भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)
Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary
आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअथ द्वितीयं भेषजविधानप्रकरणम्. ९६३ परिभाषा-यदि द्रव्य की मात्रा कर्ष से लेकर पल पर्यन्त की हो तो जल १६ गुना डालना चाहिये और उससे (पल से) अधिक यदि कुडव (४ पल) पर्यन्त द्रव्य की मात्रा हो तो अठगुना जल डाले। इसके (कुडव के) उपरान्त प्रस्थ आदि पर्यन्त यदि द्रव्य की मात्रा हो तो चौगुना जल डाले ॥२८॥ ❖ षोडशिकं = षोडशगुणम् ।।२८।। यहां 'षोडशिकम्' इस पद का '१६ गुना' यह अर्थ समझना चाहिये ॥२८॥ तज्जलं पाययेद्धीमान्कोष्णं मृद्वग्निसाधितम् । शृतः क्वाथः कषायश्च निर्यूहः स निगद्यते ।। बुद्धिमान वैद्य रोगी को उक्त जल किञ्चिद् गर्म रहते ही पिलावे और धीमी आँच से औटा कर तैयार करे। इसी को संस्कृत में शृत, क्वथ, कषाय तथा निर्यूह कहते हैं ॥२९॥ अथ क्वाथपानमात्रामाह- मात्रोत्तमा पलेन स्यात्त्रिभिरक्षैस्तु मध्यमा । जघन्या च पलाईद्धेन स्नेहक्वाथौषधेषु च ।। ३० ।। क्वाथ (काढ़ा) पीने की मात्र-स्नेह घृतादि), क्वाथ (काढ़ा) तथा औषध में देने में उत्तम मात्रा एक पल (४ तोले) की, मध्यम मात्रा-३ कर्ष (तोले) की और निकृष्टमात्रा-आधे पल (२ तोले) की कही जाती है ॥३०॥ तन्त्रान्तरे- क्वाथ्यद्रव्यपले वारि द्विरष्टगुणमिष्यते । चतुर्थांशावशिष्टन्तु पेयं पलचतुष्टयम् ।।३१।। दीप्तानलं महाकायं पाययेदञ्जलिं जलम् । अन्ये त्वर्द्धं परित्यज्य प्रसुतिं तु चिकित्सकाः ।। क्वाथत्यागमनिच्छन्तस्त्वष्टभागावशेषितम् । पारम्पर्योपदेशेन वृद्धवैद्याः पलद्वयम् ।।३२।। अन्य ग्रन्थों में यह लिखा है कि-जिस द्रव्य का क्वाथ बनाना हो, उसे एक पल (४ तोले) लेकर उसमें १६ गुना (१६ पल) जल डालकर औँटाये जब चतुर्थांश (४ पल) जल अवशिष्ट रह जाय तब उसे पीना चाहिये। जिसके शरीर का आकार बड़ा हो तथा अग्नि प्रदीप्त हो उसे एक अञ्जलि अर्थात् ४ पल) पिलावे। अन्य चिकित्सक लोग अञ्जलि से आधा भाग छोड़ कर केवल प्रसुति मात्र (२ पल) क्वाथ पिलाते हैं और जो वृद्ध वैद्य क्वाथ बना कर उसमें से आधा भाग पिला कर शेष आधा भाग छोड़ना नहीं चाहते वे लोग गुरुपरम्परा-प्राप्त उपदेश से पूर्वोक्त रीति से क्वाथ बनाने के समय चतुर्थांश जल अवशिष्ट न करके अष्टमांस जल अवशिष्ट रहने पर ही क्वाथ उतारते हैं ऐसी अवस्था में दो पल अवशिष्ट रहता है उसी को पिलाते हैं ॥३१-३३॥ ❖ अष्टभागावशेषितस्य चतुर्थांशावशिष्टापेक्षया गुरुत्वाद् दीप्तानलं महाकायं पलद्वयं पाययेत् । मध्यमाग्निमल्पकायं पलमात्रं पाययेत् । 'मात्रोत्तमापलेन स्याद्' इत्यादि वचनात् ।।३१-३३।। यहाँ यह स्मरण रखना चाहिये कि-जब अष्टमांश जल अवशिष्ट रहने पर क्वाथ उतारा जायगा तब वह चतुर्थांश अवशिष्ट क्वाथ की अपेक्षा गुरु होग अतः जिनकी जठराग्नि अत्यन्त प्रदीप्त है और शरीर भी विशाल है उन्हें ही अष्टमांशावशिष्ट दो पल की मात्रा पिलानी चाहिये। और जिनकी जठराग्नि मध्यम तथा छोटे शरीर वाले हैं उन्हें एक पल की ही मात्रा पिलानी चाहिये। क्योंकि 'एक पल की मात्रा उत्तम होती है' इत्यादि वचनों का प्रमाण भी मिलता है ॥३१- ३३॥ अथ क्वाथे सितादीनां प्रक्षेपमानमाह- क्वाथे क्षिपेत्सितामंशैश्चतुर्थाष्टमषोडशैः । वातपित्तकफातङ्के विपरीतं मधु स्मृतम् ।।३४।। जीरकं गुग्गुलुं क्षारं लवणं च शिलाजतु । हिङ्गु त्रिकटुकञ्चैव क्वाथे शाणोन्मितं क्षिपेत् ।। ३५ ।। क्षीरं घृतं गुडं तैलं मूत्रं चान्यद् द्रवं तथा । कल्कं चूर्णादिक क्वाथे निक्षिपेत् कर्षसम्मितम् ।। ३६ ।। CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammnu. Digitized by S3 Foundation USA