भारतकोश
भामती (वाचस्पति मिश्र - ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य चतुःसूत्री हिन्दी व्याख्या)

भामती (वाचस्पति मिश्र - ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य चतुःसूत्री हिन्दी व्याख्या)

Bhamati of Vachaspati Mishra Hindi

वाचस्पति मिश्र (व्याख्याकार: स्वामी योगेन्द्रानन्द) द्वारा

स्रोत: Brahma Sutra Shankara Bhashya with Vachaspati Mishra Bhamati and Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished639 पृष्ठ

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ब्रह्मैव जगदुपाद(नम् ] हिन्दीसहितभामतीसंवलितम् ५२९

परिणामः सामानाधिकरण्येनाम्नायते 'सच्च त्यच्चाभवत्। निरुक्तं चानिरुक्तं च' ( तै० २।६) इत्यादिनेति ॥ २६ ॥

योनिश्च हि गीयते ॥ २७ ॥

इतश्च प्रकृतिर्ब्रह्म, यत्कारणं ब्रह्म योनिरित्यपि पठ्यते वेदान्तेषु 'कर्तारमीशं पुरुषं ब्रह्मयोनिम्' (मुण्ड० ३।१।३) इति, 'यदभूतयोनिं परिपश्यन्ति धीराः (मुण्ड० १।१।६) इति च। योनिशब्दश्च प्रकृतिवचनः समधिगतो लोके-पृथिवी योनिरोषधि-वनस्पतीनाम्' इति। स्त्रीयोनेरप्यस्त्येवावयवद्वारेण गर्भं प्रत्युपादानकारणत्वम्। क्वचित्स्थानवचनोऽपि योनिशब्दो दृष्टः—'योनिष्ट इन्द्र निषदे अकारि' (ऋ० सं० १।१०४।१) इति। वाक्यशेषाच्चात्र प्रकृतिवचनता परिगृह्यते 'यथोर्णनाभिः सृजते गृह्णते च' (मु० १।१।७) इत्येवंजातीयकात्। एवं प्रकृतित्वं ब्रह्मणः प्रसिद्धम्। यत्पुन-रिदमुक्तमीक्षापूर्वकं कर्तृत्वं निमित्तकारणेष्वेव कुलालादिषु लोके दृष्टं नोपादानेष्वि-त्यादि, तत्प्रत्युच्यते— न लोकवदिह भवितव्यम्। न ह्ययमनुमानगम्योऽर्थः। शब्द-गम्यत्वाच्चस्यार्थस्य यथाशब्दमिह भवितव्यम्। शब्दश्चेक्षितुरीश्वरस्य प्रकृतित्वं प्रतिपादयतीत्यवोचाम। पुनश्चैतत्सर्वं विस्तरेण प्रतिवक्ष्यामः ॥ २७ ॥


भामती

सच्च त्यच्चेति द्वे ब्रह्मणो रूपे। सच्च सामान्यविशेषेणापरोक्षतया निर्वाच्यं पृथिव्यप्तेजोलक्षणम्। त्यच्च परोक्षमत एवानिर्वाच्यमिवन्त्या वाय्वाकाशलक्षणं, कथं च तद्ब्रह्मणो रूपं, यदि तस्य ब्रह्मोपादानं, तस्मात्परिणामाद् ब्रह्म भूतानां प्रकृतिरिति ॥ २६ ॥

पूर्वपक्षोक्तमनुमानमभावागमविरोधेन दूषयति ॐ यत्पुनः इति ॐ। एतदुक्तं भवति। ईश्वरो जगतो निमित्तकारणमेवेक्षापूर्वकजगत्कर्तृत्वात् कुम्भकर्तृकुलालवत्। अत्रेश्वरस्यासिद्धेराश्रयासिद्धो हेतुः पक्षाप्रसिद्धिविशेष्यः। यथाहूर्नानुपलब्धे न्यायः प्रवर्तत इति। आगमात्तत्सिद्धिरिति चेत्, हन्त तर्हि यादृशमीश्वरमागमो गमयति तादृशोऽभ्युपगन्तव्यः। स च निमित्तकारणं चोपादानकारणं चेश्वरमवगम-


भामती-व्याख्या

वा पृथक् सूत्रम्'। श्रुतिप्रतिपादित 'सत्' और 'त्यत्' दोनों ब्रह्म के रूप हैं। पृथिवीत्वादि विशेष जातियों के द्वारा अपरोक्षतया निरूपित पृथिवी, जल और तेज को सच्च कहा गया है और 'त्यत्' पद से परोक्ष, अत एव अनिर्वचनीय वायु और आकाश का ग्रहण किया गया हैं। 'सत्' और 'त्यत्' दोनों ब्रह्म के रूप क्योंकर कहे जा सकते हैं, यदि ब्रह्म 'सत्' और 'त्यत्' दोनों का उपादानकारण न हो। फलतः भूतरूपेण परिणत (विवर्तित) होने के कारण ब्रह्म भूत-वर्ग की प्रकृति (उपादानकारण) होता है ॥ २६ ॥

पूर्वपक्षोक्त निमित्तकारणत्वानुमान का अनुवाद करके निराकरण किया जाता है— "यत्पुनरिदमुक्तम्"। सारांश यह है कि— "ईश्वरो जगतो निमित्तकारणमेव, ईक्षापूर्वकजगत्क-र्तृत्वात्, कुम्भकर्तृकुलालवत्"—इस अनुमान में ईश्वर की असिद्धि होने के कारण आश्रया-सिद्धिरूप हेत्वाभास और अप्रसिद्धविशेष्यासिद्धिरूप पक्षाभास दोष है, क्योंकि जो ईश्वर हेतु का आश्रय और साध्य का विशेष्य है, वह सिद्ध ही नहीं। जैसा कि न्याय-भाष्यकार ने कहा है—"नानुपलब्धे न्यायः प्रवर्तते" (न्या. भा. पृ. ४)। "स ईक्षांचक्रे" इत्यादि आगम प्रमाण के द्वारा ईश्वर की सिद्धि क्यों नहीं? इस प्रश्न का उत्तर यह है कि यदि आगम को ईश्वर का साधक माना जाता है, तब आगम जैसे ईश्वर का गमक है, वैसा ईश्वर स्वीकार करना होगा। आगम तो स्पष्टरूप से ईश्वर को जगत् का निमित्तकारण और उपादानकारण

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