भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)
Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary
आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१६२ भावप्रकाशस्य पूर्वखण्डे अथ भावनाविधिमाह- द्रवेण यावता सम्यक् चूर्णं सर्वं प्लुतं भवेत्। भावनाथाः प्रमाणं तु चूर्णे प्रोक्तं भिषग्वरैः ।। भावना की विधि-द्रव पदार्थों की जितनी मात्रा से सम्पूर्ण चूर्ण भली-भाँति डूब जाय उतनी मात्रा से चूर्ण में द्रवपदार्थों की भावना देनी चाहिये ॥१९॥ अथ पुटपाकविधिमाह- पुटपाकस्य कल्कस्य स्वरसो गृह्यते यतः । अतस्तु पुटपाकानां युक्तिरत्रोच्यते मया ।।२०।। पुटपाकस्य पाकोऽयं लेपस्याङ्गारवर्णता । लेपञ्च द्व्यङ्गुलं स्थूलं कुर्याद् द्व्यङ्गुलमात्रकम् ।।२१।। काश्मरीवटजम्ब्वादिपत्रैर्वेष्टनमुत्तमम् ।।२२।। पलमात्रो रसो ग्राह्यः कर्षमात्रं मधु क्षिपेत्। कल्कचूर्णद्रवाद्यास्तु देयाः कोलमिता बुधैः ।। पुटपाक की विधि-अनेक स्थलों पर पुटपाक की विधि से परिपक्क कल्क का स्वरस ग्रहण किया जाता है। अतः यहाँ मैं पुटपाक की विधि कहता हूँ। पुटपाक के परिपाक होने का लक्षण-जब ऊपर लेप की हुई मिट्टी दहकते अंगारे के समान हो जाय तब समझना चाहिये कि पुटपाक सिद्ध हो गया। पुटपाक की विधि-कल्क किये हुये द्रव्य के ऊपर खम्भारि, बरगद वा जामुन आदि के पत्तों को दो अङ्गुल मोटा खूब उत्तम रीति से लपेट कर ऊपर से दो अंगुल मोटा मिट्टी का लेप कर दे और अग्नि में डाल दे। जब मिट्टी लाल हो जाय तब निकाल ले। पश्चात् ऊपर की मिट्टी आदि अलग करके उस कल्क के रस को निचोड़ ले। इसकी मात्रा एक पल (४ तोले) की है। इसमें यदि मधु डालना हो तो एक कर्ष (१ तो.) डाले। यदि पण्डित लोग इसमें अन्य कोई कल्क, चूर्ण अथवा द्रवपदार्थ (जलादि) डालते हैं तो उसकी एक कोल (६ माशे) की मात्रा रखते हैं ॥२०-२३॥ अथोष्णोदकविधिमाह- अष्टमेनांशशेषेण चतुर्थेनार्द्धकेन वा। अथवा क्वथनेनैव सिद्ध मुष्णोदकं भवेत् ।।२४।। श्लेष्मामवातमेदोघ्नं वस्तिशोधनदीपनम्। कासश्वासज्वरान् हन्ति पीतमुष्णोदकं निशि ।।२५।। उष्णोदक (गरम जल) की विधि-जल को गरम करने पर उसका आठवाँ हिस्सा, चौथा हिस्सा या आधा हिस्सा शेष रहने पर अथवा केवल उबाल लेने पर ही उसे उष्णोदक कहते हैं। यदि उष्णोदक रात में पिया जाय तो कफ, आमवात तथा भेद को नष्ट करने वाला, वस्तिशोधक, अग्निदीपक एवं कास, श्वास तथा ज्वर को दूर करने वाला होता है ॥२४-२५॥ अथ क्षीरपाकविधिमाह- क्षीरपाक की विधि-द्रव्य से अठगाना दूध और दूध से चौगुना जल छोड़ कर औंटाये जब केवल दूध रह जाय तब उतार ले। इसे पीने से आम से उत्पन्न हुआ शूल नष्ट होता है ॥२६॥ अथ क्वाथविधिमाह- पानीयं षोडशगुणं क्षुण्णे द्रव्यपले क्षिपेत् । मृत्पात्रे क्वाथयेद् ग्राह्यमष्टमांशावशेषितम् ।।२७।। क्वाथ बनाने की विधि-चूर्ण किये हुए एक पल (४ तोले) द्रव्य को मिट्टी के पात्र में रख कर उसमें १६ गुना (६४ तोले) जल डालकर आग पर रख बिना ढके खौलाये जब अष्टमांश (८ तोले) जल रह जाय तब उतार ले ॥२७॥ कर्षार्दौ तु पलं यावद् दद्यात्षोडशिकं जलम् । ततस्तु कुडवं यावत्तोयमष्टगुणं भवेत् ।। चतुर्गुणमतश्चोर्ध्वं यावत् प्रस्थादिकं जलम् ।।२८।।