भारतकोश
भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary

आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा

DevanagariHindipublished1,167 पृष्ठ

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अथ प्रथमं मानपरिभाषाप्रकरणम् ९५७ ❖ मागधपरिभाषायां षड्रक्तिको माषश्चतुर्विंशतिरक्तिकष्टङ्कः, षण्णवतिरक्तिकः कर्षः । अयं चरकसम्मतः । सुश्रुतमते तु पञ्चरक्तिको माषः, विंशतिरक्तिकष्टङ्कः, अशीतिरक्तिकः कर्षः । अयमेव कालिङ्गपरिभाषायामपि । यतस्तत्राष्टरक्तिको माषो द्वात्रिंशद्रक्तिकष्टङ्कः, सार्धटङ्कद्वयमितः कर्षः ।। २-१९ ।। मागधपरिभाषा में ६ रत्ती का एक मासा, २४ रत्ती का १ टङ्क और ९६ रत्ती का १ कर्ष होता है। यह मान चरकसम्मत है। सुश्रुत के मत में-५ रत्ती का १ माशा, २० रत्ती का १ टङ्क और ८० रत्ती का १ कर्ष होता है। यही कालिङ्ग परिभाषा में भी होता है। क्योंकि उसमें ८ रत्ती का १ माशा, ३२ रत्ती का १ टङ्क और २ ।। टङ्क का १ कर्ष होता है ।।२-१९।। अथ द्रवार्द्रशुष्कद्रव्याणां मानविषये परिभाषामाह- गुञ्जाऽऽदिमानमारभ्य यावत्स्यात्कुडवस्थितिः । द्रवार्द्रशुष्कद्रव्याणां तावन्मानं समं मतम् ।। प्रस्थादिमानमारभ्य द्विगुणं तद् द्रवार्द्रयोः । मानं तथा तुलायास्तु द्विगुणं न क्वचित्स्मृतम् ।। द्रव (पानी आदि के समान), गीले तथा सूखे द्रव्यों के मान के विषय में परिभाषा-रत्ती आदि से लेकर कुडवपर्यन्त द्रव, गीले तथा सूखे पदार्थों का मान (तौल) बराबर रहता है, अर्थात् जितना और द्रव्यों का मान है उसी के समान ही इसका भी रहता है। किन्तु प्रस्थ आदि मान से द्रव तथा आर्द्र (गीले) द्रव्यों का लिखित मान द्विगुण होना आरम्भ हो जाता है। तुला का मान द्रव्य द्रव्य या आर्द्र द्रव्यों में भी कहीं द्विगुण नहीं किया जाता अर्थात् जैसा लिखित रहता है उतना ही लिया जाता है ।।२०-२१।। अथ कुडवभाण्डस्य लक्षणमाह- मृद्वृक्षवेणुलोहादेर्भाण्डं यच्चतुरङ्गुलम् । विस्तीर्णञ्च तयोच्छ्रञ्च तन्मानं कुडवं वदेत् ।। २२ ।। कुडवसंज्ञक मानपात्र का लक्षण-मिट्टी, वृक्ष, बांस या लोहा के बने हुये चार अंगुल चौड़े तथा चार ही अंगुल ऊंचे मानपात्र को 'कुडव' कहते हैं ।।२२।। इति मागधमानं समाप्तम् । अथ कालिङ्गमानमाह- यतो मन्दाग्नयो ह्रस्वा हीनसत्त्वा नराः कलौ । अतस्तु मात्रा तद्योग्या प्रोच्यते सुज्ञसंमता ।। यवो द्वादशभिर्गौरसर्षपैः प्रोच्यते बुधैः । यवद्वयेन गुञ्जा स्यात्त्रिगुञ्जो वल्ल उच्यते ।। २४ ।। माषो गुञ्जाभिरष्टाभिः सप्तभिर्वा भवेत्क्वचित् । चतुर्भिर्माषकैः शाणः स निष्कष्टङ्क एव च ।। गद्याणो माषकैः षड्भिः कर्षः स्याद्दशमाषकैः । चतुष्कषैः पलं प्रोक्तं दशशाणमितं बुधैः ।। चतुष्पलैश्च कुडवः प्रस्थाद्याः पूर्ववन्मताः । स्थितिर्नास्त्येव मात्रायाः कालमग्निं वयो बलम् ।। प्रकृतिं दोषदेशौ च दृष्ट्वा मात्रां प्रकल्पयेत् । नाल्पं हन्त्यौषधं व्याधिं यथाऽम्भोऽल्पं महानलः ।। अतिमात्रं च दोषाय यथा शस्ये बहूदकम् ।। २८ ।। कालिङ्गमान-कलियुग में मनुष्य मन्द अग्नि वाले, छोटे शरीर के तथा हीन बलवाले हैं, अतः उनके योग्य विद्वानों के द्वारा स्वीकृत जो मात्रा (औषध देने में) है उसे कहते हैं। १२ सफेद सरसों का १ जौ और दो जौ की एक रत्ती, तीन रत्ती का एक बल्ल होता है। ८ रत्ती का अथवा कहीं कहीं ७ रत्ती का भी एक माशा और चार मासे का एक शाण होता है, इसी को निष्क और टङ्क भी कहते हैं। छः माशे का एक गद्याण होता है। दस माशे का एक कर्ष और चार कर्ष का एक पल जो कि दस शाण के बराबर होता है। CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA