भारतकोश
भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary

आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा

DevanagariHindipublished1,167 पृष्ठ

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पृष्ठ 1007

१५६ भावप्रकाशस्य पूर्वखण्डे मागध मान—जब कि प्राचीन वैद्यों ने चरक के मत को माना है इसीसे अन्य सब मानों (तौलों) को छोड़ कर सर्वप्रथम मगध देश में प्रचलित 'मागध' नामक मान को कहता हूँ। पण्डितों ने ३० परमाणुओं¹ का 'त्रसरेणु' और त्रसरेणु का ही पर्यायवाची शब्द 'वंशी' कहा है। जाली के अन्तर्गत सूर्य की किरणों द्वारा वंशी दिखाई पड़ती है अर्थात् उन किरणों में ध्यान से देखने पर जो सूक्ष्म रज (धूल के कण) दिखाई पड़ते हैं वे ही वंशी हैं। ६ वंशी की (त्रसरेणु) १ मरीचि होती है और ६ मरीचि की १ राजिका (राई) होती है। ३ राई का १ सरसों, ८ सरसों का १ जौ, ४ जौ की एक रत्ती, ६ रत्ती का १ मासा होता है। इसी के पर्यायवाची शब्द हेम और धानकं (धान्यक) हैं। ४ मासे का एक शाण होता है और इसीको धरण तथा टङ्क भी कहते हैं। २ शाण का १ कोल होता है और इसी को क्षुद्रक, वटक तथा द्रङ्क्षण भी कहते हैं। २ कोल का एक कर्ष होता है और कर्ष ही के पर्यायवाची शब्द पाणिमानिका, अक्ष, पिचु, पाणितल, किञ्चित्पाणि, तिन्दुक, विडालपदक, षोडशिका, करमध्य, हंसपद, सुवर्ण, कवलग्रह तथा उदुम्बर ये सब कहे जाते हैं। दो कर्ष का १ अर्धपल (आधा पल) होता है, इसी को शुक्ति तथा अष्टमिका कहते हैं। २ शुक्ति का १ पल होता है। इसी के नामान्तर मुष्टि, आम्र, चतुर्थिका, प्रकुञ्च, षोडशी तथा बिल्व ये सब हैं। २ पल की १ प्रसृति होती है। इसी को प्रसृत भी कहते हैं। २ प्रसृति की १ अञ्जलि होती है। इसी के नामान्तर कुडव, अर्धशारावक तथा अष्टमान हैं। २ कुडव (अञ्जलि) की १ मानिका होती है। इसी को शराव तथा आठ पल का होने से अष्टपल भी विद्वान् लोग मानते हैं। २ शराव का एक प्रस्थ और ४ प्रस्थ का १ आढक होता है। इसी को भाजन, कांस्यपात्र तथा ६४ पल का होने से चतुःषष्टिपल भी कहते हैं। ४ आढक का १ द्रोण होता है। इसी के पर्यायवाची शब्द कलश, नल्वण, अर्मण, उन्मान, घट तथा राशि ये सब हैं। २ द्रोण का शूर्प होता है। इसी को कुम्भ तथा ६४ शराव का होने से चतुःषष्टिशरावक भी कहते हैं। २ शूर्प की १ द्रोणी होती है। इसी को वाह तथा गोणी भी कहते हैं। २ द्रोणी की १ खारी होती है। बुद्धिमान् लोग तौल में ४०९६ (चार हजार छानबे) पलों की खारी, २००० (दो हजार) पलों का एक भार तथा १०० (सौ) पलों की एक तुला कहते हैं। सर्वत्र शास्त्रों में यही निश्चित है। माष, टङ्क, अक्ष, बिल्व, कुडव, प्रस्थ, आढक, राशि, गोणी और खारी ये सब उत्तरोत्तर एक दूसरे की अपेक्षा चौगुने होते हैं अर्थात्— ४ माष (माशे) का १ टङ्क। ४ टङ्क का १ अक्ष। ४ अक्ष का १ बिल्व। ४ बिल्व का १ कुडव। ४ कुडव का १ प्रस्थ। ४ प्रस्थ का १ आढक। ४ आढक की १ राशि। ४ राशि की १ गोणी। ४ गोणी की १ खारी समझनी चाहिये ॥२-१९॥ १. जालान्तरगते भानौ यत्सूक्ष्मं दृश्यते रजः। तस्य त्रिंशत्तमो भागः परमाणुः स उच्यते ॥१॥ खिड़की के राह जो सूर्य की किरणें मकान के अन्दर आती हैं उनमें जो सूक्ष्म रज दिखाई पड़ते हैं उन रजों में एक के तीसवें भाग को परमाणु कहते हैं ॥१॥