भारतकोश
भामती (वाचस्पति मिश्र - ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य चतुःसूत्री हिन्दी व्याख्या)

भामती (वाचस्पति मिश्र - ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य चतुःसूत्री हिन्दी व्याख्या)

Bhamati of Vachaspati Mishra Hindi

वाचस्पति मिश्र (व्याख्याकार: स्वामी योगेन्द्रानन्द) द्वारा

स्रोत: Brahma Sutra Shankara Bhashya with Vachaspati Mishra Bhamati and Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished639 पृष्ठ

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५२०ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम्[ अ. १ पा. ४ सू. २२

क्षेत्रज्ञपरमात्मैकत्वविषये सम्यग्दर्शने क्षेत्रज्ञः परमात्मेति नाममात्रभेदात्, क्षेत्रज्ञोऽयं परमात्मनो भिन्नः परमात्माऽयं क्षेत्रज्ञाद्भिन्न इत्येवंजातीयक आत्मभेदविषयो निर्बन्धो निरर्थकः। एको ह्ययमात्मा नाममात्रभेदेन बहुधाभिधीयत इति। नहि 'सत्यं ज्ञान-

भामती

चेकान्तिकाद्वैतप्रतिपादनपराः पौर्वापर्यालोचनया सर्वे वेदान्ताः प्रतीयन्ते। तत्र यथा बिम्बवदवदातान्तः- स्विके प्रतिबिम्बानामभेदेऽपि नीलमणिकृपाणकाचाद्युपधानभेदात् काल्पनिकौ जीवानां भेदो बुद्धिशब्दव्यपदेश- भेदौ वर्तयतः-इदं बिम्बमवदातमभिमानि च प्रतिबिम्बानि नीलोत्पलपलाशश्यामनानि वृत्तदीर्घादिभेदभाञ्जि बहूनीति, एवं परमात्मनः शुद्धस्वभावाज्जीवानामभेव ऐकान्तिकेऽप्यनिर्वचनीयानाद्यविद्योपधानभेदात् काल्पनिकौ जीवानां भेदो बुद्धिव्यपदेशभेदावयं च परमात्मा विशुद्धविज्ञानानन्दस्वभावः, इमे च जीवा अविद्याशोकदुःखाद्युपद्रवभाज इति वर्तयति। अविद्योपधानं च यद्यपि विद्यास्वभावे परमात्मनि न साक्षा- दस्ति, तथापि तत्प्रतिबिम्बकल्पजीवद्वारेण परस्मिन्नुच्यते। न चैवमन्योन्याश्रयो जीवविभागाश्रयाविद्या, अविद्याश्रयश्च जीवविभाग इति, बीजाङ्कुरवदनादित्वात्। अत एव कामुद्दिश्यैष ईश्वरो मायामारचयत्य- नर्थकामुद्देश्यानां सर्गादौ जीवानामभावात्, कथं चात्मानं संसारिणं विविधवेदनाभाजं कुर्यादित्याद्यनुयोगो निरवकाशः। न खल्वादिमान् संसारो नाप्यादिमानविद्याजीवविभागो येनानुयुज्येतेति। अत्र च नाम- ग्रहणेनाविद्यामुपलक्षयति। स्यादेतत्-यदि न जीवाद् ब्रह्म भिद्यते हन्त जीवः स्फुट इति ब्रह्मापि तथा स्यात्तथा च निहितं गुहायामिति नोपपद्यत इत्यत आह ॐ नहि सत्यम् इति ॐ। यथा हि बिम्बस्य मणि-

भामती-व्याख्या

आलोचना से पर्यवसित होता है। वहाँ जैसे शुभ्र बिम्ब से प्रतिबिम्ब का अभेद होने पर भी नीलमणि, कृपाण काचादि उपाधियों के भेद से बिम्ब और प्रतिबिम्ब का काल्पनिक भेद जीवों की दृष्टि में ज्ञान और शब्द का भेद उत्पन्न कर देता है—'इदं 'बिम्बमवदातम्', 'इमानि प्रतिबिम्बानि' नीलोत्पलपलाशश्यामनानि वृत्तदीर्घादिभेदभाञ्जि बहूनि'। वैसे ही शुद्ध-स्वरूपवाले परमात्मा से जीवों का ऐकान्तिक अभेद होने पर भी अनिर्वचनीय अनादि अविद्या-रूप उपाधि के भेद से जीवों का काल्पनिक भेद ही उनके शब्दों और ज्ञानों का भेद उत्पन्न कर देता है—'अयं परमात्मा विशुद्धविज्ञानानन्दस्वभावः', 'इमे जीवा अविद्याशोकदुःखाद्युपद्रवभाजः'। यद्यपि अविद्यारूप उपाधि विद्यात्मक ब्रह्म में साक्षात् नहीं है, तथापि उस के प्रतिबिम्बभूत जीवों के माध्यम से ब्रह्म में उपचरित है। जीवों को अविद्या का आश्रय मानने पर 'जीवविभागाश्रयाऽविद्या, अविद्याश्रयश्च जीवविभागः'—इस प्रकार का अन्योन्याश्रयत्व क्यों नहीं? इस प्रश्न का उत्तर है—'बीजाङ्कुरवदनादित्वात्'। (१) सृष्टि के आरम्भ में जीवों की सत्ता न होने के कारण किसके उद्देश्य से ईश्वर माया की रचना करता है? एवं ईश्वर अपने को संसारी और विविध वेदनाओं का आश्रय क्योंकर बनाता है? इत्यादि प्रश्न भी अत एव निराधार हो जाते हैं कि न तो यह संसार अनादिमान् (सादि) है, और न अविद्या एवं जीव का विभाग ही आदिमान् है कि यह सादितामूलक आक्षेप हो जाता। "नाममात्रभेदात्"—इस भाष्य-वाक्य में "नाम' पद अविद्या का उपलक्षक है, अतः जीव और ब्रह्म में आविद्यक या अवस्तुभूत भेद का लाभ होता है।

यदि जीव ब्रह्म से भिन्न नहीं, तब जैसे जीव सभी व्यक्तियों को स्पष्ट अनुभव में आता है, वैसे ही ब्रह्म स्फुट क्यों नहीं? यदि ब्रह्म भी स्पष्ट अनुभव-गम्य है, तब उसके लिए "निहितं गुहायाम्" (तै० उ० २।१) ऐसा कहना उचित कैसे होगा इस प्रश्न का उत्तर है—"न हि 'सत्यं ज्ञानमनन्तं ब्रह्म' इत्यादि"। जैसे एक बिम्ब की मणि, कृपाणादि अनेक गुहाएँ होती हैं, वैसे ही एक ब्रह्म की जीवों के भेद से अनेक यविद्यारूप गुहाएँ हैं। जैसे प्रतिबिम्ब

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