भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)
Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary
आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा
DevanagariHindipublished1,167 पृष्ठ
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९५२ भावप्रकाशनिघण्टुः [ बायाँ स्तम्भ ] पलाशः—किंशुकः, गन्धपलाशी,१ पत्रङ्गं२ । ६६. पलाश—पलाश, कपूरकचरी और तेजपात । कालमेषी—मञ्जिष्ठा, वाकुची, श्यामा त्रिवृच्च । ६७. कालमेषी—मञ्जीठ, वाकुची और काली निसोध । पलङ्कषा—गुग्गुलुः, गोक्षुरः, लाक्षा च । ६८. पलङ्कषा—गूगल, गोखरू और लाख । मधुरसा—द्राक्षा, मूर्वा, गम्भारी च । ६९. मधुरसा—दाख, मूर्वा और गंभारि । रसा—रास्ना, शाल्लकी, पाठा च । ७०. रसा—रास्ना, सलई और पाढ़ी । श्रेयसी—हरीतकी, रास्ना, गजपिप्पली च । ७१. श्रेयसी—हर्रा, रास्ना और गजपीपल । लोहम्—अयः, कांस्यम्३, अगुरु च । ७२. लोह—लोहा, कांसा और अगर । सहा—मुद्गपर्णी, बलाभेदः ('ककही' इति लोके), शतपत्री४ ('सेवती गुलाब' इति लोके) । ७३. सहा—मुगंवन, बरियारा का भेद (लोक प्रसिद्ध 'ककही') और सेवती गुलाब । सुवहा—रास्ना, नाकुली५, नीलपुष्पः सिन्दुवारश्च । ७४. सुवहा—रास्ना, नाकुली और नीले फूलकी मेउड़ी । कठिल्लकः—कारवेल्लः, रक्तपुनर्नवा, कृष्णबर्बरी च । [ दायाँ स्तम्भ ] ७५. कठिल्लक—करेला, लाल गदहपुर्ना और काली बर्बरी । मधूलिका—मूर्वा, यष्टी, जलमधूकश्च । ७६. मधूलिका—मूर्वा, मुलेठी और जल महुआ । वितुन्नकम्—धान्यकम्, तुत्थकम्, गोनर्दश्च । ७७. वितुन्नक—धनिया तूतिया और केवटी मोथा । देवी—स्पृक्का, मूर्वा, वन्ध्याकर्कोटी च । ७८. देवी—स्पृका, मूर्वा और बाँझ खेकसा । वसुकः—शिवमल्ल, श्वेतार्कः, रोमकं६ च । ७९. वसुक—बड़ी मौलसिरी, सफेद आक और सांभर नोन । गण्डीरः—शाकविशेषः, मञ्जिष्ठा, गण्ड दूर्वा च । ८०. गण्डीर—गण्डारी नामक शाकविशेष, मंजीठ और गांडर दू । लाङ्गली—कलिहारी, जलपिप्पली, नारिकेलश्च । ८१. पिच्छिला—कलिहारी, जलपीपल और नारियल । पिच्छिला—शिंशपा, शाल्मलिः, भूतवृक्षश्च । ८२. पिच्छिला—शीशम, सेमर और लिसोड़ा । महासहा—माषपर्णी, अम्लातकः, कुब्जकश्च । ८३. महासहा—माषपर्णी, बाणपुष्प और कूबजा । चन्द्रिका—मेथी, चन्द्रशूरः, श्वेतकण्टकारी च । ८४. चन्द्रिका—मेथी, चनसुर और सफेद भटकटैया । इति त्र्यर्थानि नामानि । अथ चतुर्थार्थकानि नामान्याह चार अर्थ वाले शब्द [ बायाँ स्तम्भ ] श्वेतपुष्पा—इन्द्रवारुणी, सिन्दुवारः, श्वेतार्कः, सैरेयकश्च । १ श्वेतपुष्पा—इन्द्रायण, मेउड़ी, सफेद आक और कटसरैया । [ दायाँ स्तम्भ ] कारवी—पृथ्वीका७, शतपुष्पा, कालाजाजी, अजमोदा च । २ कारवी—पृथ्वीका, शतपुष्पा, कलौंजी और अजमोदा ।
[ पाद-टिप्पणियाँ ] १. गन्धपलाशी का पर्याय पलाशी है न कि पलाशः । २. ध. नि. एवं रा. नि. ने पलाशी पर्याय तेजपत्र के लिये लिखा है । ३. ध. नि. एवं रा. नि. ने कांस्य का पर्याय लोह लिखा है । ४. शतपत्री का सहा पर्याय भा. प्र. रा. नि. एवं ध. नि. में नहीं है । ५. नाकुली का सुरसा पर्याय भा. प्र. में है, सुवहा नहीं । ६. रा. नि. एवं ध. नि. में रोमक के वसुकं, वसु पर्याय मिलते हैं । ७. पृथ्वीका का पर्याय कारवी नहीं मिलता । पृथ्वीका, बृहदेला तथा हिंगुपत्री दोनों का पर्याय है किन्तु इनके कारवी पर्याय न होने से यहाँ दोनों में से कोई नहीं हो सकता । ध. नि. में कारवी का एक अन्य पर्याय कटुहुञ्जी (ऋतुसविशेष) दिया है ।