भामती (वाचस्पति मिश्र - ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य चतुःसूत्री हिन्दी व्याख्या)
Bhamati of Vachaspati Mishra Hindi
वाचस्पति मिश्र (व्याख्याकार: स्वामी योगेन्द्रानन्द) द्वारा
स्रोत: Brahma Sutra Shankara Bhashya with Vachaspati Mishra Bhamati and Hindi Commentary (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें५१८ | ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम् | [अ. १ पा. ४ सू. २२
एवेदं द्रष्टव्यत्वमिति तदपि काशकृत्स्नीयेनैव दर्शनेन परिहरणीयम्। अपि च 'यत्र हि द्वैतमिव भवति तदितर इतरं पश्यति' (बृ० २।४।१३) इत्यारभ्याविद्याविषये तस्यैव दर्शनादिलक्षणं विशेषविज्ञानं प्रपञ्च्य 'यत्र त्वस्य सर्वमात्मैवाभूत्तत्केन कं पश्येत्' इत्यादिना विद्याविषये तस्यैव दर्शनादिलक्षणस्य विशेषविज्ञानस्याभावमभिदधाति। पुनश्च विषयाभावेऽपि आत्मानं विजानीयाद् इत्याशङ्क्य 'विज्ञातारमरे केन विजानीयात्' इत्याह। ततश्च विशेषविज्ञानाभावोपपादनपरत्वाद्वाक्यस्य विज्ञानधातुरेव केवलः सम्भूतपूर्वगत्या कर्तृवचनेन तृचा निर्दिष्ट इति गम्यते। दर्शितं तु पुरस्तात् काशकृत्स्नीयस्य पक्षस्य श्रुतिमत्त्वम्। अतश्च विज्ञानात्मपरमात्मनोरविद्याप्रत्युपस्थापि-
भामती
ॐ अपि च यत्र हि इति ॐ। कस्मात् पुनः काशकृत्स्नस्य मतमास्थीयते नेतरेषामाचार्याणामित्यत आह ॐ दर्शितं तु पुरस्ताद् इति। काशकृत्स्नीयस्य मतस्य श्रुतिप्रबन्धोपन्यासेन पुनः श्रुतिमत्त्वं स्मृतिमत्त्वं चोपसंहारोपक्रमपवाह ॐ अतश्च इति ॐ। क्वचित्पाठ आतश्चेति, तस्यावश्यं चेत्यर्थः। जननजरामरणभीतयो विक्रियास्तासां सर्वासां महानज इत्यादिना प्रतिषेधः (परिणामपक्षेऽन्यस्य चान्यभावपक्षे ऐकान्तिकाद्वैतप्रतिपादनपरा एकमेवाद्वितीयमित्यादयो द्वैतदर्शननिन्दापराश्चान्योऽसावन्योऽहमस्मीत्यादयो जन्मजरादिविक्रियां प्रतिषेधपराश्चैष महानज इत्यादयः श्रुतय उपरुध्येरन्। अपि च यदि जीवपरमात्मनोर्भेदाभेदावास्थीयेयातां ततस्तयोर्मिथो विरोधात्समुच्चयाभावादेकस्य बलीयस्त्वे नात्मनि निरपवादं विज्ञानं जायेत, बलीयसेन दुर्बलपक्षावलम्बिनो ज्ञानस्य बाधनात्। अथ तयोस्तुल्यबलत्वेनावगमान्न बलाबलावधारणं, ततः संशये सति न सुनिश्चितार्थमात्मनि ज्ञानं भवेत् सुनिश्चितार्थं च ज्ञानं मोक्षोपायः श्रूयते 'वेदान्तविज्ञान-
भामती-व्याख्या
जा सकता—यह उक्त अवधारण का तात्पर्य है। केवल काशकृत्स्नीय दर्शन के अनुरोध पर ही ब्रह्म में विज्ञातृत्व का व्यवहार पूर्वावस्था को लेकर नहीं किया जाता, अपितु पूर्वापर के वाक्यों की आलोचना से भी वही निष्कर्ष निकलता है—"अपि च 'यत्र हि द्वैतमिव भवति, तदितर इतरं पश्यति' (बृह० उ० २।४।१३) इत्यादि"। काशकृत्स्नीय मत पर ही इतनी आस्था क्यों? अन्य आचार्यों के मतों पर क्यों नहीं? इस प्रश्न का उत्तर है—"दर्शितं तु पुरस्तात् काशकृत्स्नीय पक्षस्य श्रुतिमत्त्वम्"। अनेक श्रौत और स्मार्त वाक्यों का साक्ष्य प्रस्तुत कर काशकृत्स्नीय मत का वर्चस्व स्थापित किया जाता है—"अतश्च विज्ञानात्मपरमात्मनोः"। 'अतः' के स्थान पर कहीं-कहीं 'आतः' पाठ उपलब्ध होता है, जिसका अर्थ है—'अवश्यम्'। जनन, जरा मरण और भय—ये विकार हैं, इनका प्रतिषेध "स वा एष महानज आत्मा अजरोऽमरो ब्रह्म" (बृह. उ. ४।४।२५) इस श्रुति से किया गया है। परिणाम या अन्य कारण से अन्य कार्य की उत्पत्तिरूप आरम्भवाद में "एकमेवाद्वितीयम्" इत्यादि ऐकान्तिक अभेदपरक "अन्योऽसावन्योऽहमस्मि" इत्यादि द्वैत-दर्शन-निन्दापरक एवं 'एष महानजः' इत्यादि जननादि विकार निषेधक श्रुति-वाक्य विरुद्ध पड़ जाते हैं। दूसरी बात यह भी है कि यदि जीव के परमात्मा से भेद और अभेद—दोनों माने जाते हैं, तब कोई भी ज्ञान निर्बाध और असन्दिग्ध न हो सकेगा, क्योंकि भेद और अभेद परस्पर विरुद्ध धर्म हैं, एकत्र समुचित नहीं रह सकते। उनमें एक को प्रबल और दूसरे को दुर्बल मानना होगा, अतः सबलपक्षीय ज्ञान से निर्बलपक्षीय ज्ञान का बाध (अपवाद) हो जायगा और यदि भेद और अभेद दोनों में बलाबल का निश्चय नहीं होता, तब संशयात्मक ज्ञान होगा निश्चितार्थक आत्मज्ञान न हो सकेगा किन्तु सुनिश्चितार्थक आत्मज्ञान को ही मोक्ष का साधन माना गया है—"वेदान्तविज्ञानसुनिश्चितार्थाः" (मुण्ड. ३।२।६)। भाष्यकार