भामती (वाचस्पति मिश्र - ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य चतुःसूत्री हिन्दी व्याख्या)
Bhamati of Vachaspati Mishra Hindi
वाचस्पति मिश्र (व्याख्याकार: स्वामी योगेन्द्रानन्द) द्वारा
स्रोत: Brahma Sutra Shankara Bhashya with Vachaspati Mishra Bhamati and Hindi Commentary (उद्गम)
पृष्ठ 541, कुल 639 में से
संदर्भ में पढ़ेंद्रष्टव्यत्वेन ब्रह्मनिर्देश ] हिन्दीसहितभामतीसंवलितम् ५२३
भामती
प्रसङ्गः । न च भेदाभेदयोरन्यतरेणांशः शक्यो निर्वक्तुम् । न चोभाभ्यां, विरुद्धयोरेकत्रासमवायादित्युकम् । तस्मादनिर्वचनीयानाद्यविद्यापरिकल्पित एवांशो नभसो न भाविक इति युक्तम् । न च काल्पनिको ज्ञानमात्रायतजीवितः कथमविज्ञायमानोऽस्ति, असंश्रांशः कथं शब्दश्रवणलक्षणाय कार्याय कल्पते ? न जातु रज्जुवामज्ञायमान उरगो भयकम्पादिकार्याय पर्याप्त इति वाच्यम्, अज्ञातत्वासिद्धेः । कार्यव्यङ्ग्यत्वादस्य । कार्योत्पादात् पूर्वमज्ञातं कथं कार्योत्पादाङ्गमिवि चेत्, न, पूर्वपूर्वकल्पोत्पादव्यङ्ग्यत्वादसत्यपि ज्ञाने तत्संस्कारानुवृत्तेरनादित्वाच्च कल्पनातत्संस्कारप्रवाहस्य । अस्तु वानुपपत्तिरेव कार्यकारणयोर्मायात्मकत्वात् । अनुपपत्तिर्हि मायामुपोद्वलयति । अनुपपद्यमानार्थत्वान्मायायाः । अपि च भाविकांशवादिनां मते भाविकांशस्य ज्ञानेनोच्छेत्तुमशक्यत्वान्न ज्ञानध्यानसाधनो मोक्षः स्यात् तदेवमाकाशांश इव श्रोत्रमनिर्वचनीयम् । एवं जीवो ब्रह्मणोऽश इति काशकृत्स्नीयं मतमिति सिद्धम् ॥ २२ ॥
स्यादेतद् — वेदान्तानां ब्रह्मणि समन्वये दर्शिते समाप्तं समन्वय लक्षणमिति किमपरमवशिष्यते
भामती-व्याख्या
अंश अपने अंशी से भिन्न है ? या अभिन्न ? अथवा भिन्नाभिन्न ? इनमें से किसी प्रश्न का भी समुचित उत्तर नहीं बनता—यह विगत पृ० १३६ पर भी विस्तारपूर्वक कहा जा चुका है, फलतः अनिर्वचनीय अनादि अविद्या के द्वारा आकाशादि निरंश पदार्थों के अंश परिकल्पित मात्र होते हैं, वास्तविक नहीं—ऐसा मानना ही युक्ति-युक्त है । काल्पनिक पदार्थ ज्ञानैकस्वरूप होते हैं, कभी अज्ञातमान स्वरूप सत् नहीं होते । असद्भूत अंश व्यावहारिक शब्दादि-श्रवण के योग्य क्योंकर होगा ? रज्जु में कल्पित अज्ञातमान सर्प व्यावहारिक भय एवं कम्पादि का जनक क्योंकर होता है ? इस प्रश्न का उत्तर यह है कि वह अज्ञातमान नहीं, अपि तु ज्ञायमान ही होता है, क्योंकि भय-कम्पादि कार्य ही उसकी ज्ञायमानता के व्यञ्जक होते हैं । यद्यपि वर्तमान कार्य की उत्पत्ति पूर्वतन सर्पादि की ज्ञातता का कल्पक नहीं, तथापि पूर्व-पूर्व कार्यों की उत्पत्ति के द्वारा उसमें ज्ञातत्व की अभिव्यक्ति हो जाती है । यद्यपि वृत्त्यात्मक ज्ञान विनश्वर है, तथापि उसके संस्कार अनुवृत्त रहते हैं, अतः ज्ञान अपने संस्कारों के माध्यम से अनुवृत्त रह कर अपने कल्पित पदार्थ में ज्ञातत्व ध्वनित कर देता है । संस्कारों की सत्ता पूर्व-पूर्व अनुमान के आधार पर होती है, कल्पना और संस्कारों का साध्य-साधनभाव बीज-वृक्ष के समान अनादि माना जाता है, अतः अनवस्थादि दोष प्रसक्त नहीं होते । काल्पनिक कारण से कार्य की उपपत्ति यदि नहीं हो सकती, तब अनुपपत्ति ही सही । मायिक वस्तु के लिए अनुपपत्ति कोई दोष नहीं, क्योंकि आचार्य मण्डन मिश्र कहते हैं—"न हि मायायां काचिदनुपपत्तिः, अनुपपद्यमानार्थैव हि माया" ( ब्र० सि० पृ० १० ) । दूसरी बात यह भी है कि जो लोग अंश को भाविक ( वास्तविक ) मानते हैं, वास्तविक पदार्थ का ज्ञान से उच्छेद हो नहीं सकता, अतः ज्ञान-ध्यानादि से बन्धन की निवृत्ति और मोक्ष की प्राप्ति क्योंकर होगी ? अतः जैसे श्रोत्ररूप आकाश का अंश अनिर्वचनीय है, वैसे ही जीव भी ब्रह्म का अंश है—ऐसा आचार्य काशकृत्स्न का मत स्थिर होता है ॥ २२ ॥
सङ्गति—ब्रह्म में विविध वेदान्त-वाक्यों का समन्वय दिखाया गया । इतने मात्र से इस समन्वयाध्याय का उद्देश्य पूरा हो जाता है, अब और क्या शेष रह गया कि जिसके लिए इस अधिकरण की रचना की गई ? इस शङ्का का निराकरण करने के लिए भाष्यकार