भामती (वाचस्पति मिश्र - ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य चतुःसूत्री हिन्दी व्याख्या)
Bhamati of Vachaspati Mishra Hindi
वाचस्पति मिश्र (व्याख्याकार: स्वामी योगेन्द्रानन्द) द्वारा
स्रोत: Brahma Sutra Shankara Bhashya with Vachaspati Mishra Bhamati and Hindi Commentary (उद्गम)
पृष्ठ 635, कुल 639 में से
संदर्भ में पढ़ेंनिर्गुणस्य स्रष्टृत्वम् ] हिन्दीसहितभामतीसंवलितम् ६१७
यथापूर्वमकल्पयत्' (ऋ० सं० १०।१९०।३) इति च मन्त्रवर्णः पूर्वकल्पसद्भावं दर्श- यति । स्मृतावप्यनादित्वं संसारस्योपलभ्यते—'न रूपमस्येह तथोपलभ्यते नान्तो न चादिर्न च सम्प्रतिष्ठा' (गी० १५।३) इति पुराणे चातीतानागतानां च कल्पानां न परिमाणमस्तीति स्थापितम् ॥ ३६ ॥
——o——
( १३ सर्वधर्मोपपत्त्यधिकरणम् । सू० ३७ )
सर्वधर्मोपपत्तेश्च ॥ ३७ ॥
चेतनं ब्रह्म जगतः कारणं प्रकृतिश्चेत्यस्मिन्नवधारिते वेदार्थे परैरुपक्षिप्तान्वि- लक्षणत्वादीन्दोषान्पर्यहार्षीदाचार्यः। इदानीं परपक्षप्रतिषेधप्रधानं प्रकरणं प्रारिप्स- माणः स्वपक्षपरिग्रहप्रधानं प्रकरणमुपसंहरति । यस्मादस्मिन् ब्रह्मणि कारणे परिगृह्य- माणे प्रदर्शितेन प्रकारेण सर्वे कारणधर्मा उपपद्यन्ते 'सर्वज्ञं सर्वशक्ति महामायं च ब्रह्म'
भामती मनादित्वे सिद्धे सदेव सोम्येदमग्र आसीदेकमेवाद्वितीयमिति प्राक् सृष्टेरविभागावधारणं समुदाचरद्रूप- रागादिनिषेधपरं न पुनरेतान् प्रसुप्तानप्याकरोतीति सर्वमवदातम् ॥ ३६॥
अत्र ☸सर्वज्ञमिति☸ दृश्यते सर्वस्य चेतनाधिष्ठितस्यैव लोके प्रवृत्तिरिति लोकानुसारो दर्शितः। ☸ सर्वशक्ति इति ☸ सर्वस्य जगत उपादानकारणं निमित्तकारणं चेत्युपपादितम्। ☸महामायम् इति☸
भामती-व्याख्या कर्म और सृष्टि का बीज-वृक्ष के समान अनादि हेतु-हेतुमद्भाव सिद्ध हो जाने पर जो “सदेव सोम्येदमग्र आसीत्”—इस श्रुति के बल पर कर्मादि के विभाग का निराकरण किया गया है, वह केवल प्रवर्तमान (स्थूल या सक्रिय) कर्मादि का ही निषेध है, प्रसुप्त (सूक्ष्म या संस्काररूपेण अवस्थित) कर्मादि का नहीं ॥ ३६ ॥
——oo——
संशय—निर्गुण ब्रह्म में जगदुपादानत्व युक्तिविरुद्ध है? अथवा नहीं ?
पूर्वपक्ष—लोक में मृत्तिकादि सगुण पदार्थ ही घटादि पदार्थों के उपादान कारण देखे जाते हैं, रसादि निर्गुण पदार्थ किसी के भी उपादान नहीं होते, अतः 'ब्रह्म न जगत् उपादानम्, निर्गुणत्वाद्, रसादिवत्'—इस अनुमान के द्वारा निर्गुण ब्रह्म में उपादानत्व का समन्वय बाधित हो जाता है।
सिद्धान्त—[ ब्रह्म में परिणामित्वरूप उपादानत्व अवश्य युक्ति-विरुद्ध है, विवर्तोपादानत्व नहीं, क्योंकि ज्वरित व्यक्ति को मधुर रसरूप निर्गुण पदार्थ में भी कटुत्वादि का भ्रम हो जाता है, अतः कटुत्वादि की विवर्तोपादानता रसादि में सम्भव हो जाती है। ब्रह्म में अभिन्ननिमित्तोपादानत्व सिद्ध किया जा चुका है, उसकी पूर्ण योग्यता श्रुति-प्रतिपादित है, क्योंकि वह सर्वज्ञ सर्वशक्तिक और महामाया का आश्रय है ] यहाँ 'सर्वज्ञ' शब्द के द्वारा निमित्त कारणता प्रदर्शित की है, क्योंकि लोक में कुलालादिरूप विज्ञ (चेतन) व्यक्तियों से अधिष्ठित मृदादि पदार्थ ही घटादि निर्माणार्थ प्रवृत्त होते हैं, अतः कुलालादि के समान ही ब्रह्म जगत् का निमित्त कारण माना जाता है। 'सर्वशक्ति' पद के द्वारा 'शक्तस्य शक्यकारणात्'—इस न्याय के अनुसार ब्रह्म में जगत् की उपादानता प्रदर्शित है। 'महामायम्'—इस पद के द्वारा समस्त अनुपपत्तियाँ परास्त की गई है, क्योंकि माया के द्वारा ब्रह्म में सभी धर्म
७८