भारतकोश
भामती (वाचस्पति मिश्र - ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य चतुःसूत्री हिन्दी व्याख्या)

भामती (वाचस्पति मिश्र - ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य चतुःसूत्री हिन्दी व्याख्या)

Bhamati of Vachaspati Mishra Hindi

वाचस्पति मिश्र (व्याख्याकार: स्वामी योगेन्द्रानन्द) द्वारा

स्रोत: Brahma Sutra Shankara Bhashya with Vachaspati Mishra Bhamati and Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished639 पृष्ठ

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पृष्ठ 548

५३० · ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम् [ अ. १ पा. ४ सू. २८

( ८ सर्वव्याख्यानाधिकरणम् । सू. २८ )

एतेन सर्वे व्याख्याता व्याख्याताः ॥ २८ ॥

'ईक्षतेर्नाशब्दम्' ( ब्र० सू० १।१।५ ) इत्यारभ्य प्रधानकारणवादः सूत्रैरेव पुनः पुनराशङ्क्य निराकृतः, तस्य हि पक्षस्योपोद्बलकानि कानिचिल्लिङ्गाभासानि वेदान्तेष्वापातेन मन्दमतीन्प्रतिभान्तीति । स च कार्यकारणानन्यत्वाभ्युपगमात्प्रत्यासन्नो

भामती

तीति । विशेष्याधयग्राह्यागमविरोधान्नानुमानमुदेतुमर्हतीति, इति कुतस्तेन निमित्तत्वावधारणेत्यर्थः । इयं चोपादानपरिणामाविभाषा न विकाराभिप्रायेणापि तु यथा सर्पस्योपादानं रज्जुरेवं ब्रह्म जगदुपादानं द्रष्टव्यम् । न खलु नित्यस्य निष्कलस्य ब्रह्मणः सर्वात्मनैकदेशेन वा परिणामः सम्भवति नित्यत्वादेकदेशत्वादित्युकम् । न च मृदः शरावादयो भिद्यन्ते न वाभिन्ना न वा भिन्नाभिन्नाः किन्त्वनिर्वचनीया एव । यथाह श्रुतिः “मृत्तिकेत्येव सत्यम्” इति । तस्मादद्वैतोपक्रमादुपसंहाराच्च सर्व एव वेदान्ता ऐकान्तिकाद्वैतपरः सन्तः साक्षादेव क्वचिदद्वैतमाहुः, क्वचिद् द्वैतनिषेधेन, क्वचिद् ब्रह्मोपादानत्वेन जगतः । एतावतापि तावद्भेबो निषिद्धो भवति, न तूपादानत्वाभिधानमात्रेण विकारग्रह आस्थेयः । नहि वाक्यैकदेशस्यार्थोऽस्तीति ॥ २७ ॥

स्यादेतत्—मा भूत्प्रधानं जगदुपादानं तथापि न ब्रह्मोपादानत्वं सिध्यति, परमाण्वादीनामपि तदुपादानानामुपप्लवमानत्वात्तेषामपि हि किञ्चित् किञ्चिदुपोद्बलकमस्ति वैदिकं लिङ्गमित्याशङ्कामपनेतुमाह सूत्रकारः—एतेन सर्वे व्याख्याता व्याख्याताः निगदव्याख्यातेन भाष्येण व्याख्यातं सूत्रम् ।

भामती-व्याख्या

कहता है। साध्य के विशेष्य और हेतु के आश्रयभूत ईश्वर के ग्राहक आगम से विरुद्ध केवल निमित्तकारणता का अनुमान कभी नहीं पनप सकता, अतः उस अनुमान के द्वारा निमित्त-कारणता का अवधारण क्योंकर किया जा सकता है ? ईश्वर के लिए 'उपादान' और जगत् के लिए जो 'परिणाम' की भाषा का प्रयोग किया गया है, वह विकार-विकारिभाव को दृष्टि में रख कर नहीं, अपितु जैसे आरोपित सर्प की उपादानकारण रज्जु कही जाती है, वैसे ही ब्रह्म को जगत् का उपादान कहा गया है, क्योंकि कूटस्थ नित्य और निष्कल ब्रह्म का न सर्वात्मना और न एकदेशेन परिणाम बन सकता है—यह विगत पृ० १३७ पर कहा जा चुका है। मृत्तिकादि से घट-शरावादि कार्य न तो भिन्न हैं, न अभिन्न और न भिन्नाभिन्न, किन्तु अनिर्वचनीय हैं; जैसा कि श्रुति कहती है—'मृत्तिकेत्येव सत्यम्'। फलतः कथित श्रुति-सन्दर्भ में अद्वैत-तत्त्व का उपक्रम और उपसंहार सिद्ध कर रहा है कि सभी वेदान्त-वाक्य ऐकान्तिकरूप से अद्वैतपरक होते हुए कहीं साक्षात् अद्वैत का प्रतिपादन करते हैं, कहीं द्वैत का निषेध और कहीं ब्रह्मोपादानत्वेन जगत् का अभिधान करके अद्वैतावबोधन करते हैं। इससे भी भेद का निषेध हो ही जाता है, उपादानत्व का प्रतिपादनमात्र कर देने से विकार-ग्रह स्वीकार नहीं कर लेना चाहिए, क्योंकि अधूरे वाक्य का अर्थ पर्यवसित अर्थ नहीं माना जाता ॥ २७ ॥

शङ्का—यदि सांख्याभिमत प्रधान तत्त्व जगत् का उपादानकारण नहीं हो सकता तो न सही, फिर भी ब्रह्म में जगत् की उपादानता सिद्ध नहीं हो सकती, क्योंकि तार्किकादि-सम्मत परमाण्वादि पदार्थ भी जगत् के उपादानकारण माने जाते हैं। उनके भी साधक वैदिक वाक्य इक्के-दुक्के उपलब्ध हो ही जाते हैं।

समाधान—उक्त शङ्का का अपनयन करते हुए सूत्रकार ने कहा है—"एतेन सर्वे व्याख्याता व्याख्याता।" इस सूत्र का भाष्य अत्यन्त सुगम है।