भामती (वाचस्पति मिश्र - ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य चतुःसूत्री हिन्दी व्याख्या)
Bhamati of Vachaspati Mishra Hindi
वाचस्पति मिश्र (व्याख्याकार: स्वामी योगेन्द्रानन्द) द्वारा
स्रोत: Brahma Sutra Shankara Bhashya with Vachaspati Mishra Bhamati and Hindi Commentary (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें| ५१६ | ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम् | [ अ १ पा. ४ सू. २३ |
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र्थानुसारत्वात् 'तत्त्वमसि' इत्यादिश्रुतिभ्यः। एवं च सति तज्ज्ञानादमृतत्वमवकल्पते। विकारात्मकत्वे हि जीवस्याभ्युपगम्यमाने विकारस्य प्रकृतिसम्बन्धे प्रलयप्रसङ्गान्न तज्ज्ञानादमृतत्वमवकल्पेत। अतश्च स्वाश्रयस्य नामरूपस्यासंभवादुपाध्याश्रयं नामरूपं जीव उपचर्यते। अत एवोत्पत्तिरपि जीवस्य कचिदग्निविस्फुलिङ्गोदाहरणेन श्राव्यमाणोपाध्याश्रयैव वेदितव्या। यदप्युक्तं—प्रकृतस्यैव महतो भूतस्य द्रष्टव्यस्य
भामती
शरावादिः शतशोपि मृन्मृदिति चिन्त्यमानस्तज्जन्मना मृद्भावसाक्षात्कारेण शक्यो निवर्तयितुं, तत् कस्य हेतोः? तस्यापि मृदो भिन्नाभिन्नस्य तात्त्विकत्वात्, वस्तुनस्तु ज्ञानेनोच्छेत्तुमशक्यत्वात्, सोऽयं प्रतिपिपादयिषिताथानुसारः। अपि च जीवस्यात्मविकारत्वे तस्य ज्ञानध्यानादिसाधनानुष्ठानात् स्वप्रकृतावप्यये सति नामृतत्वस्याशास्तीत्यपुरुषार्थत्वममृतत्वप्राप्तिश्रुतिविरोधश्च। काशकृत्स्नमते त्वेतदुभयं नास्तीत्याह एवं सति इति। ननु यदि जीवो न विकारः किन्तु ब्रह्मैव, कथं तर्हि तस्मिन्नामरूपापाध्यत्वश्रुतिः कथञ्च यथग्नेः क्षुद्रा विस्फुलिङ्गा इति ब्रह्मविकारश्रुतिर इत्याशङ्कामुपसंहारव्याजेन निराकरोति अतश्च स्वाश्रयस्य इति। यतः प्रतिपिपादयिषिताथानुसारश्चामृतत्वप्राप्तिश्च विकारपक्षे न सम्भवतः, अतश्चेति योजना। द्वितीयपूर्वपक्षबीजमनयेवं त्रिसूत्र्यापाकरोति यदप्युक्तम् इति। शेषमतिरोहितार्थं व्याख्या-
भामती-व्याख्या
म्लेच्छभाव को 'राजपुत्रोऽसि'—इस प्रकार के आप्तोपदेश से जनित तत्त्व-साक्षात्कार विनष्ट कर दिया करता है। यदि जीवभाव को ब्रह्म का विकार माना जाता, तब ब्रह्म के साक्षात्कार से उसकी निवृत्ति नहीं होती, क्योंकि मृत्तिका के विकारभूत घट, शराव (कसोरा या परई) आदि का विनाश मृत्तिका का सैकड़ों बार चिन्तन या साक्षात्कार करने पर भी नहीं होता। वह क्यों? इस लिए कि घट-शराव आदि मृत्तिका से भिन्नाभिन्न होने पर भी तात्त्विक होते हैं, काल्पनिक नहीं। कल्पना-प्रसूत पदार्थ ही ज्ञान के द्वारा उच्छिन्न होते हैं, वास्तविक वस्तु-तत्त्व नहीं, अतः काशकृत्स्नीय मत वेदान्त में प्रतिपिपादयिषित प्रक्रिया के अनुरूप है। दूसरी बात यह भी है कि जीव को यदि ब्रह्म का विकार माना जाता है, तब वह अपनी प्रकृतिभूत ब्रह्म को अपना स्वरूप मान कर वैसा ही ध्यान का अनुष्ठान करेगा फलतः उसी प्रकृति में लीन हो जायगा। इसे दर्शनकारों ने प्रकृति-लय की संज्ञा देते हुए आत्मा का बन्धन ही माना है, मोक्ष नहीं—"तत्र प्रकृतावात्मज्ञानाद् ये प्रकृतिमुपासते, तेषां प्राकृतिको बन्धः, यः पुराणे प्रकृतिलयान् प्रत्युच्यते—'पूर्ण शतसहस्रं हि तिष्ठन्त्यव्यक्तचिन्तकाः' (सां. त. कौ. पृ. ८६)। प्रकृति-लय से अमृतत्व (मोक्ष) की कोई आशा नहीं, प्रत्युत अमृतत्व-प्राप्ति-बोधक श्रुतियों का विरोध ही उपस्थित होता है। काशकृत्स्नीय मत में अमृतत्व का अभाव और अभेद-श्रुति-विरोध—ये दोनों आपत्तियां नहीं हैं—"एवं च सति तज्ज्ञानादमृतत्वमवकल्पते"। यदि जीव ब्रह्म का विकार नहीं, अपितु ब्रह्मरूप ही है, तब श्रुति ने जीव में नाम और रूप की आश्रयता क्यों कही है? एवं "यथाग्नेः क्षुद्रा विस्फुलिङ्गाः" (बृह० उ० २।१।२०) इत्यादि श्रुतियों ने जीव को ब्रह्म का विकार क्यों कहा है? इन शङ्काओं का निराकरण करते हुए उपसंहार किया जाता है—अतश्च स्वाश्रयस्य नामरूपस्यासम्भवाद् उपाध्याश्रयं नामरूपं जीवे उपचर्यते"। यहाँ 'अतः' शब्द 'यतः' शब्द की नित्य अपेक्षा करता है, इस लिए 'यतः प्रतिपिपादयिषिताथानुसारश्चामृतत्वप्राप्तिश्च विकारपक्षे न सम्भवतः, अतः—ऐसी योजना कर लेनी चाहिए।
[ उक्त स्थल पर जीव के द्रष्टव्यताभिधानरूप पूर्व पक्ष में तीन हेतु प्रस्तुत किए गए—(१) सन्दर्भ-श्रुति के उपक्रम में जीव का प्रतिपादन। (२) उत्थान-श्रुति में जीवाभेदा-