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भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary

आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा

DevanagariHindipublished1,167 पृष्ठ

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१७६ भावप्रकाशस्य पूर्वखण्डे जाय। इसके बाद ५ प्रहर बीत जाने पर आग बुझा दे और जब हाँड़ी एक दम शीतल हो जाय तब ऊपर की हाँड़ी के पेंदे में उड़कर चिपके हुये उत्तम पारे को निकाल कर अलग कर ले। इसी को यन्त्रविशारद वैद्यों ने 'विद्याधर' नामक यन्त्र कहा है ।।३८-४०।। अथ भूधरयन्त्रमाह- बालुकाभिः समस्ताङ्गं गर्ते मूषां रसान्विताम्। दीप्तोपलैः संवृणुयाद् यन्त्रं भूधरनामकम् ।।४१।। भूधरयन्त्र-प्रथम मूषा (घरिया) के अन्दर पारे को रख कर उसके मुख को अच्छी तरह बन्द कर दे बाद एक गड्ढे के अन्दर बालू भर कर उसी के अन्दर उक्त पारा युक्त मूषा (घरिया) को रख कर ऊपर से गोइठा से खूब ढक दे और आग लगा दे। इसी को 'भूधरयन्त्र' कहते हैं ।।४१।। अथ डमरुयन्त्रमाह- यन्त्रं डमरुसंज्ञं स्यात्तस्थाल्या मुद्रिते मुखे ।।४२।। डमरुयन्त्र-एक हाँड़ी के ऊपर दूसरी हाँड़ी औंधी रख कर दोनों के मुख की सन्धियों को मिट्टी से अच्छी तरह बन्द कर देने से जो डमरू के तरह आकार हो जाता है, उसी को 'डमरुयन्त्र' कहते हैं ।।४१।। अथ मारणयोग्यरजतस्य लक्षणमाह- गुरु स्निग्धं मृदु श्वेतं दाहे छेदे घनक्षमम्। वर्णाढ्यं चन्द्रवत् स्वच्छं तारं नवगुणं शुभम् ।। मारणयोग्य चाँदी के लक्षण-(१) तौल में भारी, (२) स्निग्ध, (३) कोमल, (४) सफेद और (५) तपाने तथा (६) काटने पर भी सफेद, (७) घन की चोट को सहने वाली, (८) वर्णयुक्त (बदरङ्ग नहीं), (९) चन्द्रमा के समान स्वच्छ कान्ति वाली इन ९ गुणों से युक्त जो चाँदी होती है वही अच्छी अत एव मारणयोग्य होती है ।।४३।। अथायोग्यरजतस्य लक्षणमाह- कठिनं कृत्रिमं रूक्षं रक्तं पीतदलं लघु। दाहच्छेदघनैर्नष्टं रूप्यं दुष्टं प्रकीर्त्तितम् ।।४४।। मारण के अयोग्य चाँदी-कठिन, बनावटी, रूक्षी, लालिमा लिये हुए, पीले दल (जोर) वाली, हलकी, तपाने, काटने तथा घन की चोट से नष्ट हो जाने वाली जो चाँदी होती है वह खराब समझी जाती है अत एव मारण के अयोग्य होती है ।।४४।। अथ रजतस्य शोधनमाह- पत्तलीकृतपत्राणि तारस्याग्नौ प्रतापयेत्। निषिञ्चेत्तप्ततप्तानि तैले तक्रे च काञ्जिके ।।४५।। गोमूत्रे च कुलत्थानां कषाये च त्रिधा त्रिधा। एवं रजत पत्राणां विशुद्धिः संप्रजायते ।।४६।। चाँदी के शोधने की विधि-चाँदी के पतले पतले पत्तरों को आग में अच्छी तरह तपाकर तेल (तिल का तेल) में बुझा दे पुनः तपाकर उसी तेल में बुझावे इसी भाँति तीन बार तेल में पुनः तीन-तीन बार तक्र, कांजी, गोमूत्र तथा कुलथी के क्वाथ में बुझावे। ऐसा करने से उक्त चाँदी के पत्तरों की शुद्धि होती है ।।४५-४६।। अथाशुद्धरजतस्य दोषानाह- रूप्यं त्वशुद्धं प्रकरोति तापं विबन्धकं वीर्यबलक्षये च। देहस्य पुष्टिं हरते तनोति रोगांस्ततः शोधनमस्य कुर्यात् ।।४७।। अशुद्ध चांदी के दोष-अशुद्ध चाँदी-शरीर में ताप तथा मलबन्ध को उत्पन्न करने वाली एवं वीर्य तथा बल का क्षय करने वाली और देह की पुष्टता को हरण करने वाली तथा अनेक प्रकार के रोगों को उत्पन्न करने वाली होती है। अतः इसका शोधन करना चाहिये ।।४७।। CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA