भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)
Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary
आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा
पृष्ठ 1002, कुल 1167 में से
संदर्भ में पढ़ेंअनेकार्थनामवर्गः ९५९ ४२. नादेयी-अग्निमंथ, जलजामुन और जलवेतस । पाक्यम्-विडम्, सौवर्चलम्¹, यवक्षारश्च । ४३. पाक्य-बिरिया सञ्चर नमक, कालानोन और जवाखार । विशल्या-लाङ्गली, गुडूची लघुदन्ती च । ४४. विशल्या-कलिहारी, गिलोय और छोटीदंती । इन्द्रद्रुः-ककुभः देवदारुः,² कुटजश्च । ४५. इन्द्रद्रु-अर्जुन, देवदार और कुड़ा । काश्मीरं काश्मीरी च-कुङ्कुमम्, पुष्करमूलम्, गम्भारी च। ४६. काश्मीर और काश्मीरी-केशर, पुष्करमूल और गम्भारि । गुन्द्रः³-पटेरकः, मुञ्जः शरश्च । ४७. गुन्द्र-गोंदपटेर, मूँज और सरपत । गुन्द्रा-प्रियङ्गुः, गवेधुका⁴, भद्रमुस्तकञ्च । ४८. गुन्द्रा-प्रियङ्गु, गर हेडुओ और नागरमोथा । चुक्रम्-शुक्तम्, अम्लवेतसम्, वृक्षाम्लञ्च । ४९. चुक्र-चूक, अमलवेंत और कोकम । पारिभद्रः-निम्बः, पारिजातः, देवदारुश्च ।⁵ ५०. पारिभद्र-नीम, फरहद और देवदारु । पीतदारुः-हरिद्रा,⁶ देवदारुः⁷ सरलश्च ।⁸ ५१. पीतदारु-हरदी, देवदार और धूपसरल । वीरः-ककुभः, वीरणं, काकोली च । ५२. वीर-कोह, वीरण तृण और काकोली । वीरतरुः-ककुभः⁹, वीरणम्, शरश्च ।¹⁰ ५३. वीरतरु-कोह, वीरण तृण और सरपत । मयूरः-अपामार्गः, अजमोदा, तुत्थञ्च । ५४. मयूर-चिचिड़ा, अजमोद और तूतिया । रक्तसारः-रक्तचन्दनं, पुतङ्गः, खदिरश्च । ५५. रक्तसार-लालचन्दन, पतङ्ग और खैर । बदरा¹¹-सुवर्चला, अश्वगन्धा, वाराही च । ५६. बदरा-हरहुर, असगंध और बाराहीकंद । वशिरः-रक्तापामार्गः, गजपिप्पली, समुद्रलवणश्च । ५७. वशिर-लाल अपामार्ग, गजपीपर और समुद्री नोन । सौवीरम्-अञ्जनभेदः, वदरम्, सन्धानभेदश्च । ५८. सौवीर-सफेद सुरमा, बेर, कांजी का भेद । वञ्जुलः-अशोकः, वेतसः, तिनिशश्च । ५९. वञ्जुल-अशोक, वेतस और तिनिस । शिला-मनःशिला, शिलाजतु,¹² गैरिकञ्च¹³ । ६०. शिला-मैनसिल, शिलाजीत और गेरू । सोमवल्ली-वाकुची, गुडूची, ब्राह्मी च । ६१. सोमवल्ली-वाकुची, गिलोय और ब्राह्मी । अक्षीवः-शोभाञ्जनः, महानिम्बः,¹⁴ समुद्रलवणश्च । ६२. अक्षीव-सहिजन, वकायन और समुद्री नोन । कारवी-काकजाजी, शताह्वा अजमोदा च । ६३. कारवी-कलौंजी, सोआ और अजमोदा । धामार्गवः-रक्तापामार्गः, राजकोशातकी, महाकोशातकी च । ६४. धामार्गव-लाल अपामार्ग, तरोई और नेनुआ । दुःस्पर्शः-यवासः, कपिकच्छूः, कण्टकारी च । ६५. दुःस्पर्श-जवासा, कौंच और भटकटैया ।
१. सौवर्चल का पर्याय मन्थपाकं आया है न कि पाक्यम् । २. देवदारुः का पर्याय भा. प्र. ने इन्द्रदारु लिखा है । ३. मुंज एवं शर के लिये गुन्द्रः पर्याय नहीं दिखलाई देता । ४. गवेधुका का गुन्द्रा पर्याय नहीं मिलता किन्तु एरका का पर्याय गुन्द्रा है । ५. देवदारु का पर्याय पारिभद्र नहीं मिलता । ६. हरिद्रा का पर्याय पीतदारु नहीं है किन्तु दारुहरिद्रा का है । ७. देवदारु का पर्याय पीतदारु नहीं है । ८. सरल का पर्याय पीतवृक्ष दिया हुआ है । ९. ककुभ का पर्याय वीरवृक्ष है । वीरतरु अन्य वृक्ष है । १०. शर का पर्याय वीरतरु नहीं मिलता । ११. बदरा के स्थान पर वरदा अधिक उचित है क्योंकि अश्वगन्धा तथा वाराही का पर्याय वरदा है । १२. शिलाजतु का पर्याय शिलांज है । १३. गैरिक के पर्याय गैरेयं, गिरिजं हैं न कि शिला । १४. महानिम्ब का अक्षीर पर्याय अन्य निघण्टुओं में मिलता है, अक्षीव नहीं ।