भारतकोश
भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary

आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा

DevanagariHindipublished1,167 पृष्ठ

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अथ द्वितीयं भेषजविधानप्रकरणम् ९६१ अथ फाण्टनिर्माणमाह- क्षुण्णे द्रव्यपले सम्यग्जलमुष्णं विनिक्षिपेत्। मृत्पात्रे कुडवोन्मानं ततस्तु स्त्रावयेत्पटात् ॥११०॥ स स्याच्चूर्णद्रवः फाण्टस्तन्मानं द्विपलोन्मितम्। क्षौद्रं सितागुडादींस्तु कर्षमात्रान्विनिक्षिपेत् ।। फाण्ट बनाने की विधि-अच्छी तरह से चूर्ण किये हुये एक पल (४ तोले) द्रव्य को मिट्टी के पात्र में रख कर उस में एक कुडव (१६ तोले) खूब गरम जल छोड़ कर भिगो दे जब खूब भीग जाय तब कपड़े से छांन ले इसी जल को 'फाण्ट' कहते हैं। इसकी मात्रा दो पल (८ तोले) की होती है। इसमें मधु, साफ शक्कर अथवा गुड़ आदि के छोड़ने की मात्रा एक कर्ष (१ तोले) की है ॥११०-११॥ ❖ क्षुण्णे=चूर्णीकृते, स चूर्णद्रवः फाण्टः स्यादित्यन्वयः ॥११०-११॥ यहाँ 'क्षुण्णे' पद का 'चूर्ण किये हुये' यह अर्थ है और 'वह चूर्ण द्रव (चूर्ण मिश्रित छना हुआ जल) फाण्ट कहलाता है' ऐसा अन्वय है ॥११०-११॥ अथ कल्कविधिमा- द्रव्यमार्द्रं शिलापिष्टं शुष्कं वा सजलं भवेत्। तदेव कल्को विज्ञेयस्तन्मानं कर्षसम्मितम् ।। कल्के मधुघृतं तैलं देयं द्विगुणमात्रया । सितां गुडं समं दद्याद् द्रवो देयश्चतुर्गुणः ।।१३।। कल्क (चटनी) बनाने की विधि-यदि गीला द्रव्य हो तो बिना जल के और सूखा हो तो जल के साथ सिल पर पीसा जाय तो उसे 'कल्क' कहते हैं। इस की मात्रा एक कर्ष (१ तोले) की होती है। यदि कल्क में मधु, घी अथवा तेल मिलाना हो तो उसकी मात्रा कल्क से दूनी होनी चाहिये। यदि साफ शक्कर तथा गुड़ डालना हो तो उस की मात्रा कल्क के समान होनी चाहिये और यदि द्रव पदार्थ (जलादि) मिलाना हो तो उस की मात्रा कल्क से चौगुनी होनी चाहिये ॥ अथ चूर्णविधिमाह- अत्यन्तशुष्कं यद् द्रव्यं सुपिष्टं वस्त्रगालितम्। तत्स्याच्चूर्णं रजः क्षोदस्तन्मात्रा कर्षसम्मिता ।। चूर्णे गुडः समो देयः शर्करा द्विगुणा मता। चूर्णेषु भज्जतं हिङ्गु देयं नोत्क्लेशकृद्भवेत् ।।१५।। लिहेच्चूर्णं द्रवैः सर्वैर्घृताद्यैर्द्विगुणोन्मितैः। पिबेच्चतुर्गुणैरेवं चूर्णमालोडितं द्रवैः ।।१६।। चूर्ण बनाने की विधि-जो अत्यन्त सूखा द्रव्य होता है उसे खरल आदि में रख कर अत्यन्त महीन कूट कर वस्त्र से छान लिया जाय तो उसे चूर्ण कहते हैं। इसी का नामान्तर रज तथा क्षोद भी है। इसकी मात्रा एक कर्ष (१ तोले) की होती है। यदि चूर्ण में गुड़ मिलाना हो तो उस की मात्रा चूर्ण के बराबर और साफ शक्कर मिलाना हो तो उसकी मात्रा चूर्ण से दुगुनी होनी चाहिये। यदि हींग मिलानी हो तो उसे घी में भून कर इतनी मात्रा में डाले कि जितनी खाने से जी न मिचलाये। यदि घृतादि द्रव पदार्थ के साथ चूर्ण चाटना हो तो घृतादि की मात्रा चूर्ण से दुगुनी लेनी चाहिये और यदि पीना हो तो चूर्ण को चौगुने जलादि द्रव पदार्थों में खूब घोल कर पीवे ॥१४-१६॥ अथानुपानमाह- चूर्णावलेहगुटिकाकल्कानामनुपानकम् । पित्तवातकफातङ्के त्रिद्व्येकपलमाहरेत् ।।१७।। यथा तैलं जले क्षिप्तं क्षणेनैव विसर्पति । अनुपानबलादङ्गे तथा सर्पति भेषजम् ।।१८।। अनुपान की मात्रा-चूर्ण, अवलेह, गोली और कल्क इनके अनुपान (दुग्धादि) की मात्रा पित्त, वात तथा कफसम्बन्धी रोगों में क्रम से तीन पल (१२ तोले), दो पल (८ तोले) और एक पल (४ तोले) की होनी चाहिये। जिस प्रकार जल में तेल छोड़ने से वह क्षण मात्र में (जल के ऊपर) चारो तरफ फैल जाता है उसी प्रकार अनुपान के बल से ओषधि भी क्षणमात्र में ही संपूर्ण अङ्गों में फैल जाती है ॥१७-१८॥ ६४ भाव.I CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmụ. Digitized by S3 Foundation USA