भामती (वाचस्पति मिश्र - ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य चतुःसूत्री हिन्दी व्याख्या)
Bhamati of Vachaspati Mishra Hindi
वाचस्पति मिश्र (व्याख्याकार: स्वामी योगेन्द्रानन्द) द्वारा
स्रोत: Brahma Sutra Shankara Bhashya with Vachaspati Mishra Bhamati and Hindi Commentary (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंद्रष्टव्यत्वेन ब्रह्मनिर्देशः ] हिन्दीसहितभामतीसंवलितम् ५१३
मात्मा' इति च। तस्याः प्रतिज्ञायाः सिद्धिं सूचयत्येतल्लिङ्गं यत्प्रियसंसूचितस्या- त्मनो द्रष्टव्यत्वादिसंकीर्तनम्। यदि हि विज्ञानात्मा परमात्मनोऽन्यः स्यात्ततः पर- मात्मविज्ञानेऽपि विज्ञानात्मा न विज्ञात इत्येकविज्ञानेन सर्वविज्ञानं यत्प्रतिज्ञातं तद्धीयेत। तस्मात्प्रतिज्ञासिद्धयर्थं विज्ञानात्मपरमात्मनोरभेदांशेनोपक्रमणमित्या- श्मरथ्य आचार्यो मन्यते ॥ २० ॥
उत्क्रमिष्यत एवंभावादित्यौडुलोमिः ॥ २१ ॥
विज्ञानात्मन एव देहेन्द्रियमनोबुद्धिसंघातोपाधिसंपर्कात्कलुषीभूतस्य ज्ञानध्या- नादिसाधनानुष्ठानात् संप्रसन्नस्य देहादिसंघातादुत्क्रमिष्यतः परमात्मैक्योपपत्तेरिदम-
भामती
व्यावृत्त्यभावप्रसङ्गात्, तथा जीवात्मानोऽपि ब्रह्मविकारा न ब्रह्मणोऽत्यन्तं भिद्यन्ते चिद्रूपस्वभावप्रसङ्गा- ज्ञाप्यत्यन्तं न भिद्यन्ते परस्परं व्यावृत्त्यभावप्रसङ्गात्, सर्वज्ञं प्रत्युपदेशवैयर्थ्याच्च। तस्मात् कथम्चिद्भेदो जीवात्मनामभेदश्च। तत्र तद्विज्ञानेन सर्वविज्ञानप्रतिज्ञासिद्धये विज्ञानात्मपरमात्मनोरभेदमुपादाय परमा- त्मनि दर्शयितव्ये विज्ञानात्मनोपक्रम इत्याश्मरथ्य आचार्यो मेने ॥ २० ॥
आचार्यदेशीयान्तरमतेन समाधत्ते — उत्क्रमिष्यत एवंभावादित्यौडुलोमिः। जीवो हि परमात्मनोऽ- त्यन्तं भिन्न एव सन् देहेन्द्रियमनोबुद्ध्युपधानसम्पर्कत्संवदा कलुषस्तस्य च ज्ञानध्यानादिसाधनानुष्ठानात् सम्प्रसन्नस्य देहेन्द्रियादिसङ्घातादुत्क्रमिष्यतः परमात्मनैक्योपपत्तेरिदमभेदेनोपक्रमणम्। एतदुक्तं भवति—
भामती-व्याख्या
उसका उत्तर आचार्य आश्मरथ्य की दृष्टि से दिया जाता है— "प्रतिज्ञासिद्धेर्लिङ्गमाश्मरथ्यः"। जैसे अग्नि से निकलनेवाली अग्नि की विकारभूत चिनगारियां अग्नि से अत्यन्त भिन्न नहीं होतीं, क्योंकि वे भी अग्निरूप ही समझी जाती हैं। इसी प्रकार उन चिनगारियों को अग्नि से अत्यन्त अभिन्न भी नहीं कह सकते, क्योंकि 'अग्नेः विस्फुलिङ्गाः'—यहाँ पर 'अग्नि' पद और 'विस्फुलिङ्ग' पद का परस्पर जो व्यावर्य-व्यावर्तकभाव माना जाता है, वह अत्यन्त अभेद में नहीं बन सकेगा [ जैसे 'शङ्खस्य शुक्लता'— यहाँ पर 'शङ्ख' पद घट-पटादि द्रव्य का एवं 'शुक्लता' पद नीलादि गुणों का व्यावर्तक माना जाता है। वैसे ही 'अग्नेः विस्फुलिङ्गाः' इत्यादि-षष्ठ्यन्त-प्रयोग या उद्देश्य-विधेयभावस्थल पर प्रायः सर्वत्र परस्पर व्यावर्य- व्यावर्तकभाव माना जाता है ]। वैसे ही ब्रह्म के विकारभूत जीवात्मा भी ब्रह्म से न तो अत्यन्त भिन्न होते हैं और न अत्यन्त अभिन्न, क्योंकि एक ब्रह्म के विज्ञान से सभी जीवों का ज्ञान तभी हो सकता है, जब कि जीव और ब्रह्म का अभेद हो और 'आत्मायं द्रष्टव्यः' 'अहं ब्रह्म'—इत्यादि स्थलों पर जीवात्मा के उद्देश्य से द्रष्टव्यत्व या ब्रह्मत्व का विधान तभी हो सकता है, जब कि जीव और ब्रह्म का कुछ भेद भी हो। भेदाभेद-पक्ष में ही जीवरूपेण उपक्रम और एक के विज्ञान से सर्व-विज्ञान की प्रतिज्ञा ये दोनों प्रक्रियाएँ उपपन्न होती हैं—ऐसा आचार्य आश्मरथ्य मानते हैं ॥ २० ॥
आश्मरथ्य के द्वारा उद्भावित पूर्वपक्ष का समाधान आचार्य औडुलोमि के मत से किया जाता है— "उत्क्रमिष्यते एवंभावादित्यौडुलोमिः"। आचार्यवर औडुलोमि का कहना है कि जीव ब्रह्म से अत्यन्त भिन्न है और देह, इन्द्रिय, मन एवं बुद्धिरूप उपाधियों के सम्पर्क से सदैव कलुषित रहता आया है। ज्ञान-ध्यानादि साधनों के अनुष्ठान से विमल होकर देहेन्द्रियादि-संघात से उत्क्रमण करने पर जीव का ब्रह्म से ऐक्य स्थापित हो जाता है, इस भावी ऐक्य ( अभेद ) को ध्यान में रख कर जीव का उपक्रम किया गया है, अतः एक के विज्ञान से सर्व-विज्ञान का प्रतिपादन विरुद्ध नहीं। संसारावस्थाक भेद भी मोक्षावस्थाक
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