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भारतकोश
भामती (वाचस्पति मिश्र - ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य चतुःसूत्री हिन्दी व्याख्या)

भामती (वाचस्पति मिश्र - ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य चतुःसूत्री हिन्दी व्याख्या)

Bhamati of Vachaspati Mishra Hindi

वाचस्पति मिश्र (व्याख्याकार: स्वामी योगेन्द्रानन्द) द्वारा

स्रोत: Brahma Sutra Shankara Bhashya with Vachaspati Mishra Bhamati and Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished639 पृष्ठ

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६१६ ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्यम् [ अ. २ पा. १ सू. ३६

णम्, एकरूपत्वात् । रागादिक्लेशवासनाक्षिप्तकर्मापेक्षा त्वविद्या वैषम्यकरी स्यात् । न च कर्मान्तरेण शरीरं सम्भवति, न च शरीरमन्तरेण कर्म सम्भवतीतीतरेतराश्रय-त्वप्रसङ्गः । अनादित्वे तु बीजाङ्कुरन्यायेनोपपत्तेर्न कश्चिद्दोषो भवति । उपलभ्यते च संसारस्यानादित्वं श्रुतिस्मृत्योः । श्रुतौ तावत् 'अनेन जीवेनाऽऽत्मना' ( छा० ६।३।२ ) इति सर्गप्रमुखे शारीरमात्मानं जीवशब्देन प्राणधारणनिमित्तेनाभिलपन्नादिः संसार इति दर्शयति । आदिमत्त्वे तु प्रागनवधारितप्राणः सन् कथं प्राणधारणनिमित्तेन जीवशब्देन सर्गप्रमुखेऽभिलप्येत ? न च धारयिष्यतीत्यतोऽभिलप्येत; अनागताद्धि सम्बन्धादतीतः सम्बन्धो बलवान् भवति, अभिनिष्पन्नत्वात् । 'सूर्याचन्द्रमसौ धाता


भामती

पुण्यापुण्यप्रवृत्तिहेतुभूतरागद्वेषनिदानं, स च रागादिभिः सहितः स्वकार्ये शरीरं सुखदुःखभोगायतन-मन्तरेण सम्भवति । न च रागद्वेषावन्तरेण कर्म, न च भोगसहितं मोहमन्तरेण रागद्वेषौ, न च पूर्वं-शरीरमन्तरेण मोहादिरिति पूर्वपूर्वशरीरापेक्षो मोहादिरेवं पूर्वपूर्वमोहाद्यपेक्षं पूर्वपूर्वशरीरमित्यनादितेवात्र भगवती चित्तमनाकुलयन्ति । तदेतदाह ॐ रागादिक्लेशवासनाक्षिप्तकर्मापेक्षा त्वविद्या वैषम्यकरी स्याद् इति ॐ । रागद्वेषमोहा रागादयस्त एव हि पुरुषं संसारदुःखमनुभाव्य क्लेशयन्तीति क्लेशास्तेषां वासनाः कर्मप्रवृत्त्यनुगुणास्ताभिराक्षिप्तानि प्रवर्त्तितानि कर्माणि तदपेक्षा लयलक्षणाऽविद्या । स्यादेतत्—भविष्यताऽपि व्यपदेशो दृष्टो यथा पुरोडाशकपालेन तुषानुपवपतीत्यत आह ॐ न च धारयिष्यतीत्यतः इति ॐ । तदेव-


भामती-व्याख्या

मोह । मोह सदैव पुण्य-पापरूप प्रवृत्ति के हेतुभूत राग और द्वेष का कारण होता है । रागादि कार्यों से युक्त मोह सुख-दुःखरूप भोग के आयतनभूत शरीर के बिना नहीं हो सकता । राग-द्वेष के बिना पुण्य-पापात्मक कर्म, कर्मों ( अदृष्टों ) के बिना शरीर, राग-द्वेष और पूर्व शरीर के बिना मोहादि उत्पन्न नहीं हो सकते, अतः पूर्व-पूर्व शरीर की अपेक्षा उत्तरोत्तर मोहादि एवं पूर्व-पूर्व मोह की अपेक्षा उत्तरोत्तर शरीर का लाभ—इस प्रकार बौद्ध सम्मत अविद्यादि बारह पदार्थों के समान अनादि भाव-परम्परा का अनुसरण करना आवश्यक है [ जैसा कि वसुबन्धु ने भी कहा है—"क्लेशकर्म हेतुकं जन्म, तद्धेतुकानि पुनः क्लेशकर्माणि, तेभ्यः पुनर्जन्मेत्यनादि भवचक्रकं वेदितव्यम्" ( अभि. को. भा. पृ. १३० ] । भाष्यकार यही कह रहे हैं—"रागादिक्लेशवासनाक्षिप्तकर्मापेक्षा त्वविद्या वैषम्यकरी स्यात्" । भाष्यस्थ रागादि पद से राग, द्वेष और मोह का ग्रहण किया गया है, क्योंकि वे ही जीव को संसार-रूपी दुःख का अनुभव कराकर क्लेशित ( दुःखी ) करने के कारण क्लेश कहे जाते हैं । उन क्लेशों की जो वासनाएँ ( संस्कार ) हैं, उनके द्वारा आक्षिप्त ( प्रवर्तित ) कर्मों से युक्त होकर ही लयात्मिका अविद्या विश्व की विषमताओं को जन्म देती है । "अनेन जीवेनात्मना" ( छा. ६।३।२ ) इस श्रुति में 'जीव प्राणधारणे' धातु से निष्पन्न 'जीव' पद के द्वारा जो आत्मा का व्यवहार किया गया है, वह अतीत सृष्टि-कालीन प्राण-धारण के निमित्त से ? अथवा भावी सर्ग के प्राण-धारण को दृष्टि में रखकर ? ऐसा सन्देह होने पर पूर्वपक्षी कहता है कि अतीत सृष्टि मानने की आवश्यकता नहीं, भावी प्राण-धारण को वैसे ही निमित्त बनाया जा सकता है, जैसे "पुरोडाशकपालेन तुषानुपवपत्ति"—यहाँ पर भावी पुरोडाश-पाकादिरूप सम्बन्ध को लेकर 'पुरोडाशकपाल' शब्द का व्यवहार है, जैसा कि महर्षि जैमिनि कहते हैं—"अर्थाभिधान-कर्म च भविष्यता संयोगस्य तन्निमित्तत्वात् तदर्थो हि विधीयते" ( जै. सू. ४।१।२६ ) । उक्त पूर्वपक्ष का खण्डन करते हुए भाष्यकार ने कहा है—"अनागताद्धि सम्बन्धादतीतः सम्बन्धो बलवान्" ।