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भारतकोश
भामती (वाचस्पति मिश्र - ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य चतुःसूत्री हिन्दी व्याख्या)

भामती (वाचस्पति मिश्र - ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य चतुःसूत्री हिन्दी व्याख्या)

Bhamati of Vachaspati Mishra Hindi

वाचस्पति मिश्र (व्याख्याकार: स्वामी योगेन्द्रानन्द) द्वारा

स्रोत: Brahma Sutra Shankara Bhashya with Vachaspati Mishra Bhamati and Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished639 पृष्ठ

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पृष्ठ 605

कार्यकारणयोरभेदः ] हिन्दीसहितभामतीसंवलितम् ५८७

मात्रं चेत्यनुमेयम् ( छा० ४।६।४ ) । ततः परं ब्रह्मैकमेवाद्वितीयं, तत्र सर्वप्रमाणानां निष्ठामवोचाम ॥ १५ ॥

सत्त्वाच्चावरस्य ॥ १६ ॥

इतश्च कारणात्कार्यस्यानन्यत्वं, यत्कारणं प्रागुत्पत्तेः कारणात्मनैव कारणे सत्त्वमवरकालीनस्य कार्यस्य श्रूयते— 'सदेव सोम्येदमग्र आसीत्' ( छा० ६।२।१ ), 'आत्मा वा इदमेक एवाग्र आसीत्' ( ऐ० आ० २।४।१।१ ) इत्यादाविदंशब्दगृहीतस्य कार्यस्य कारणेन सामानाधिकरण्यात् । यच्च यदात्मना यन्न वर्तते न तत्तत उत्पद्यते,

भामती

धवखदिरपलाशादयो बहवोऽपि वनमिति । अर्थक्रियायाञ्च प्रत्येकमसमर्था अप्यनारभ्यैवार्थान्तरं किञ्चि-न्मिलिताः कुर्वन्तो दृश्यन्ते, यथा ग्रावाण उखाधारणमेकम्, एवमनारभ्यैवार्थान्तरं तन्तवो मिलिताः प्रावरणमेकं करिष्यन्ति । न च समवायाद्द्वयोरपि भेदानवसायः इति साम्प्रतम्, अन्यो-न्याश्रयत्वात् — भेदे हि सिद्धे समवायः समवायाच्च भेदः । न च भेदे साधनान्तरमस्ति, अर्थक्रियाव्यप-देशभेदयोरभेदेऽप्युपपत्तेरित्यपपादितम् । तस्माद्यत्किञ्चिदेतत् । अनया च विशा मूलकारणं ब्रह्मैव परमा-र्थसद्ववान्तरकारणानि च तन्त्वादयः सर्वेऽनिर्वच्या एवेत्याह ॐ तथा तन्तुषु इति ॐ ॥ १५ ॥

विभजते ॐ इतश्च इति ॐ । न केवलं श्रुतिः, उपपत्तिश्चात्र भवति ॐ यच्च यदात्मना इति ॐ । नहि तैलं सिकतात्मना सिकतायामस्ति, यथा घटोऽस्ति मृदि मृदात्मना । प्रत्युत्पन्नो हि घटो मृदात्मनो-

भामती-व्याख्या

( प्रयोजन ) का निष्पादन करते हैं, जैसे कि धव, खदिर और पलाशादि अनेक वृक्षों में ही 'वनम्'—इस प्रकार एकत्व-व्यवहार उनकी अवच्छेदकीभूत एक देश-कालरूप उपाधि को लेकर हो जाता है, वैसे ही अनेक तन्तुओं में प्रावरणरूप एक अर्थक्रिया की अपेक्षा 'अयमेकः पटः'—ऐसा व्यवहार माना जाता है। यद्यपि प्रत्येक तन्तु प्रावरणरूप प्रयोजन की सिद्धि में सक्षम नहीं होता, तथापि अनेक मिले हुए तन्तु पटादिरूप कार्यान्तर को उत्पन्न किए बिना ही प्रावरणरूप कार्य का सम्पादन वैसे ही कर लेंगे, जैसे कि अनेक पत्थर मिलकर ( चूल्हे का रूप धारण कर ) उखा ( हाँडी या बटलोई ) को धारण करते हैं। 'यद्यपि तन्तुओं से पट भिन्न है, तथापि दोनों के मध्य में समवाय होने के कारण भेद का भान नहीं हो पाता'—ऐसा मानने पर अन्योन्याश्रय दोष प्रसक्त होता है, क्योंकि कार्य और कारण में भेद सिद्ध होने पर समवाय सम्बन्ध सिद्ध होगा और समवाय सिद्ध होने पर भेद। कार्य और कारण के भेद-साधन में अन्य कोई हेतु सम्भव नहीं। 'तन्तु को कोई सुई में डाल कर सिलाई के काम में लाते हैं, पट को नहीं और पट ओढ़ने-बिछाने के काम आता है, तन्तु नहीं'—इस प्रकार का अर्थक्रिया-भेद एवं 'इमे तन्तवः', 'अयं पटः' —इस प्रकार का व्यपदेश-भेद ( विशेष शब्दों का प्रयोग ) भी तन्तु और पट का भेद सिद्ध नहीं कर सकता, क्योंकि एक ही वस्तु उपाधि-विशेष से उपहित होकर भिन्न-भिन्न कार्यों का सम्पादन करती है—यह कहा जा चुका है। [ सांख्यतत्त्वकौमुदी में भी कहा है—"स्वात्मनि क्रियानिरोधबुद्धिव्यपदेशार्थक्रियाभेदाश्च नैकान्तिकं भेदं साधयितुमर्हन्ति, एकस्मिन्नपि तत्तद्विशेषाविर्भावतिरोभावाभ्यामेतेषाम-विरोधात्" ( सां. त. कौ. का. ९ ) ]। इस विचार के द्वारा यह सिद्ध होता है कि मूल कारण एक ब्रह्म वस्तुसत् है, तन्त्वादिरूप सभी अवान्तर कारण अनिर्वचनीय हैं—"तथा तन्तुषु अंशवोंऽशुषु तदवयवाः" ॥ १५ ॥

"सत्त्वाच्चावरस्य"—इस सूत्र की व्याख्या की जाती है—"इतश्च कारणात् कार्यस्यान-न्यत्वम्" । केवल श्रुति अनन्यत्व की साधिका नहीं, अपितु युक्ति भी है—"यच्च यदात्मना यत्र