भारतकोश
भामती (वाचस्पति मिश्र - ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य चतुःसूत्री हिन्दी व्याख्या)

भामती (वाचस्पति मिश्र - ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य चतुःसूत्री हिन्दी व्याख्या)

Bhamati of Vachaspati Mishra Hindi

वाचस्पति मिश्र (व्याख्याकार: स्वामी योगेन्द्रानन्द) द्वारा

स्रोत: Brahma Sutra Shankara Bhashya with Vachaspati Mishra Bhamati and Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished639 पृष्ठ

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५२२ ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम् [ अ. १ पा. ४ सू. २२


भामती

ये तु काशकृत्स्नीयमेव मतमाश्रित्य जीवं परमात्मनोऽंशमाचक्ष्वतेषां कथं 'निष्कलं निष्क्रियं शान्तम्' इति न श्रुतिविरोधः ? निष्कलमिति सावयवत्वं व्यासेधति, न तु सांशत्वम् । अंशश्च जीवः परमा-त्मनो नभस इव कर्णनेमिमण्डलावच्छिन्नं नभः शब्दश्रवणयोग्यं वायोरिव च शरीरावच्छिन्नः पञ्चवृत्तिः प्राण इति चेत्, न तावन्नभो नभसोऽंशस्तस्य तत्त्वात् । कर्णनेमिमण्डलावच्छिन्नमंश इति चेत्, हन्त तर्हि प्राप्ताप्राप्तविवेकेन कर्णनेमिमण्डलं वा तत्संयोगो वेत्युक्तं भवति । न च कर्णनेमिमण्डलं तस्यांशस्तस्य ततो भेदात् । तत्संयोगो नभोधर्मत्वात्तस्यांश इति चेत्, न, अनुपपत्तेः । नभोधर्मत्वे हि तदनवयवं सर्वत्राभिन्नमिति तत्संयोगः सर्वत्र प्रथेत । नह्यस्ति सम्भवोऽनवयवमभ्याप्य वर्त्तत इति । तस्मात्तन्नास्ति चेद्व्याप्यैव, न चेद्व्याप्नोति तन्न नास्त्येव । व्याप्यैवास्ति केवलं प्रतिसम्बन्ध्यधीननिरूपणतया न सर्वत्र निरूप्यत इति चेत्, न नाम निरूप्यताम् । तत्संयुक्तं तु नभः श्रवणयोग्यं सर्वत्रास्तीति सर्वत्र श्रवण-


भामती-व्याख्या

यथा पटस्यांशोऽवयवस्तन्तुरिति । अस्ति च द्रव्यविभागवचनो यथा परिषदद्रव्ये अंशिनो वयमिहेति । तयोरिह ग्रहणं न भवति, किन्तूपाध्यवच्छिन्नास्यानन्यभूतस्य वाचकोऽयं शब्दः प्रयुक्तो यथाग्नेर्विस्फुलिङ्गस्य । कथं पुनर्निग्वयवस्य परमात्मनोऽंशः सम्भवति ? आगमात् तावदवगम्यते—"यथाग्नेः क्षुद्रा विस्फुलिङ्गाः", यथा चाकाशस्य पार्थिवाधिष्ठानावच्छिन्नं कर्णच्छिद्रं च, यथा च वायोः पञ्चवृत्तिः प्राणः, यथा च मनसः कामादयो वृत्तयः । स च भिन्नाभिन्नस्वरूपः, अभिन्नरूपं स्वाभाविकम्, औपाधिकं तु भिन्नरूपम्, उपाधीनां च बलवत्त्वात्" ( ब्र० सू० भास्कर० पृ० १४१ ) ] ।

ऐसे लोगों से पूछा जा सकता है कि "निष्कलं निष्क्रियं शान्तं निरवद्यं निरञ्जनम्" ( श्वेता० ६।१९ ) इस श्रुति से उनका मत विरुद्ध क्यों नहीं ?

शङ्का — श्रुतिगत 'निष्कलम्' पद सावयवत्व का निषेध करता है, सांशत्व का नहीं । जीव परमात्मा का वैसे ही अंश है, जैसे महाकाश का कर्ण-नेमिमण्डल से अवच्छिन्न श्रोत्ररूप आकाश अथवा जैसे महावायु का शरीरावच्छिन्न प्राणादि पञ्चविध व्यापार से युक्त प्राण ।

समाधान — दृष्टान्त और दार्ष्टान्त का वैषम्य है, क्योंकि श्रोत्ररूप आकाश महाकाश का अंश नहीं । प्राप्ताप्राप्त-न्याय के आधार पर आकाश की अंशता किसमें पर्यवसित होती है ? इस प्रश्न का यदि उत्तर खोजा जाय, तब वहाँ या सर्वत्र अवच्छेदकावच्छिन्न-स्थल पर तीन पदार्थ प्रतीत होते हैं—(१) अवच्छेद्य, (२) अवच्छेदक और (३) अवच्छेदक का अवच्छेद्य के साथ सम्बन्ध । प्रकृत में आकाश ही अवच्छेद्य है, वह तो स्वयं अपना अंश हो नहीं सकता, क्योंकि वही अंशी है । कर्ण-नेमि-मण्डलरूप अवच्छेदक भी आकाश का अंश नहीं, क्योंकि वह पार्थिव होने के कारण आकाश से भिन्न और विजातीय है । आकाश के साथ जो कर्ण-नेमि-मण्डल का संयोग है, वह आकाश के समान ही व्यापक ही मानना होगा, क्योंकि आकाश निरवयव है, अतः उसका संयोग किञ्चिदवयवावच्छेदेन या अव्याप्यवृत्ति नहीं हो सकता । फलतः सर्वत्र शब्दोपलब्धि होनी चाहिए : निरवयव-संयोग कभी अव्याप्यवृत्ति नहीं हो सकता, अतः आकाश के साथ यदि कर्ण-नेमि-मण्डल का संयोग है, तब वह व्याप्यवृत्ति ही रहेगा । यदि वह सभी देश को व्याप्त नहीं कर सकता, तब वह है ही नहीं । यदि कहा जाय कि यद्यपि यह सर्वत्र है किन्तु संयोग सदैव अपने प्रतियोगी से निरूपणीय है, प्रतियोगी के सर्वत्र न होने के कारण सर्वत्र निरूपित नहीं हो सकता । तो वैसा नहीं कह सकते, क्योंकि उस संयोग का निरूपण भले ही न हो, स्वरूपतः तो सर्वत्र विद्यमान है, अतः श्रवण-योग्यता के सर्वत्र होने से सर्वत्र शब्द-श्रवण होना चाहिए ।