भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)
Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary
आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअथ द्वितीयं भेषजविधानप्रकरणम् १६५ कहीं-कहीं विद्वान् लोग बिना आग पर पकाये ही गूगल से गोली तैयार करते हैं। अथवा द्रव पदार्थ या शहद से ही गोली बना लेते हैं। गोली बनाने में चूर्ण की अपेक्षा साफ शक्कर चौगुनी, गुड़ दुगुना और गुग्गुल या मधु चूर्ण के समान डालना चाहिये ॥४५-४६॥ ❖ तत्समं=चूर्णसमम् ।।४६।। यहाँ 'तत्समम्' पदका 'चूर्ण के समान' यह अर्थ है ॥४५-४६॥ द्रवं तु द्विगुणं देयं मोदकेषु भिषग्वरैः ।।४७।। वैद्यवरों को चाहिये कि गोली बनाने में यदि द्रवरूप पदार्थ डालना हो तो उसकी मात्रा चूर्ण से दुगुनी लेवे ॥४७॥ ❖ द्रवं=द्रवरूपं द्रव्यम् ।।४७।। यहाँ 'द्रवम्' पद का 'द्रव रूप पदार्थ' यह अर्थ समझना चाहिये ॥४७॥ कर्षप्रमाणं तन्मात्रा बलं दृष्ट्वा प्रयुज्यते ।।४८।। गोलियों की मात्रा यद्यपि एक कर्ष (१ तोले) की कही हुई है, तथापि रोगियों के बल को देख कर तदनुसार इसकी मात्रा की कल्पना करनी चाहिये ॥४८॥ ❖ बलमिति कालादेरप्युपलक्षणम् ।।४८।। यहाँ 'बलम्' यह पद कालादि का भी उपलक्षण है इससे 'बल, काल, अवस्था, देश आदि को देख कर' ऐसा अर्थ समझना चाहिये ॥४८॥ अथ घृततैलयोर्विधिमाह- कल्काच्चतुर्गुणीकृत्य घृतं वा तैलमेव च । चतुर्गुणद्रवे साध्यं तस्य मात्रा पलोन्मिता ।।४९।। घृत और तेल बनाने की विधि-कल्क से चौगुना घी अथवा तेल लेकर उससे (घी तथा तेल से) चौगुने द्रव पदार्थ के साथ उसे सिद्ध करना चाहिये। जब केवल घी या तेल रह जाय तब उसे उतार लेना चाहिये, उसकी मात्रा एक पल की होती है ॥४९॥ ❖ मात्रा पलोन्मिता भक्षणाय ।।४९।। यहाँ 'मात्रा एक पल की होती है' ऐसा जो कहा गया है वह खाने के लिये समझना चाहिये ॥ निक्षिप्य क्वाथयेत्तोयं क्वाथ्यद्रव्याच्चतुर्गुणम् । पादशिष्टं गृहीत्वा तु स्नेहं तेनैव साधयेत् ।।५०।। चतुर्गुणं मृदुद्रव्ये कठिनेऽष्टगुणं जलम् । मृद्वादिक्वाथ्यसंघाते दद्यादष्टगुणं पयः ।। अत्यन्तकठिने द्रव्ये नीरं षोडशिकं मतम् ।।५१।। जिस द्रव्य का क्वाथ बनाना हो उससे चौगुना जल छोड़ कर क्वाथ बनाना चाहिये और जब चतुर्थांश शेष रह जाय तब उसमें स्नेह (घृत या तेल) डालकर पकावे जब केवल स्नेह पदार्थ रह जाय तब उतार कर काम में ले। यहाँ चौगुना जल छोड़ना जो कहा है वह मृदु द्रव्यों के लिये कठिन द्रव्यों के लिये तो अठगुना जल छोड़ना चाहिये। जहाँ मृदु आदि अर्थात् क्वाथ करने योग्य मृदु तथा कठिन द्रव्यों का समूह हो वहाँ अठगुना ही जल छोड़ना चाहिये। यदि अत्यन्त कठिन द्रव्य हो तो उसमें १६ गुना जल छोड़ना चाहिये ॥५०-५१॥ ❖ मृदुद्रव्ये=आर्द्रद्रव्ये गुडूच्यादौ । कठिने=शुष्कद्रव्ये शुण्ठ्यादौ । अत्यन्तकठिने=चिरशुष्के देवदारर्वादौ ।।५०-५१।। CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA