भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)
Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary
आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअथ द्वितीयं भेषजविधानप्रकरणम् १६७ इसका स्पष्ट अर्थ यह है कि-जिन स्नेह के बनाने में दूध, दही, स्वरस, तक्र और कल्क में उपयोग किया हुआ जल, इन पाँचों द्रव पदार्थों का प्रयोग होता है वहाँ प्रत्येक वे सब तौल में स्नेह के बराबर हों ऐसा समझना चाहिये । अर्थात् उन पांचों में जो-जो पूर्व में हैं अर्थात् दही, दूध, स्वरस तथा तक्र वे सब चारो मिलकर स्नेह के चौगुने होने चाहिये ॥५५॥ द्रव्येण केवलेनैव स्नेहपाको भवेद् यदि । तत्राम्बुपिष्टः कल्कः स्याज्जलं चात्र चतुर्गुणम् ।। ५५ ।। क्वाथेन केवलेनैव पाको यत्रोदितः क्वचित् । क्वाथ्यद्रव्यस्य कल्कोऽपि तत्र स्नेहे प्रयुज्यते ।। ५७ ।। जहाँ केवल द्रव्य ही से स्नेह बनाना हो वहाँ उस द्रव्य का कल्क जल से पीसना चाहिये । और जल कल्क द्रव्य से चौगुना लेना चाहिये । जहाँ केवल क्वाथ से स्नेह बनाना कहा हो वहाँ यह भी समझना चाहिये कि जिस द्रव्य का क्वाथ बना है उसके कल्क का भी उस स्नेह में प्रयोग किया जाता है ।। ५६-५७ ।। कल्कहीनस्तु यः स्नेहः स साध्यः केवले द्रवे ।। ५८ ।। यदि कोई स्नेह बिना कल्क ही के बनाया जाय तो वहाँ केवल द्रव में ही उसे सिद्ध करना चाहिये ॥ ❖ केवले द्रवे=क्वाथेतरस्मिन् स्वरसादिरूपे ।। ५८ ।। यहाँ 'केवल द्रव में' ऐसा कहने का यह भाव समझना चाहिये कि—क्वाथ से भिन्न स्वरसादिरूप द्रव में ।। ५८ ।। पुष्पकल्कस्तु यः स्नेहस्तत्र तोयं चतुर्गुणम् । स्नेहात् स्नेहाष्टमांशश्च पुष्पकल्कः प्रयुज्यते ।। ५९ ।। जिस स्नेह में फूलों का कल्क बनाया जाता हो वहाँ स्नेह का चौगुना जल और स्नेह का अष्टमांश फूलों का कल्क डालना चाहिये ।। ५९ ।। वर्त्तिवत्स्नेहकल्कः स्याद् यदाऽङ्गुल्या विवर्त्तितः । शब्द हीनोऽग्निक्षिप्तः स्नेहः सिद्धो भवेत्तदा ।। ६० ।। यदा फेनोद्गमस्तैले फेनशान्तिश्च सर्पिषि । वर्णगन्धरसोत्पत्तिः स्नेहः सिद्धो भवेत्तदा ।। ६१ ।। सिद्ध हुये स्नेह के लक्षण-जब अङ्गुली से बटने पर स्नेह के कल्क की बत्ती बन जाने लगे और स्नेह को अग्नि में छोड़ने पर उससे फट्-फट् शब्द न होने लगे तब स्नेह को सिद्ध हुआ समझना चाहिये । जब तेल में फेन निकलने लगे और घी में जब फेन का निकलना बन्द होने लगे तथा दोनों के यथोक्त वर्ण, गन्ध तथा रस मालूम पड़ने लगे तब स्नेह (तेल तथा घी) को सिद्ध हुआ समझना चाहिये ।। ६०-६१ ।। अथ स्नेहपाकस्य लक्षणपूर्वकं त्रैविध्यमाह- स्नेहपाकस्त्रिधा प्रोक्तो मृदुर्मध्यः खरस्तथा । ईषत्सरसकल्कस्तु स्नेहपाको मृदुर्भवेत् ।। ६२ ।। मध्यपाकस्य सिद्धिश्च कल्के नीरसकोमले । ईषत्कठिनकल्कश्च स्नेहपाको भवेत्खरः ।। ६३ ।। स्नेह परिपाक के लक्षण पूर्वक तीन प्रकार-स्नेह का परिपाक तीन प्रकार का होता है । (१) मृदुपाक, (२) मध्यपाक और (३) खरपका । (१) मृदुपाक—जिस स्नेह के पाक में स्नेह कल्क के कुछ सरस रहते ही उतार लिया जाय उसे मदुपाक कहते हैं । (२) मध्यपाक—जिसमें कल्क के नीरस तथा कोमल रहते ही पाक बन्द कर दिया जाय उसे मध्यपाक कहते हैं । (३) खरपाक—जिस स्नेहपाक में कल्क कुछ कठिन हो जाता है उसे खरपाक कहते हैं ।। ६२-६३ ।। अथ दग्धपाकस्य निष्प्रयोजनत्वं तथाऽऽमपाकस्य दोषानाह- तदूर्ध्वं दग्धपाकः स्याद्दाहकृन्निष्प्रयोजनः । आमपाकश्च निर्वीर्यो वह्निमान्द्यकरो गुरुः ।। ६४ ।। CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmmu. Digitized by S3 Foundation USA