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भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary

आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा

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अथ तृतीयं धातुवादिशोधनमारणविधिप्रकरणम् ९७७ अथ रजतस्य मारणविधिमाह— भागैकं तालकं मर्द्यं याममम्लेन केनचित्। तेन भागत्रयं तारपत्राणि परिलेपयेत् ।।४८।। क्षप्त्वा मूषापुटे रुद्ध्वा पुटेत्त्रिंशद्वनोपलैः। समुद्धृत्य पुनस्तालं दत्त्वा रुद्ध्वा पुटे पचेत्। एवं चतुर्दशपुटैस्तारं भस्म प्रजायते ।।४९।। चाँदी मारने की विधि—प्रथम एक भाग तबकिया हरताल लेकर उसे एक प्रहर (३ घण्टे) तक किसी भी अम्ल पदार्थ (नींबू आदि) के रस में खरल करे, तत्पश्चात् शुद्ध किये हुये तीन भाग चाँदी के पत्तरों को लेकर उन पर पूर्वोक्त खरल किये हुए हरताल का अच्छी तरह लेप चढ़ा कर मूषा (घरिया) के संपुट के अन्दर रख कर कपड़मिट्टी से सन्धियों को खूब बन्द करके और सुखा कर ३० गोइठे (बिनुआ कण्डे) की आग में रखकर पुट देवे (पकाये), जब शीतल हो जाय तब निकाल कर पुनः हरताल का प्रलेप कर मूषा के अन्दर रख कर पूर्वोक्त रीति से पुट देवे। इसी भाँति १४ बार पुट देने से चाँदी भस्म हो जाती है ।।४८-४९।। अथ रजतमारणस्यापरं विधिमाह— स्नुहीक्षीरेण सम्पिष्टं माक्षिकं तेन लेपयेत् ।।५०।। तालकस्य प्रकारेण तारपत्राणि बुद्धिमान्। पुटेच्चतुर्दशपुटैस्तारं भस्म प्रजायते ।।५१।। चांदी मारने की दूसरी विधि—बुद्धिमान् वैद्य पूर्वोक्त वैद्य पूर्वोक्त हरताल की भाँति एकप्रहर (३ घण्टे) तक थूहर के दूध के साथ सोनामाखी या रूपामाखी एक भाग लेकर खरल करके ३ भाग चाँदी के पत्तरों को लेकर उसी के ऊपर उक्त सोनामाखी या रूपामाखी का प्रलेप करके मूषा (घरिया) के संपुट के अन्दर रख कर मुख बन्द कर दे और सुखा कर ३० गोइठे की अग्नि में रख कर पकावे जब शीतल हो जाय तब पुनः प्रलेप करके पुट दे इस भाँति १४ पुट देने से चाँदी भस्म हो जाती है ।।५०-५१।। अथ मारितरजतस्य गुणानाह— रौप्यं शीतं कषायं च स्वादुपाकरसं सरम्। वयसः स्थापनं स्निग्धं लेखनं वातपित्तजित् ।। प्रमेहादिकरोगांश्च नाशयत्यचिराद् ध्रुवम् ।।५२।। मारी हुई चाँदी के गुण—मारी हुई चांदी-शीतल, कषाय तथा मधुररसयुक्त, विपाक में मधुररसयुक्त, सारक अवस्था (युवावस्था) को स्थिर रखने वाली, स्निग्ध तथा लेखनगुण-विशिष्ट, वातपित्त नाशक एवं प्रमेहादि रोगों को शीघ्र निश्चित रूप से दूर करने वाली होती है ।।५२।। अथ मारणयोग्यताम्रस्य लक्षणमाह— जपाकुसुमसाङ्काशं स्निग्धं गुरु घनक्षमम्। लोहनागोज्झितं ताम्रं मारणाय प्रशस्यते ।।५३।। मारण के योग्य तामा के लक्षण जपाकुसुम (अढ़ौल के फूल) के समान रक्तवर्ण वाला, स्निग्ध, गुरु (तौल में भारी), घन की चोट को सहने वाला, लौह तथा सीसा के मल से रहित जो तामा होता है वह मारण के योग्य उत्तम होता है ।।५३।। अथायोग्यताम्रस्य लक्षणमाह— कृष्णं रूक्षमतिस्वच्छं श्वेतं चापि घनासहम्। लोहनागयुतं चेति शुल्बं दुष्टं दुष्टं प्रकीर्त्तितम् ।।५४।। मारण के योग्य तामा के लक्षण—काला, रूखा, अतिस्वच्छ, सफेदी लिये हुए, घन की चोट को न सहने वाला, लोह तथा सीसा मिला हुआ जो तामा होता है वह दुष्ट कहलाता है अत एव मारण के लिये अयोग्य होता है ।।५४।। ६५ भाव.I CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA