भामती (वाचस्पति मिश्र - ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य चतुःसूत्री हिन्दी व्याख्या)
Bhamati of Vachaspati Mishra Hindi
वाचस्पति मिश्र (व्याख्याकार: स्वामी योगेन्द्रानन्द) द्वारा
स्रोत: Brahma Sutra Shankara Bhashya with Vachaspati Mishra Bhamati and Hindi Commentary (उद्गम)
पृष्ठ 633, कुल 639 में से
संदर्भ में पढ़ेंअनादिः संसारः ] हिन्दीसहितभामतीसंवलितम् ६१५
'सदेव सोम्येदमग्र आसीदेकमेवाद्वितीयम्' (छा० ६।२।१) इति प्राक्सृष्टेर्- विभागावधारणान्नास्ति कर्म, यदपेक्ष्य विषमा सृष्टिः स्यात् । सृष्ट्युत्तरकालं हि शरीरादिविभागापेक्षं कर्म, कर्मापेक्षश्च शरीरादिविभाग इतीतरेतराश्रयत्वं प्रसज्येत । अतो विभागादूर्ध्वं कर्मापेक्ष ईश्वरः प्रवर्त्ततां नाम । प्राग्विभागाद्वैचित्र्यनिमित्तस्य कर्मणोऽभावात्तुल्यैवाद्या सृष्टिः प्राप्नोतीति चेत्, नैष दोषः, अनादित्वात्संसारस्य । भवेदेव दोषो यद्यादिमान् संसारः स्यात् । अनादौ तु संसारे बीजाङ्कुरवद्धेतुहेतुमद्भावेन कर्मणः सर्गवैषम्यस्य च प्रवृत्तिर्न विरुध्यते ॥ ३५ ॥ कथं पुनरवगम्यतेऽनादिरेष संसार इति ? अत उत्तरं पठति - उपपद्यते चाप्युपलभ्यते च ॥ ३६ ॥ उपपद्यते च संसारस्यानादित्वम् । आदिमत्त्वे हि संसारस्याकस्मादुद्भूतेर्मुक्ता- नामपि पुनः संसारोद्भूतिप्रसङ्गः, अकृताभ्यागमप्रसङ्गश्च, सुखदुःखादिवैषम्यस्य निर्निमित्तत्वात् । न चेश्वरो वैषम्यहेतुरित्युक्तम् । न चाविद्या केवला वैषम्यस्य कार-
भामती
तार्थेन भाष्यग्रन्थेन व्याख्याते ॥ ३५ ॥ अनादित्वादिति सिद्धवदुक्तं तत्साधनार्थं सूत्रम् - "उपपद्यते चाप्युपलभ्यते च" ॥ ३६ ॥ अकृते कर्माणि पुण्ये पापे वा तत्फलं भोक्तारमध्यागच्छेत् तथा च विधिनिषेधशास्त्रमनर्थकं भवेत् प्रवृत्तिनिवृत्त्यभावादिति मोक्षशास्त्रस्य चोक्तमानर्थक्यम् । न चाविद्या केवलेति लयाभिप्रायम् । विक्षेप- लक्षणाविद्यासंस्कारस्तु कार्यत्वात् स्वोत्पत्तौ पूर्वं विक्षेपमपेक्षते, विक्षेपश्च मिथ्याप्रत्ययो मोहापरनामा
भामती-व्याख्या
पर शङ्का उठाई गई कि द्वितीयादि सृष्टियों में पूर्व कर्म-जन्यत्व सम्भव होने पर भी प्रथम सृष्टि में कर्म-प्रयुक्तत्व क्योंकर सम्भावित होगा ? क्योंकि "सदेव सोम्येदमग्र आसीत्" (छा० ६।२।१) यह श्रुति प्रथम सृष्टि से पूर्व कर्त्ता, कर्म और करणादि-विभाग का निषेध करती है। इस शङ्का का समाधान है - "अनादित्वात्" । अर्थात् संसार अनादि है, इसकी कभी आदि (प्रथम) सृष्टि मानी ही नहीं जाती, अतः पूर्व-पूर्व कर्मों के आधार पर उत्तरोत्तर सृष्टि का उच्चावचभाव सम्पन्न हो जाता है ॥ ३५ ॥ 'अनादित्व' हेतु को सिद्ध समझ कर उद्धृत कर दिया गया, वस्तुतः वह सिद्ध नहीं किया गया, अतः उसकी सिद्धि करने के लिए कहा गया है - "उपपद्यते चाप्युपलभ्यते च"। यदि संसार को अनादि न मानकर आदिमान् माना जाता है, तब प्रथम सृष्टि के पहले पुण्य- पापादि रूप कर्मों के न रहने पर इस जन्म में जीव को सुख-दुःखादि रूप फल का लाभ जो मिलता है, वह अकृताभ्यागम (कर्म किए बिना ही फल की प्राप्ति) है। कर्म किए बिना ही जब उनका फल मिल जाता है, तब विधि-निषेधात्मक शास्त्र निरर्थक और अप्रमाण हो जाते हैं, क्योंकि शास्त्रों के द्वारा न किसी की प्रवृत्ति होती है और न निवृत्ति । केवल विधि-निषेधा- त्मक कर्मकाण्ड का ही आनर्थक्य नहीं होता, अपि तु मोक्ष-शास्त्र (वेदान्त-शास्त्र) भी व्यर्थ हो जाता है, क्योंकि कर्मों के बिना ही यदि संसार होता है, तब मुक्त पुरुषों को भी संसरण (जन्म-मरणादिरूप बन्धन) प्राप्त हो जायगा, यही भाष्यकार ने कहा है - "मुक्तानामपि संसारोद्भूतिप्रसङ्गः" । भाष्यकार ने जो कहा है - "न चाविद्या केवला वैषम्यस्य कारणम्।" वह प्रलय-प्रयोजिका अविद्या को ध्यान में रखकर कहा है, क्योंकि विक्षेप (सृष्टि) की प्रयो- जिका अविद्या कार्य (जन्य) होने के कारण अपनी उत्पत्ति में नियमतः अपने पूर्व संसाररूप विक्षेप की अपेक्षा करती हैं। विक्षेप नाम है-मिथ्या ज्ञान का, जिसकी दूसरी संज्ञा है-