भारतकोश
भामती (वाचस्पति मिश्र - ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य चतुःसूत्री हिन्दी व्याख्या)

भामती (वाचस्पति मिश्र - ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य चतुःसूत्री हिन्दी व्याख्या)

Bhamati of Vachaspati Mishra Hindi

वाचस्पति मिश्र (व्याख्याकार: स्वामी योगेन्द्रानन्द) द्वारा

स्रोत: Brahma Sutra Shankara Bhashya with Vachaspati Mishra Bhamati and Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished639 पृष्ठ

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[द्रष्टव्यत्वेन ब्रह्मनिर्देशः ] हिन्दीसहितभामतीसंवलितम् ५१५

मिति काशकृत्स्न आचार्यो मन्यते। तथाच ब्राह्मणम्—'अनेन जीवेनात्मनानुप्रविश्य नामरूपे व्याकरवाणि' ( छा० ६।३।२ ) इत्येवंजातीयकं परस्यैवात्मनो जीवभावेनावस्थानं दर्शयति। मन्त्रवर्णश्च—'सर्वाणि रूपाणि विचित्य धीरो नामानि कृत्वाभिवदन् यदास्ते' ( तै० आ० ३।१२।७ ) इत्येवंजातीयकः। न च तेजःप्रभृतीनां सृष्टौ जीवस्य पृथक्सृष्टिः श्रुता, येन परस्मादात्मनोऽन्यस्तद्विकारो जीवः स्यात्। काशकृत्स्नस्याचार्यस्याविकृतः परमेश्वरो जीवो नान्य इति मतम्। आश्मरथ्यस्य तु यद्यपि जीवस्य परस्मादनन्यत्वमभिप्रेतं, तथापि प्रतिज्ञासिद्धेरिति सापेक्षत्वाभिधानात्कार्यकारणभावः कियानप्यभिप्रेत इति गम्यते। औडुलोमिपक्षे पुनः स्पष्टमेवावस्थान्तरापेक्षौ भेदाभेदौ गम्येते। तत्र काशकृत्स्नीयं मतं श्रुत्यनुसारोति गम्यते, प्रतिपिपादयिषिता-

भामती

काशाद्व्यस्तद्विकारो वा । ततश्च जीवात्मनोपक्रमः परमात्मनैवोपक्रमस्तस्य ततोऽभेदात् । स्थूलदर्शिलोकप्रतीतिसौकर्यायौपाधिकेनात्मरूपेणोपक्रमः कृतः । अत्रैव श्रुतिं प्रमाणयति ॐ तथा च इति ॐ । अथ विकारः परमात्मनो जीवः कस्मान्न भवत्याकाशादिवदित्याह ॐ न च तेजःप्रभृतीनाम् इति ॐ । नहि यथा तेजःप्रभृतीनामात्मविकारत्वं श्रूयते एवं जीवस्येति । आचार्यत्रयमतं विभजते ॐ काशकृत्स्नस्याचार्यस्य इति ॐ । आत्यन्तिके सत्यभेदे कार्यकारणभावाभावात् अनात्यन्तिकोऽभेद आस्थेयस्तथा च कथञ्चिद् भेदोऽपीति तमास्थाय कार्यकारणभाव इति । कियानपीत्युक्तं मतत्रयमुक्त्वा काशकृत्स्नीयमतं साधुत्वेन निर्धारयति ॐ तत्र तेषु मध्ये काशकृत्स्नीयं मतम् इति ॐ । आत्यन्तिके हि जीवपरमात्मनोरभेदे तात्त्विकेऽनाद्यविद्योपाधिकल्पितो भेदस्तत्त्वमसीति जीवात्मनो ब्रह्मभावत्वोपदेशश्रवणमनननिदिध्यासनप्रकर्षपर्यन्तजमना साक्षात्कारेण विद्यया शक्यः समूलकाषं कषितुं रज्जुवामहिविभ्रम इव रज्जुतत्त्वसाक्षात्कारेण, राजपुत्रस्येव च म्लेच्छकुले वर्द्धमानस्यात्मनि समारोपितो म्लेच्छभावो राजपुत्रोऽसीति प्राप्तोपदेशेन । न तु मृद्विकार-

भामती-व्याख्या

जीव का उपक्रम वस्तुतः ब्रह्म का ही उपक्रम है, क्योंकि जीव का ब्रह्म से अभेद है। स्थूल में दृष्टिवाले लौकिक व्यक्तियों की सुविधा को ध्यान रख कर औपाधिक रूप से आत्मा का उपक्रम किया गया है। इस अर्थ में श्रुति प्रमाण प्रदर्शित करते हैं—"तथा च ब्राह्मणम्" । जीव ब्रह्म का विकार क्यों नहीं ? इस प्रश्न का उत्तर है—न च तेजः प्रभृतीनां सृष्टौ जीवस्य पृथक् सृष्टिः श्रुतः"। जैसे "तत् तेजोऽसृजत" ( छां० ६।२।३ ) इत्यादि श्रुतियों में तेज आदि की सृष्टि प्रतिपादित है, वैसे जीव की सृष्टि कहीं भी अभिहित नहीं, अतः जीव विकार नहीं हो सकता।

सूत्रित आचार्य-त्रयी के मतों का सिंहावलोकन किया जाता है—"काशकृत्स्नस्याचार्यस्य"। आशय यह है कि आत्यन्तिक अभेद मानने पर कार्य-कारणभाव नहीं बन सकता, अतः जीव और ब्रह्म का अनात्यन्तिक ( कथंचित् ) अभेद मानना होगा, तब कथंचित् भेद भी सम्भव हो जाता है, उस (भेद) को लेकर कार्य-कारणभाव उपपन्न हो जाता है, भाष्यकार ने यही कहा है—"कार्यकारणभावः कियानपि अभिप्रेतः"। तीनों का परिचय देकर उनमें काशकृत्स्नीय मत को उपनिषदंसारी बताया जाता है—'तत्र' अर्थात् 'तेषु मध्ये' "काशकृत्स्नायं मतं श्रुत्यनुसारीति गम्यते"। सारांश यह है कि जीव और ब्रह्म का आत्यन्तिक अभेद तात्त्विक होने पर भी अनादि अविद्यारूप उपाधि के द्वारा कल्पित जो भेद प्रतीत होता है उसका "तत्त्वमसि"—इत्यादि महावाक्यों के द्वारा जीव में ब्रह्मभाव के तात्त्विक श्रवण, मनन और निदिध्यासन के अनुष्ठान से समुत्पन्न अभेद-साक्षात्कार वैसे ही समूल नाश कर दिया करता है, जैसे रज्जु में समुत्पन्न सर्प-भ्रम को रज्जुतत्त्व का साक्षात्कार। अथवा जैसे म्लेच्छ-कुल में परिपोषित होने के कारण राज-पुत्र में समारोपित