचार्यों का ग्रहण किया गया है। "निर्बन्धं कुर्वन्ति" का अर्थ है आग्रहं कुर्वन्ति । अर्थात् जो भेदवादी आचार्य समग्र या आंशिकरूप से जीव को ब्रह्म का परिणाम मानते हैं, उन्हें यह भी मानना पड़ेगा कि कार्य ( जन्य ) और अनित्यभूत जीव के आश्रित मोक्ष पदार्थ भी वैसा ( अनित्य ) ही है। यदि अनित्यभूत जीव के आश्रित मोक्ष तत्त्व को नित्य और अकृतक माना जाता है, तब "न्यायेन च न सङ्गच्छन्ते" । इसी प्रकार जो ओडुलोम्यादि आचार्यगण नदी-समुद्र-दृष्टान्त के आधार पर मुक्ति से पूर्व जीव और ब्रह्म का भेद एवं मुक्तावस्था में अभेद मानते हैं, उनका मत भी न्याय-संगत नहीं, क्योंकि जो पदार्थ वस्तुतः भिन्न है, वह कभी अभिन्न नहीं हो सकता, जैसे अपटरूप घट कभी पटरूप नहीं होता । आचार्य औडलोमि की ओर से जो कहा गया कि जैसे नदी भिन्न है और समुद्र भिन्न, फिर भी नदी समुद्ररूप हो जाती है, वैसे ही जीव ब्रह्मरूप हो जाता है । वहाँ जिज्ञासा होती है कि 'नदी' पद से आप क्या समझते हैं ? क्या (१) जल के परमाणु ? या जलीय परमाणुओं का विशेष संस्थान ( आकार ) ? अथवा जलीय परमाणुओं से आरब्ध ( जनित ) अवयवी द्रव्य ? इनमें संस्थान या अवयवी द्रव्य तो समुद्र में प्रवेश करने पर नष्ट ही हो जाते हैं, वे शेष ही नहीं रहते, समुद्र से एकता किस की कही जाय ? नदी के जलीय परमाणु तो समुद्र के जलीय परमाणुओं से सदैव भिन्न ही रहते हैं, कभी अभिन्न नहीं होते । समुद्ररूप अवयवी से भी उनका भेद ही रहता है ।

कुछ लोगों ( भास्कराचार्यादि ) ने काशकृत्स्नीय मत मान कर जीव को परमात्मा का अंश कहा है

५२२ ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम् [ अ. १ पा. ४ सू. २२


भामती

ये तु काशकृत्स्नीयमेव मतमाश्रित्य जीवं परमात्मनोऽंशमाचक्ष्वतेषां कथं 'निष्कलं निष्क्रियं शान्तम्' इति न श्रुतिविरोधः ? निष्कलमिति सावयवत्वं व्यासेधति, न तु सांशत्वम् । अंशश्च जीवः परमा-त्मनो नभस इव कर्णनेमिमण्डलावच्छिन्नं नभः शब्दश्रवणयोग्यं वायोरिव च शरीरावच्छिन्नः पञ्चवृत्तिः प्राण इति चेत्, न तावन्नभो नभसोऽंशस्तस्य तत्त्वात् । कर्णनेमिमण्डलावच्छिन्नमंश इति चेत्, हन्त तर्हि प्राप्ताप्राप्तविवेकेन कर्णनेमिमण्डलं वा तत्संयोगो वेत्युक्तं भवति । न च कर्णनेमिमण्डलं तस्यांशस्तस्य ततो भेदात् । तत्संयोगो नभोधर्मत्वात्तस्यांश इति चेत्, न, अनुपपत्तेः । नभोधर्मत्वे हि तदनवयवं सर्वत्राभिन्नमिति तत्संयोगः सर्वत्र प्रथेत । नह्यस्ति सम्भवोऽनवयवमभ्याप्य वर्त्तत इति । तस्मात्तन्नास्ति चेद्व्याप्यैव, न चेद्व्याप्नोति तन्न नास्त्येव । व्याप्यैवास्ति केवलं प्रतिसम्बन्ध्यधीननिरूपणतया न सर्वत्र निरूप्यत इति चेत्, न नाम निरूप्यताम् । तत्संयुक्तं तु नभः श्रवणयोग्यं सर्वत्रास्तीति सर्वत्र श्रवण-


भामती-व्याख्या

यथा पटस्यांशोऽवयवस्तन्तुरिति । अस्ति च द्रव्यविभागवचनो यथा परिषदद्रव्ये अंशिनो वयमिहेति । तयोरिह ग्रहणं न भवति, किन्तूपाध्यवच्छिन्नास्यानन्यभूतस्य वाचकोऽयं शब्दः प्रयुक्तो यथाग्नेर्विस्फुलिङ्गस्य । कथं पुनर्निग्वयवस्य परमात्मनोऽंशः सम्भवति ? आगमात् तावदवगम्यते—"यथाग्नेः क्षुद्रा विस्फुलिङ्गाः", यथा चाकाशस्य पार्थिवाधिष्ठानावच्छिन्नं कर्णच्छिद्रं च, यथा च वायोः पञ्चवृत्तिः प्राणः, यथा च मनसः कामादयो वृत्तयः । स च भिन्नाभिन्नस्वरूपः, अभिन्नरूपं स्वाभाविकम्, औपाधिकं तु भिन्नरूपम्, उपाधीनां च बलवत्त्वात्" ( ब्र० सू० भास्कर० पृ० १४१ ) ] ।

ऐसे लोगों से पूछा जा सकता है कि "निष्कलं निष्क्रियं शान्तं निरवद्यं निरञ्जनम्" ( श्वेता० ६।१९ ) इस श्रुति से उनका मत विरुद्ध क्यों नहीं ?

शङ्का — श्रुतिगत 'निष्कलम्' पद सावयवत्व का निषेध करता है, सांशत्व का नहीं । जीव परमात्मा का वैसे ही अंश है, जैसे महाकाश का कर्ण-नेमिमण्डल से अवच्छिन्न श्रोत्ररूप आकाश अथवा जैसे महावायु का शरीरावच्छिन्न प्राणादि पञ्चविध व्यापार से युक्त प्राण ।

समाधान — दृष्टान्त और दार्ष्टान्त का वैषम्य है, क्योंकि श्रोत्ररूप आकाश महाकाश का अंश नहीं । प्राप्ताप्राप्त-न्याय के आधार पर आकाश की अंशता किसमें पर्यवसित होती है ? इस प्रश्न का यदि उत्तर खोजा जाय, तब वहाँ या सर्वत्र अवच्छेदकावच्छिन्न-स्थल पर तीन पदार्थ प्रतीत होते हैं—(१) अवच्छेद्य, (२) अवच्छेदक और (३) अवच्छेदक का अवच्छेद्य के साथ सम्बन्ध । प्रकृत में आकाश ही अवच्छेद्य है, वह तो स्वयं अपना अंश हो नहीं सकता, क्योंकि वही अंशी है । कर्ण-नेमि-मण्डलरूप अवच्छेदक भी आकाश का अंश नहीं, क्योंकि वह पार्थिव होने के कारण आकाश से भिन्न और विजातीय है । आकाश के साथ जो कर्ण-नेमि-मण्डल का संयोग है, वह आकाश के समान ही व्यापक ही मानना होगा, क्योंकि आकाश निरवयव है, अतः उसका संयोग किञ्चिदवयवावच्छेदेन या अव्याप्यवृत्ति नहीं हो सकता । फलतः सर्वत्र शब्दोपलब्धि होनी चाहिए : निरवयव-संयोग कभी अव्याप्यवृत्ति नहीं हो सकता, अतः आकाश के साथ यदि कर्ण-नेमि-मण्डल का संयोग है, तब वह व्याप्यवृत्ति ही रहेगा । यदि वह सभी देश को व्याप्त नहीं कर सकता, तब वह है ही नहीं । यदि कहा जाय कि यद्यपि यह सर्वत्र है किन्तु संयोग सदैव अपने प्रतियोगी से निरूपणीय है, प्रतियोगी के सर्वत्र न होने के कारण सर्वत्र निरूपित नहीं हो सकता । तो वैसा नहीं कह सकते, क्योंकि उस संयोग का निरूपण भले ही न हो, स्वरूपतः तो सर्वत्र विद्यमान है, अतः श्रवण-योग्यता के सर्वत्र होने से सर्वत्र शब्द-श्रवण होना चाहिए ।

द्रष्टव्यत्वेन ब्रह्मनिर्देश ] हिन्दीसहितभामतीसंवलितम् ५२३


भामती

प्रसङ्गः । न च भेदाभेदयोरन्यतरेणांशः शक्यो निर्वक्तुम् । न चोभाभ्यां, विरुद्धयोरेकत्रासमवायादित्युकम् । तस्मादनिर्वचनीयानाद्यविद्यापरिकल्पित एवांशो नभसो न भाविक इति युक्तम् । न च काल्पनिको ज्ञानमात्रायतजीवितः कथमविज्ञायमानोऽस्ति, असंश्रांशः कथं शब्दश्रवणलक्षणाय कार्याय कल्पते ? न जातु रज्जुवामज्ञायमान उरगो भयकम्पादिकार्याय पर्याप्त इति वाच्यम्, अज्ञातत्वासिद्धेः । कार्यव्यङ्ग्यत्वादस्य । कार्योत्पादात् पूर्वमज्ञातं कथं कार्योत्पादाङ्गमिवि चेत्, न, पूर्वपूर्वकल्पोत्पादव्यङ्ग्यत्वादसत्यपि ज्ञाने तत्संस्कारानुवृत्तेरनादित्वाच्च कल्पनातत्संस्कारप्रवाहस्य । अस्तु वानुपपत्तिरेव कार्यकारणयोर्मायात्मकत्वात् । अनुपपत्तिर्हि मायामुपोद्वलयति । अनुपपद्यमानार्थत्वान्मायायाः । अपि च भाविकांशवादिनां मते भाविकांशस्य ज्ञानेनोच्छेत्तुमशक्यत्वान्न ज्ञानध्यानसाधनो मोक्षः स्यात् तदेवमाकाशांश इव श्रोत्रमनिर्वचनीयम् । एवं जीवो ब्रह्मणोऽश इति काशकृत्स्नीयं मतमिति सिद्धम् ॥ २२ ॥


स्यादेतद् — वेदान्तानां ब्रह्मणि समन्वये दर्शिते समाप्तं समन्वय लक्षणमिति किमपरमवशिष्यते


भामती-व्याख्या

अंश अपने अंशी से भिन्न है ? या अभिन्न ? अथवा भिन्नाभिन्न ? इनमें से किसी प्रश्न का भी समुचित उत्तर नहीं बनता—यह विगत पृ० १३६ पर भी विस्तारपूर्वक कहा जा चुका है, फलतः अनिर्वचनीय अनादि अविद्या के द्वारा आकाशादि निरंश पदार्थों के अंश परिकल्पित मात्र होते हैं, वास्तविक नहीं—ऐसा मानना ही युक्ति-युक्त है । काल्पनिक पदार्थ ज्ञानैकस्वरूप होते हैं, कभी अज्ञातमान स्वरूप सत् नहीं होते । असद्भूत अंश व्यावहारिक शब्दादि-श्रवण के योग्य क्योंकर होगा ? रज्जु में कल्पित अज्ञातमान सर्प व्यावहारिक भय एवं कम्पादि का जनक क्योंकर होता है ? इस प्रश्न का उत्तर यह है कि वह अज्ञातमान नहीं, अपि तु ज्ञायमान ही होता है, क्योंकि भय-कम्पादि कार्य ही उसकी ज्ञायमानता के व्यञ्जक होते हैं । यद्यपि वर्तमान कार्य की उत्पत्ति पूर्वतन सर्पादि की ज्ञातता का कल्पक नहीं, तथापि पूर्व-पूर्व कार्यों की उत्पत्ति के द्वारा उसमें ज्ञातत्व की अभिव्यक्ति हो जाती है । यद्यपि वृत्त्यात्मक ज्ञान विनश्वर है, तथापि उसके संस्कार अनुवृत्त रहते हैं, अतः ज्ञान अपने संस्कारों के माध्यम से अनुवृत्त रह कर अपने कल्पित पदार्थ में ज्ञातत्व ध्वनित कर देता है । संस्कारों की सत्ता पूर्व-पूर्व अनुमान के आधार पर होती है, कल्पना और संस्कारों का साध्य-साधनभाव बीज-वृक्ष के समान अनादि माना जाता है, अतः अनवस्थादि दोष प्रसक्त नहीं होते । काल्पनिक कारण से कार्य की उपपत्ति यदि नहीं हो सकती, तब अनुपपत्ति ही सही । मायिक वस्तु के लिए अनुपपत्ति कोई दोष नहीं, क्योंकि आचार्य मण्डन मिश्र कहते हैं—"न हि मायायां काचिदनुपपत्तिः, अनुपपद्यमानार्थैव हि माया" ( ब्र० सि० पृ० १० ) । दूसरी बात यह भी है कि जो लोग अंश को भाविक ( वास्तविक ) मानते हैं, वास्तविक पदार्थ का ज्ञान से उच्छेद हो नहीं सकता, अतः ज्ञान-ध्यानादि से बन्धन की निवृत्ति और मोक्ष की प्राप्ति क्योंकर होगी ? अतः जैसे श्रोत्ररूप आकाश का अंश अनिर्वचनीय है, वैसे ही जीव भी ब्रह्म का अंश है—ऐसा आचार्य काशकृत्स्न का मत स्थिर होता है ॥ २२ ॥


सङ्गति—ब्रह्म में विविध वेदान्त-वाक्यों का समन्वय दिखाया गया । इतने मात्र से इस समन्वयाध्याय का उद्देश्य पूरा हो जाता है, अब और क्या शेष रह गया कि जिसके लिए इस अधिकरण की रचना की गई ? इस शङ्का का निराकरण करने के लिए भाष्यकार

५२४ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम्[ अ. १ पा. ४ सू. २३

( ७ प्रकृत्यधिकरणम् । सू० २३-२७ )

प्रकृतिश्च प्रतिज्ञादृष्टान्तानुपरोधात् ॥ २३ ॥

यथाभ्युदयहेतुत्वाद्धर्मो जिज्ञास्यः, एवं निःश्रेयसहेतुत्वाद् ब्रह्म जिज्ञास्यमित्युक्तम् । ब्रह्म च 'जन्माद्यस्य यतः' ( ब्र० १।१।२ ) इति लक्षितम् । तच्च लक्षणं घटरुचकादीनां मृत्सुवर्णादिवत्प्रकृतित्वे कुलालसुवर्णकारादिवन्निमित्तत्वे च समानमित्यतो भवति विमर्शः- किमात्मकं पुनर्ब्रह्मणः कारणत्वं स्यादिति ? तत्र निमित्तकारणमेव तावत्केवलं स्यादिति प्रतिभाति । कस्मात् ? ईक्षापूर्वककर्तृत्वश्रवणात् । ईक्षापूर्वकं हि ब्रह्मणः कर्तृत्वमवगम्यते 'स ईक्षांचक्रे' (प्र० ६।३ )


भामती

यदर्थमिदमारभ्यत इति शङ्कां निराकर्तुं सङ्गतिं दर्शयन् अवशेषमाह ॐ यथाभ्युदय इति ॐ । अत्र च लक्षणेन सङ्गतिमुक्त्वा लक्षणेनास्याधिकरणस्य सङ्गतिरुक्ता । एतदुक्तं भवति — सत्यं जगत्कारणे ब्रह्मणि वेदान्तानामुक्तः समन्वयस्तत्र कारणभावस्योभयथा दर्शनाज्जगत्कारणत्वं ब्रह्मणः किं निमित्तत्वेनैव, उतोपादानत्वेनापि ? तत्र यदि प्रथमः पक्षस्तत उपादानकारणानुसरणे सांख्यस्मृतिसिद्धं प्रधानमप्युपेयम् । तथा च जन्माद्यस्य यत इति ब्रह्मलक्षणमसाधु, अतिव्याप्तेः, प्रधानेऽपि गतत्वात् । असम्भवाद्वा । यदि तूत्तरः पक्षस्ततो नातिव्याप्तिर्नाव्याप्तिरिति साधु लक्षणम् । सोऽयमवशेषः । तत्र —

ईक्षापूर्वककर्तृत्वं प्रभुत्वमसरूपता ।
निमित्तकारणेष्वेव नोपादानेषु कर्हिचित् ॥

तदिदमाह ॐ तत्र निमित्तकारणमेव तावद् इति ॐ । आगमस्य कारणमात्रे पर्यवसानादनुमानस्य


भामती-व्याख्या

सङ्गति दिखाते हुए शेष विचारणीय प्रस्तुत करते हैं— "यथाभ्युदयहेतुत्वाद् धर्मो जिज्ञास्य इत्यादि"। यहाँ ब्रह्म-लक्षण की संगति दिलाकर भाष्यकार ने लक्षण-सूत्र के साथ इस अधिकरण की संगति प्रदर्शित की है। आशय यह है कि जगत् के कारणीभूत ब्रह्म में वेदान्त-वाक्यों का समन्वय प्रदर्शित किया गया। कारणता दो प्रकार की देखी जाती है— (१) निमित्तकारणता और उपादानकारणता। ब्रह्म में जगत् की कौन-सी कारणता विवक्षित है? यदि निमित्तकारणता-पक्ष का ग्रहण किया जाता है, तब उपादान कारण किसी और पदार्थ को मानना होगा, फलतः सांख्य-दर्शन-सिद्ध प्रधान (प्रकृति) तत्त्व को स्वीकार करना होगा, तब "जन्माद्यस्य यतः"— यह ब्रह्म का लक्षण सदोष हो जाता है, क्योंकि सांख्य-सम्मत प्रकृति में उक्त लक्षण की अतिव्याप्ति हो जाती है अथवा उपादानत्वरूप लक्षण ब्रह्म में न घटने से असम्भव दोष है। यदि द्वितीय पक्ष [उपादानकारणता भी अर्थात् ब्रह्म में उभयविध कारणत्व) माना जाता है, तब तो न अतिव्याप्ति होती है और न अव्याप्ति, अतः उक्त लक्षण निर्दोष है। यही शेष विचारणीय है, जिसके लिए इस अधिकरण की आवश्यकता है।

पूर्वपक्ष —
ईक्षापूर्वककर्तृत्वं प्रभुत्वमसरूपता ।
निमित्तकारणेष्वेव नोपादानेषु कर्हिचित् ॥

यही भाष्यकार ने कहा है— "तत्र निमित्तकारणमेव तावत् केवलं स्यात्"। औपनिषद वाक्यों का तो सामान्य कारणता में पर्यवसान होता है। अनुमान प्रमाण जो 'ईश्वरो जगतो निमित्तकारणम्, ईक्षणपूर्वककर्तृत्वात् कुलालवत्। प्रभुत्वाद् राजवत्''ईश्वरो न जगत उपादानम्, कार्यविरूपत्वात्, कुलालादिवत्'— इस प्रकार निमित्तकारणता का नियमन करते हैं, उनका उक्त औपनिषद वाक्य किसी प्रकार का विरोध नहीं करते, प्रत्युत समर्थन करते

अभिन्ननिमित्तोपादानं ब्रह्म ] हिन्दीसहितभामतीसंवलितम् ५२५

'स प्राणमसृजत' ( प्र० ६।४ ) इत्यादिश्रुतिभ्यः । ईक्षापूर्वकं च कर्तृत्वं निमित्त- कारणेष्वेव कुलालादिषु दृष्टम् । अनेककारकपूर्विका च क्रियाफलसिद्धिलोंके दृष्टा । स च न्याय आदिकर्तर्यपि युक्तः संक्रमयितुम्, ईश्वरत्वप्रसिद्धेश्च । ईश्वराणां हि राजवैवस्वतादीनां निमित्तकारणत्वमेव केवलं प्रतीयते, तद्वत्परमेश्वरस्यापि निमित्तकारणत्वमेव युक्तं प्रतिपत्तुम् । कार्यं चेदं जगत्सावयवमचेतनमशुद्धं च दृश्यते, कारणेनापि तस्य तादृशेनैव भवितव्यम्, कार्यकारणयोः सारूप्यदर्शनात् । ब्रह्म च नैवंलक्षणमवगम्यते 'निष्कलं निष्क्रियं शान्तं निरवद्यं निरञ्जनम्' ( श्वे० ६।१९ ) इत्यादिश्रुतिभ्यः । पारिशेष्याद् ब्रह्मणोऽन्यदुपादानं कारणमशुद्धयादिगुणं स्मृतिप्र- सिद्धमभ्युपगन्तव्यम् । ब्रह्मकारणत्वश्रुतेर्निमित्तत्वमात्रे पर्यवसानादिति । एवं प्राप्ते ब्रूमः,—प्रकृतिश्चोपादानकारणं च ब्रह्माभ्युपगन्तव्यं निमित्त-


भामती

तद्विशेषनियममागमो न प्रतिषिध्यत्यपि त्वनुमन्यत एवेत्याह ॐ पारिशेष्याद् ब्रह्मणोऽन्यद् इति ॐ । ब्रह्मोपादानत्वस्य प्रसक्तस्य प्रतिषेधेऽन्यत्राप्रसङ्गात्सांख्यस्मृतिप्रसिद्धमानुमानिकं प्रधानं शिष्यत इति । एकविज्ञानेन च सर्वविज्ञानप्रतिज्ञानम् 'उत तमादेशम्' इत्यादिना यथा सोम्यैकेन मृत्पिण्डेनेति च दृष्टान्तः, परमात्मनः प्राधान्यं सूचयतः । यथा सोमशर्मणैकेन ज्ञातेन सर्वे कठा ज्ञाता भवन्ति । एवं प्राप्त उच्यते—प्रकृतिश्च । न केवलं ब्रह्म निमित्तकारणं, कुतः? प्रतिज्ञादृष्टान्तयोरनुपरोधात् । निमित्तकारणत्वमात्रे तु तावुपरोध्येयाताम् तथाहि

न मुख्ये सम्भवत्यर्थे जघन्या वृत्तिरिष्यते ।
न चानुमानिकं युक्तमागमेनापबाधितम् ॥
सर्वे हि तावद्वेदान्ताः पौर्वापर्येण वीक्षिताः ।
ऐकान्तिकाद्वैतपरा द्वैतमात्रनिषेधतः ॥


भामती-व्याख्या

हैं—“स ईक्षांचक्रे” (प्र. ६।३) इत्यादि। इस प्रकार यह आवश्यक हो जाता है कि उपादानकारण कोई और माना जाय—“पारिशेष्याद् ब्रह्मणोऽन्यदुपादानकारणमभ्युपगन्तव्यम्”। पारिशेष्य का स्वरूप बताते हुए न्यायभाष्यकार ने कहा है—“प्रसक्तप्रतिषेधाद् अन्यत्राप्रसङ्गः परिशेषः” (न्या० भा० १।१।५)। उसके अनुसार प्रसक्त (प्राप्त) ब्रह्मगत उपादानकारणता का प्रतिषेध हो जाने पर अन्य किसी वस्तु में उपादान-कारणता प्रसक्त नहीं, परिशेषतः सांख्य-सम्मत प्रधान (प्रकृति) में उपादानता पर्यवसित होती है। “उत तमादेशमप्राक्ष्यो येनाश्रुतं श्रुतं भवति” (छां० ६।१।२) इत्यादि वाक्यों के द्वारा जो एक के विज्ञान से सर्व-विज्ञान की प्रतिज्ञा की है और “यथा सोम्यैकेन मृत्पिण्डेन” (छां० ६।१।४) इत्यादि जो दृष्टान्त दिखाए हैं, वे सभी ब्रह्म की प्रधानता (प्रमुखता) के वैसे ही सूचक हैं, जैसे सोमशर्मा की प्रशंसा में कहा जाय—'सोमशर्मणैकेन ज्ञातेन सर्वे कठा ज्ञाता भवन्ति'।

सिद्धान्त—उक्त पूर्वपक्ष का निराकरण-सूत्र है—'प्रकृतिश्च प्रतिज्ञादृष्टान्तानुपरोधात्”। अर्थात् ब्रह्म केवल निमित्तकारण ही नहीं, क्योंकि कथित प्रतिज्ञा और दृष्टान्त का सामञ्जस्य उभयविध कारणता में ही होता है, केवल निमित्तकारणता मानने पर प्रतिज्ञा और दृष्टान्त उपरुद्ध (विरुद्ध या बाधित) हो जाते हैं—

न मुख्ये सम्भवत्यर्थे जघन्या वृत्तिरिष्यते ।
न चानुमानिकं युक्तमागमेनापबाधितम् ॥
सर्वे हि तावद् वेदान्ता पौर्वापर्येण वीक्षिताः ।
ऐकान्तिकाद्वैतपरता द्वैतमात्रनिषेधतः ॥

५२६ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम्[ अ. १ पा. ४ सू. २३

कारणं च, न केवलं निमित्तकारणमेव । कस्मात् ? प्रतिज्ञादृष्टान्तानुपरोधात् । एवं प्रतिज्ञादृष्टान्तौ श्रौतौ नोपरुध्येते । प्रतिज्ञा तावत्—'उत तमादेशमप्राक्ष्यो येनाश्रुतं श्रुतं भवत्यमतं मतमविज्ञातं विज्ञातम्' ( छा० ६।१।२ ) इति । तत्र चैकेन विज्ञातेन सर्वमन्यदविज्ञातमपि विज्ञातं भवतीति प्रतीयते । तच्चोपादानकारणविज्ञाने सर्वविज्ञानं संभवत्युपादानकारणाव्यतिरेकात्कार्यस्य । निमित्तकारणाव्यतिरेकस्तु कार्यस्य नास्ति, लोके तक्षणः प्रासादाव्यतिरेकादर्शनात् । दृष्टान्तोऽपि—'यथा सोम्यैकेन मृत्पिण्डेन सर्वं मृन्मयं विज्ञातं स्याद्वाचारम्भणं विकारो नामधेयं मृत्तिकेत्येव सत्यम्' इत्युपादानकारणगोचर एवाम्नायते । तथा 'एकेन लोहमणिना सर्वं लोहमयं विज्ञातं स्यात्' 'एकेन नखनिकृन्तनेन सर्वं कार्ष्णायसं विज्ञातं स्यात्' ( छा० ६।१।४,५,६ ) इति च । तथान्यत्रापि 'कस्मिन्नु भगवो विज्ञाते सर्वमिदं विज्ञातं भवति' ( मुण्ड० १।१।२ ) इति प्रतिज्ञा । 'यथा पृथिव्यामोषधयः संभवन्ति' ( मुण्ड० १।१।७ ) इति दृष्टान्तः । तथा 'आत्मनि खल्वरे दृष्टे श्रुते मते विज्ञाते इदं सर्वं विदितम्' इति प्रतिज्ञा ।' स यथा दुन्दुभेर्हन्यमानस्य न बाह्याञ्छब्दाञ्छक्नुयाद् ग्रहणाय दुन्दुभेस्तु ग्रहणेन दुन्दुभ्याघातस्य वा शब्दो गृहीतः' ( बृ० ४।५।६,८ ) इति दृष्टान्तः । एवं यथासंभवं प्रतिवेदान्तं प्रतिज्ञादृष्टान्तौ प्रकृतिसाधनौ प्रत्येत्तव्यौ । यत इतीयं पञ्चमी—'यतो वा इमानि


भामती

तदिहापि प्रतिज्ञादृष्टान्तौ मुख्यार्थावेव युक्तौ न तु यजमानः प्रस्तर इतिवद् गुणकल्पनया नेतव्यौ तस्यार्थवादस्यान्यार्थपरत्वात् । प्रतिज्ञादृष्टान्तवाक्ययोस्त्वद्वैतपरत्वादुपादानकारणतात्मकत्वाच्चोपादेयस्य कार्यजातस्योपादानज्ञानेन तज्ज्ञानोपपत्तेः । निमित्तकारणं तु कार्यादत्यन्तभिन्नमिति न तज्ज्ञाने कार्यज्ञानं भवति । अतो ब्रह्मोपादानकारणं जगतः । न च ब्रह्मणोऽन्यन्निमित्तकारणं जगत इत्यपि युक्तम् । प्रतिज्ञादृष्टान्तोपरोधादेव । नहि तदानीं ब्रह्मणि ज्ञाते सर्वं विज्ञातं भवति । जगन्निमित्तकारणस्य ब्रह्मणोऽन्यस्य सर्वमध्यपातितनस्तज्ज्ञानेनाविज्ञानात् । यत इति च पञ्चमी न कारणमात्रे स्मर्यते, अपि तु प्रकृतौ जनिकर्तुः

भामती-व्याख्या

कथित प्रतिज्ञा और दृष्टान्त के आधार पर जो ब्रह्म में जगत् की उपादानता प्रतिपादित है, वह मुख्य ( अभिधा ) वृत्ति को लेकर वास्तविक उपादानकारणता ही माननी होगी, यजमानगत गौण प्रस्तररूपता ( यज्ञोपकारिता ) के समान प्रधानता, ( प्रशस्तता या प्रमुखता ) रूप गौण उपादानता नहीं, क्योंकि “यजमानः प्रस्तरः” ( तै० सं० २।१।६ ) यह अर्थवाद प्रस्तरूप मुख्यार्थपरक नहीं, वैसा प्रकृत में नहीं । प्रतिज्ञा और दृष्टान्त-वाक्य अद्वैतपरक ही हैं, अतः समस्त उपादेयभूत जगत् के ज्ञान का उसके उपादान-कारणभूत ब्रह्म के ज्ञान से हो होना न्याय-सिद्ध है । निमित्तकारण तो अपने कार्य-प्रपञ्च से अत्यन्त भिन्न होता है, अतः उसके ज्ञान से समस्त कार्य का ज्ञान नहीं हो सकता । अतः ब्रह्म जगत् का उपादानकारण सिद्ध होता है । 'ब्रह्म से भिन्न और कोई पदार्थ जगत् का निमित्तकारण है'—यह कहना भी युक्ति-युक्त नहीं, क्योंकि उक्त प्रतिज्ञा और दृष्टान्त के अनुरोध पर वैसा मानना सम्भव नहीं । सांख्य-सम्मत प्रधानादि तत्त्व तो कार्य-वर्ग में ही आ जाते हैं, अतः उनके ज्ञान से समस्त कार्य का ज्ञान क्योंकर होगा ? यह जो कहा गया कि वेदान्त-वाक्य सामान्य कारणता के प्रतिपादक हैं, वह भी उचित नहीं, क्योंकि “यतो वा इमानि भूतानि जायन्ते” ( तै. उ. ३।१ ) यहाँ 'यतः' पद में जो पञ्चमी विभक्ति है, “जनिकर्तुः प्रकृति” ( पा. सू. १।४।३० ) इस सूत्र के अनुसार जनि ( उत्पत्ति ) के कर्त्ता ( जायमान वस्तुमात्र )

अभिन्ननिमित्तोपादानं ब्रह्म ] हिन्दीसहितभामतीसंवलितम् ५२७

भूतानि जायन्ते' इत्यत्र 'जनिकर्तुः प्रकृतिः' ( पा० सू० १।४।३० ) इति विशेषस्मरणात्प्रकृतिलक्षण एवापादाने द्रष्टव्या । निमित्तत्वं त्वधिष्ठात्रन्तराभावादधिगन्तव्यम् । यथा हि लोके मृत्सुवर्णादिकमुपादानकारणं कुलालसुवर्णकारादीनधिष्ठातृनपेक्ष्य प्रवर्तते, नैवं ब्रह्मण उपादानकारणस्य सतोऽन्योऽधिष्ठातापेक्षितव्योऽस्ति, प्रागुत्पत्तेरेकमेवाद्वितीयमित्यवधारणात् । अधिष्ठात्रन्तराभावोऽपि प्रतिज्ञादृष्टान्तानुपरोधादेवोदितो वेदितव्यः । अधिष्ठातरि ह्युपादानादन्यस्मिन्नभ्युपगम्यमाने पुनरेकविज्ञानेन सर्वविज्ञानस्यासंभवात् प्रतिज्ञादृष्टान्तोपरोध एव स्यात् । तस्मादधिष्ठात्रन्तराभावादात्मनः कर्तृत्वमुपादानान्तराभावाच्च प्रकृतित्वम् ॥ २३ ॥

कुतश्चात्मनः कर्तृत्वप्रकृतित्वे ? —

अभिध्योपदेशाच्च ॥ २४ ॥

अभिध्योपदेश आत्मनः कर्तृत्वप्रकृतित्वे गमयति 'सोऽकामयत बहु स्यां प्रजायेयेति, 'तदैक्षत बहु स्यां प्रजायेय' इति च । तत्राभिध्यानपूर्विकायाः स्वातन्त्र्यप्रवृत्तेः कर्तेति गम्यते । बहु स्यामिति प्रत्यगात्मविषयत्वाद् बहुभवनाभिध्यानस्य प्रकृतितिरित्यपि गम्यते ॥ २४ ॥

साक्षाच्चोभयाम्नानात् ॥ २५ ॥

प्रकृतित्वस्यायमभ्युच्चयः । इतश्च प्रकृतिर्ब्रह्म, यत्कारणं साक्षाद् ब्रह्मैव कारणमुपादायोभौ प्रभवप्रलयावाम्नायेते — 'सर्वाणि ह वा इमानि भूतान्याकाशादेव समुत्पद्यन्ते, आकाशं प्रत्यस्तं यन्ति' ( छा० १।९।१ ) इति । यद्धि यस्मात्प्रभवति यस्मिंश्च प्रलीयते, तत्तस्योपादानं प्रसिद्धम् । यथा व्रीहियवादीनां पृथिवी । 'साक्षात्' इति चोपादानान्तरानुपदानं दर्शयत्याकाशादेवेति । प्रत्यस्तमयश्च नोपादानादन्यत्र

भामती

प्रकृतिरिति । ततोऽपि प्रकृतित्वमवगच्छामः । दुन्दुभिग्रहणं दुन्दुभ्याघातग्रहणं च तद्गतशब्दत्वसामान्योपलक्षणार्थम् ॥ २३ ॥

अनागतेच्छासङ्कल्पोऽभिध्या । एतया खलु स्वातन्त्र्यलक्षणेन कर्तृत्वेन निमित्तत्वं दर्शितम् । बहु स्यामिति च स्वविषयतयोपादानत्वमुक्तम् ॥ २४ ॥

आकाशादेव ब्रह्मण एवेत्यर्थः । साक्षादिति चेति सूत्रावयवमनूद्य तस्यार्थं व्याचष्टे ॐ आकाशा-

भामती-व्याख्या

के उपादानकारण (प्रकृति) की अपादानसंज्ञा की गई और “अपादाने पञ्चमी” (पा. सू. २।३।२८) इस सूत्र से उस पञ्चमी का विधान हुआ, अतः प्रकृति के अर्थ में 'यत्' पद पर्यवसित होता है, कारणमात्र में नहीं । अतः व्याकरण के अनुसार भी ब्रह्म जगत् की प्रकृति (उपादानकारण) ही अधिगत होता है । भाष्यकार ने जो दुन्दुभि-श्रुति का उपन्यास किया है, वहाँ दुन्दुभि या दुन्दुभि के आघात का ग्रहण होने से सभी शब्दों का ग्रहण बताया गया है, किन्तु शब्द का उपादानकरण न तो दुन्दुभि है और न दुन्दुभि का आघात, अतः 'दुन्दुभि' और 'दुन्दुभ्याघात' पद शब्द-सामान्य का उपलक्षक माना जाता है ॥ २३ ॥

“अभिध्योपदेशाच्च”—इस सूत्र में 'अभिध्या' शब्द का अर्थ है—भावी वस्तु की इच्छा । इस इच्छा के द्वारा निमित्तकारणता प्रदर्शित की गई है और 'बहु स्याम्'—यहाँ ब्रह्म में स्वोपादनक बहुकार्य-सर्जन के द्वारा उपादानकारणता सूचित की गई है ॥ २४ ॥

“सर्वाणि ह वा इमानि भूतान्याकाशादेव” (छां. १।९।१) इस श्रुति में आकाशादेव का अर्थ 'ब्रह्मण एव' है। “साक्षाच्चोभयाम्नानात्”—इस सूत्र के अवयवभूत 'साक्षात्' पद ।

५२८ ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम् [ अ. १ पा. ४ सू. २६

कार्यस्य दृष्टः ॥ २५ ॥

आत्मकृतेः परिणामात् ॥ २६ ॥

इतश्च प्रकृतिर्ब्रह्म, यत्कारणं ब्रह्मप्रक्रियायाम् 'तदात्मानं स्वयमकुरुत' ( तै० २।७ ) इत्यात्मनः कर्मत्वं कर्तृत्वं च दर्शयति। आत्मानमिति कर्मत्वं, स्वयमकुरुतेति कर्तृत्वम्। कथं पुनः पूर्वसिद्धस्य सतः कर्तृत्वेन व्यवस्थितस्य क्रियमाणत्वं शक्यं सम्पादयितुम् ? परिणामादिति ब्रूमः । पूर्वसिद्धोऽपि हि सन्नात्मा विशेषेण विकारात्मना परिणमयामासात्मानमिति । विकारात्मना च परिणामो मृदाद्यासु प्रकृतिषूपलब्धः । स्वयमिति च विशेषणान्निमित्तान्तरानपेक्षत्वमपि प्रतीयते । परिणामादिति वा पृथक्सूत्रम् । तस्यैषोऽर्थः- इतश्च प्रकृतिर्ब्रह्म, यत्कारणं ब्रह्मण एव विकारात्मना

भामती

देव ॐ इति श्रुतिर्ब्रह्मणो जगदुपादानत्वमवधारयन्ती उपादानान्तराभावं साक्षादेव दर्शयतीति साक्षादिति सूत्रावयवेन दर्शितमिति योजना ।। २५ ।।

प्रकृतिग्रहणमुपलक्षणं निमित्तमित्यपि द्रष्टव्यं, कर्मत्वेनोपादानत्वात्कर्तृत्वेन च तत्प्रति निमित्तत्वात् । ॐ कथं पुनः इति ॐ । सिद्धसाध्ययोरेकत्रासमवायो विरोधादिति । ॐ परिणामादिति ब्रूमः इति ॐ । पूर्वसिद्धस्याप्यनिर्वचनीयविकारात्मना परिणामोऽनिर्वचनीयत्वाद्भेदैनाभिन्न इवेति सिद्धस्यापि साध्यत्वमित्यर्थः । एकवाक्यत्वेन व्याख्याय परिणामादित्यवच्छिद्य व्याचष्टे ॐ परिणामादिति वा इतिॐ ।

भामती-व्याख्या

का अनुवाद कर उसका अर्थ किया जाता है—"आकाशादेव" । 'आकाशादेव समुत्पद्यन्ते'—यह श्रुति ब्रह्म में जगत् की उपादानकारणता का अवधारण करती हुई अन्ययोग-व्यवच्छेदक एवकार के द्वारा आकाश ( ब्रह्म ) से भिन्न पदार्थ की उपादानता का जो निषेध करती है, वही निषेध सूत्रकार ने 'साक्षात्' पद से सूचित किया है। 'श्रुतिगतैवैकारसूचितमुपादानान्तराभावं साक्षादिति सूत्रावयवेन सूचयति सूत्रकारः'--ऐसी योजना कर लेनी चाहिए ।। २५ ।।

भाष्यकार ने जो कहा है—"इतश्च प्रकृतिर्ब्रह्म"। यहाँ पर 'प्रकृति' पद निमित्तकारण का भी उपलक्षक है, क्योंकि आगे चलकर भाष्यकार कहते हैं—"तदात्मानं स्वयमकुरुत "इत्यात्मनः कर्मत्वं कर्तृत्वं च दर्शयति" यहाँ 'कर्मत्व' हेतु उपादानता और 'कर्तृत्व' हेतु निमित्तकारणता का साधक है, अतः प्रतिज्ञा-वाक्य में भी दोनों कारणताओं का निर्देश होना चाहिये, अतः 'प्रकृति' पद को अजहत्स्वार्थ लक्षणा के द्वारा उभयविध कारणता का बोधक मानना आवश्यक है। "कथं पुनः पूर्वसिद्धस्य सतः कर्तृत्वेन व्यवस्थितस्य क्रियमाणत्वम्" इस शङ्का-भाष्य का आशय यह है कि श्रुति ने जो कहा है कि परमात्मा ने अपने-आपको सर्जन किया, वहाँ स्वकर्तृक और स्वकर्मक सर्जन क्रिया प्रतीत होती है, किन्तु किसी क्रिया के कर्तृत्व और कर्मत्व—दोनों एक पदार्थ में नहीं रह सकते, क्योंकि 'कर्तृत्व' धर्म सिद्ध और 'कर्मत्व' साध्य होता है, अतः दोनों धर्मों का परस्पर विरोध है। "परिणामादिति ब्रूमः"—इस समाधान-भाष्य का तात्पर्य यह है कि [ श्रुति ने स्वयं विरुद्ध धर्मों का एकत्र समावेश बताया है—'सच्च त्यच्चाभवत्' (तै० उ० २।६) । स्वप्न में स्वशिरश्छेदनादि के समान विरुद्धरूप से प्रतीयमान आरोपित धर्मों का कोई विरोध नहीं होता ] एक ही ब्रह्म सद्रूपेण सिद्ध (कर्ता) है और अनिर्वचनीय परिणामवत्त्वेन साध्य (कर्म) होता है। जैसे - अरजत में रजत का आरोप होता है, वैसे ही अभिन्न में भेद का आरोप ।

'आत्मकृतेः' और 'परिणामात्'—इन दोनों पदों की एकवाक्यता-पक्षीयव्याख्या करके 'परिणामात्'—इस पद को पृथक् करके उसकी व्याख्या की जाती है—"परिणामादिति