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भारतकोश
भामती (वाचस्पति मिश्र - ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य चतुःसूत्री हिन्दी व्याख्या)

भामती (वाचस्पति मिश्र - ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य चतुःसूत्री हिन्दी व्याख्या)

Bhamati of Vachaspati Mishra Hindi

वाचस्पति मिश्र (व्याख्याकार: स्वामी योगेन्द्रानन्द) द्वारा

स्रोत: Brahma Sutra Shankara Bhashya with Vachaspati Mishra Bhamati and Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished639 पृष्ठ

पृष्ठ 546, कुल 639 में से

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पृष्ठ 546

५२८ ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम् [ अ. १ पा. ४ सू. २६

कार्यस्य दृष्टः ॥ २५ ॥

आत्मकृतेः परिणामात् ॥ २६ ॥

इतश्च प्रकृतिर्ब्रह्म, यत्कारणं ब्रह्मप्रक्रियायाम् 'तदात्मानं स्वयमकुरुत' ( तै० २।७ ) इत्यात्मनः कर्मत्वं कर्तृत्वं च दर्शयति। आत्मानमिति कर्मत्वं, स्वयमकुरुतेति कर्तृत्वम्। कथं पुनः पूर्वसिद्धस्य सतः कर्तृत्वेन व्यवस्थितस्य क्रियमाणत्वं शक्यं सम्पादयितुम् ? परिणामादिति ब्रूमः । पूर्वसिद्धोऽपि हि सन्नात्मा विशेषेण विकारात्मना परिणमयामासात्मानमिति । विकारात्मना च परिणामो मृदाद्यासु प्रकृतिषूपलब्धः । स्वयमिति च विशेषणान्निमित्तान्तरानपेक्षत्वमपि प्रतीयते । परिणामादिति वा पृथक्सूत्रम् । तस्यैषोऽर्थः- इतश्च प्रकृतिर्ब्रह्म, यत्कारणं ब्रह्मण एव विकारात्मना

भामती

देव ॐ इति श्रुतिर्ब्रह्मणो जगदुपादानत्वमवधारयन्ती उपादानान्तराभावं साक्षादेव दर्शयतीति साक्षादिति सूत्रावयवेन दर्शितमिति योजना ।। २५ ।।

प्रकृतिग्रहणमुपलक्षणं निमित्तमित्यपि द्रष्टव्यं, कर्मत्वेनोपादानत्वात्कर्तृत्वेन च तत्प्रति निमित्तत्वात् । ॐ कथं पुनः इति ॐ । सिद्धसाध्ययोरेकत्रासमवायो विरोधादिति । ॐ परिणामादिति ब्रूमः इति ॐ । पूर्वसिद्धस्याप्यनिर्वचनीयविकारात्मना परिणामोऽनिर्वचनीयत्वाद्भेदैनाभिन्न इवेति सिद्धस्यापि साध्यत्वमित्यर्थः । एकवाक्यत्वेन व्याख्याय परिणामादित्यवच्छिद्य व्याचष्टे ॐ परिणामादिति वा इतिॐ ।

भामती-व्याख्या

का अनुवाद कर उसका अर्थ किया जाता है—"आकाशादेव" । 'आकाशादेव समुत्पद्यन्ते'—यह श्रुति ब्रह्म में जगत् की उपादानकारणता का अवधारण करती हुई अन्ययोग-व्यवच्छेदक एवकार के द्वारा आकाश ( ब्रह्म ) से भिन्न पदार्थ की उपादानता का जो निषेध करती है, वही निषेध सूत्रकार ने 'साक्षात्' पद से सूचित किया है। 'श्रुतिगतैवैकारसूचितमुपादानान्तराभावं साक्षादिति सूत्रावयवेन सूचयति सूत्रकारः'--ऐसी योजना कर लेनी चाहिए ।। २५ ।।

भाष्यकार ने जो कहा है—"इतश्च प्रकृतिर्ब्रह्म"। यहाँ पर 'प्रकृति' पद निमित्तकारण का भी उपलक्षक है, क्योंकि आगे चलकर भाष्यकार कहते हैं—"तदात्मानं स्वयमकुरुत "इत्यात्मनः कर्मत्वं कर्तृत्वं च दर्शयति" यहाँ 'कर्मत्व' हेतु उपादानता और 'कर्तृत्व' हेतु निमित्तकारणता का साधक है, अतः प्रतिज्ञा-वाक्य में भी दोनों कारणताओं का निर्देश होना चाहिये, अतः 'प्रकृति' पद को अजहत्स्वार्थ लक्षणा के द्वारा उभयविध कारणता का बोधक मानना आवश्यक है। "कथं पुनः पूर्वसिद्धस्य सतः कर्तृत्वेन व्यवस्थितस्य क्रियमाणत्वम्" इस शङ्का-भाष्य का आशय यह है कि श्रुति ने जो कहा है कि परमात्मा ने अपने-आपको सर्जन किया, वहाँ स्वकर्तृक और स्वकर्मक सर्जन क्रिया प्रतीत होती है, किन्तु किसी क्रिया के कर्तृत्व और कर्मत्व—दोनों एक पदार्थ में नहीं रह सकते, क्योंकि 'कर्तृत्व' धर्म सिद्ध और 'कर्मत्व' साध्य होता है, अतः दोनों धर्मों का परस्पर विरोध है। "परिणामादिति ब्रूमः"—इस समाधान-भाष्य का तात्पर्य यह है कि [ श्रुति ने स्वयं विरुद्ध धर्मों का एकत्र समावेश बताया है—'सच्च त्यच्चाभवत्' (तै० उ० २।६) । स्वप्न में स्वशिरश्छेदनादि के समान विरुद्धरूप से प्रतीयमान आरोपित धर्मों का कोई विरोध नहीं होता ] एक ही ब्रह्म सद्रूपेण सिद्ध (कर्ता) है और अनिर्वचनीय परिणामवत्त्वेन साध्य (कर्म) होता है। जैसे - अरजत में रजत का आरोप होता है, वैसे ही अभिन्न में भेद का आरोप ।

'आत्मकृतेः' और 'परिणामात्'—इन दोनों पदों की एकवाक्यता-पक्षीयव्याख्या करके 'परिणामात्'—इस पद को पृथक् करके उसकी व्याख्या की जाती है—"परिणामादिति