भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)
Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary
आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१६४ भावप्रकाशस्य पूर्वखण्डे क्वाथ में साफ शक्कर आदि डालने की मात्रा-क्वाथ में वात, पित्त तथा कफसम्बन्धी रोगों में क्रम से साफ शक्कर (क्वाथ के) चतुर्थांश, अष्टमांश तथा षोडशांश के बराबर छोड़ना चाहिये। किन्तु यदि शहद छोड़ना हो तो इससे विपरीत क्रम से छोड़ना चाहिये अर्थात् वातज रोगों में क्वाथ का १६ वाँ भाग, पित्तज में आठवाँ भाग और कफज में चौथा भाग शहद छोड़ना चाहिये। जीरा, गूगल, खार, नमक, शिलाजीत, हींग, त्रिकटु, (सोंठ, पीपरि, मरिच) ये सब यदि क्वाथ में छोड़े जायें तो शाण (३ माशे) के बराबर होने चाहिये। दूध, घी, गुड़, तेल, मूत्र तथा अन्य प्रकार के द्रवपदार्थ या कल्क एवं चूर्ण आदि क्वाथ में छोड़ना हो तो उसकी मात्रा एक कर्ष (१२ माशे) की होनी चाहिये ॥३४-३६॥ अथौषधभक्षणविधिमाह- तत्रोपविश्य विश्रान्तः प्रसन्नवदनेक्षणः । औषधं हेमरजतमृद्भाजनपरिस्थितम् ।।३७।। पिबेत् प्रसन्नहृदयः पीत्वा पात्रमधोमुखम् । विधायाक्षाभ्य सलिलं ताम्बूलाद्युपयोजयेत् ।।३८।। औषध भक्षण की विधि-औषध खाने के समय प्रथम सोने, चांदी अथवा मिट्टी के पात्र में औषध (क्वाथ) को रख कर थकावट दूर हो जाने पर प्रसन्नमुख तथा नेत्र होकर और सुस्थिर बैठ कर पीवे (खावे)। प्रसन्न मन से पीकर पात्र को औंधे मुख रख कर तत्पश्चात् जल से आचमन कर के पान आदि खावे ॥३७-३८॥ अथावलेहविधिमाह- क्वाथादेर्यत्पुनः पाकाद् घनत्वं सा रसक्रिया । सोऽवलेहश्च लेहश्च तन्मात्रा स्यात्पलोन्मिता ।। सिता चतुर्गुणा कार्या चूर्णाच्च द्विगुणो गुडः । द्रवं चतुर्गुणं दद्यादिति सर्वत्र निश्चयः ।।४०।। सुपक्वे तन्तुमत्त्वं स्यादवलेहेऽप्सु मज्जनम् । स्थिरत्वं पीडिते मुद्रा गन्धवर्णरसोद्भवः ।।४१।। दुग्धमिक्षुरसं यूषं पञ्चमूलकषायकम् ।। वासाक्वाथं यथायोग्यमनुपानं प्रशस्यते ।।४२।। अवलेह बनाने की विधि-क्वाथ आदि जो पुनः पाक करने से अत्यन्त गाढ़ा हो जाता है उसी को रसक्रिया, अवलेह तथा लेह कहते हैं। उसकी मात्रा एक पल (४ तोले) की होती है। यदि इसमें साफ शक्कर डालनी हो तो चूर्ण की चौगुनी और गुड़ दुगुना डाले तथा द्रवपदार्थ चौगुना डाले। अवलेह का परिपाकज्ञान-अवलेह के परिपक्व होने पर उठा कर खींचने से उससे चाशनी के समान तार निकलना, जल में डालने पर डूब जाना, रखने पर स्थिर रहना (इधर उधर न फैलना), दबाने पर अंगुली की रेखायें उस पर उभड़ आना और शास्त्रोक्त गन्ध, वर्ण तथा रस का उत्पन्न हो जाना ये सब लक्षण प्रकट हो जाते हैं। अनुपान-दूध, ऊख का रस, मूंग आदि का जूस, पञ्चमूल का क्वाथ और अडूसा का क्वाथ इनमें से किसी का योग्यतानुसार अवलेह में अनुपान उत्तम होता है ॥३९-४२॥ गुटिकानिर्माणविधिमाह- वटका अथ कथ्यन्ते तन्नाम गुटिका वटी । मोदको वटिका पिण्डी गुडो वर्त्तिस्तथोच्यते ।।४३।। लेहवत्साध्यते वह्नौ गुडो वा शर्कराऽथवा । गुग्गुलुर्वा क्षिपेत्तत्र चूर्णं तन्निर्मिता वटी ।।४४।। गोली बनाने की विधि-गुटिका, वटी, मोदक, वटिका, पिण्डी, गुड तथा वर्ति ये सब नाम गोली के हैं। आग के ऊपर गुड़, शक्कर या गूगल रखकर अवलेह के समान बनावे पश्चात् उसमें औषध चूर्ण डालकर उसकी गोली बनावे ॥४३-४४॥ ❖ तत्र=वह्निसिद्धे गुडादौ ।।४४।। यहाँ 'तत्र' पद का 'आग पर रख कर सिद्ध किये हुये गुडादि में' यह अर्थ समझना चाहिये ।। कुर्याद्वह्निसिद्धेन क्वचिद् गुग्गुलुना वटीम् । द्रवेण मधुना वाऽपि गुटिकां कारयेद् बुधः ।।४५।। सिता चतुर्गुणा देया वटीषु द्विगुणो गुडः । चूर्णे चूर्णसमः कार्यो गुग्गुलुर्मधु तत्समम् ।।४६।। CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmmu. Digitized by S3 Foundation USA