भारतकोश
भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary

आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा

DevanagariHindipublished1,167 पृष्ठ

पृष्ठ 1029, कुल 1167 में से

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९७८ भावप्रकाशस्य पूर्वखण्डे अथ ताम्रस्य शोधनविधिमाह- पत्तलीकृतपत्राणि ताम्रस्याग्नौ प्रतापयेत् । निषिञ्चेत्तप्ततप्तानि तैले तक्रे च काञ्जिके ।।५५।। गोमूत्रे च कुलत्थानां कषाये च त्रिधा त्रिधा । एवं ताम्रस्य पत्राणां विशुद्धिः संप्रजायते ।। तामे के शोधने की विधि—तामे के पतले-पतले पत्तरों को अग्नि में तपा-तपा कर तेल, तक्र, कांजी, गोमूत्र और कुलथी के क्वाथ में क्रम से प्रत्येक में तीन-तीन बार बुझावे, ऐसा करने से तामे के पत्तरों की शुद्धि हो जाती है ।।५५-५६।। अथ ताम्रगतं दोषाष्टकमाह- एको दोषो विषे ताम्र त्वशुद्धेऽष्टौ भ्रमो वमिः । विरेकःस्वेद उत्क्लेदो मूर्च्छा दाहोऽरुचिस्तथा ।।५७।। न विषं विषमत्याहुस्ताम्रन्तु विषमुच्यते । एको दोषो विषे ताम्रे त्वष्टौ दोषाः प्रकीर्त्तिताः ।।५८।। तामे के ८ दोष—विष में तो एक दोष रहता है किन्तु बिना शोधे हुए तामे में (१) भ्रम, (२) वमन, (३) विरेचन, (४) पसीना, (५) उत्क्लेद (जी मचलाना), (६) मूर्च्छा, (७) दाह, (८) अरुचि ये ८ दोष रहते हैं । विद्वान् लोग विष को वस्तुतः विष नहीं कहते हैं किन्तु तामे को विष कहते हैं । क्योंकि विष में एक ही दोष कहा हुआ है किन्तु तामे में ८ दोष कहे हुये हैं ।।५७-५८।। अथ ताम्रस्य मारणविधिमाह- सूक्ष्माणि ताम्रपत्राणि कृत्वा संस्वेदयेद् बुधः । वासरत्रयमम्लेन ततः खल्वे विनिक्षिपेत् ।।५९।। पादांशं सूतकं दत्त्वा याममम्लेन मर्दयेत् । तत उद्धृत्य पत्राणि लेपयेद् द्विगुणेन च ।।६०।। गन्धकेनाम्लघृष्टेन तस्य कुर्याच्च गोलकम् । ततः पिष्ट्वा च मीनाक्षीं चाङ्गेरीं वा पुनर्नवाम् ।।६१।। तामे के मारने की विधि—प्रथम तामे के पतले-पतले पत्तरों का दो दिन तक अम्लपदार्थ (नींबू आदि) के रस के स्वेदन करे या उसी रस में उन्हें भिगो दे, उसके बाद उन पत्तरों को खरल में रख कर उसमें पत्तरों के चौथे भाग के बराबर पारा तथा ऊपर से अम्लपदार्थ (नींबू आदि) का रस डाल कर एक प्रहर तक खूबघोटें, फिर उन पत्तरों पर अम्लपदार्थ (नींबू आदि) के रस में घिसे हुए पत्तरों से दुगुने गन्धक का प्रलेप करके सभों का एक गोला बना ले । उसके बाद मछेछी, चाङ्गेरी और पुनर्नवा को पीस कर कल्क (चटनी) बना ले ।।५९-६१।। ❖ चाङ्गेरी=चतुष्पत्राम्ला लोणिकाभेदः ।।६१।। यहाँ ‘चांगेरी’ से ‘चार पत्तों वाली तथा खट्टी नोनिया के भेद की एक बूटी’ का ग्रहण करना चाहिये ।।५९-६१।। तत्कल्केन बहिर्गोलं लेपयेद्द्व्यङ्गुलोन्मितम् । धृत्वा तद् गोलकं भाण्डे शरावेण च रोधयेत् ।।६२।। बालुकाभिः प्रपूर्याथ विभूतिलवणाम्बुभिः । दत्त्वा भाण्डमुखे मुद्रां ततश्चुल्ल्यां विपाचयेत् ।।६३।। क्रमवृद्ध्याऽग्निना सम्यग् यावद्यामचतुष्टयम् । स्वाङ्गशीतं समुद्धृत्य मर्दयेच्छूरणद्रवैः ।।६४।। यामैकं गोलकं तञ्च निक्षेपेच्छूरणोदरे । मृदा लेपस्तु कर्त्तव्यः सर्वतोऽङ्गुष्ठमात्रकः ।।६५।। पाच्यं गजपुटे क्षिप्तं मृतं भवति निश्चितम् ।।६६।। वमनं च विरेकं च भ्रमं क्लममथारुचिम् । विदाहं स्वेदमुत्क्लेदं न करोति कदाचन ।।६७।। फिर उसी कल्क से पूर्वोक्त गोले के ऊपर दो अंगुल मोटा लेप चढ़ा कर उसे एक पात्र के अन्दर रख कर ऊपर से बालू भर कर पात्र का मुख एक शराव (कोसा) से ढक दे और राख तथा नमक को जल से सान कर उसी से सन्धियों को बन्द करके उक्त पात्र को चूल्हे पर रख कर उसके नीचे क्रम-क्रम से आँच को तेज करते हुए ४ प्रहर (१२ घंटे) तक पकावे, उसके बाद जब स्वयं शीतल हो जाय तब उक्त तामे के गोले को निकाल कर एक प्रहर तक सूरन के रस में खरल करे पश्चात् सूरन के एक बड़े कन्द के अन्दर गड्ढा बना कर उसी के अन्दर खरल किये हुये तामे के पत्तरों को

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