भारतकोश
भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary

आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा

DevanagariHindipublished1,167 पृष्ठ

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अथ तृतीयं धात्वादिशोधनमारणविधिप्रकरणम् ९७५ अथ भाण्डपुटस्य प्रकारमाह- बृहद्भाण्डे तुषैः पूर्णे मध्ये मूषां विधारयेत्। क्षिप्त्वाऽग्निं मुद्रयेद्भाण्डं तद्भाण्डपुटमुच्यते ।। भाण्डपुट का प्रकार-एक किसी बड़े बड़े पात्र में भूसी भर कर उसके मध्य में मूषा (घरिया) रख कर अग्नि लगा दे और पात्र का मुख बन्द कर दे तो वह ‘भाण्डपुट’ कहलाता है ।।३२।। अथ यन्त्रप्रकारानाह- तत्र बालुकायन्त्रमाह- भाण्डे वितस्तिगम्भीरे मध्ये निहितकूपिके। कूपिकाकण्ठपर्यन्तं बालुकाभिश्च पूरिते ।।३३।। भेषजं कूपिकासंस्थं वह्निना यत्र पच्यते। बालुकायन्त्रमेतद्धि यन्त्रं तत्र बुधैः स्मृतम् ।।३४।। बालुकायन्त्र का प्रकार-एक बालिश्त चौड़े तथा गहरे के बीच में काच की कुप्पी (शीशी) रख कर और उसके गले के बराबर उक्त पात्र में बालू भर कर उसके नीचे आग लगा कर यदि उक्त काच की कुप्पी में औषध रख कर पकाया जाय तो उसे ‘बालुकायन्त्र’ कहते हैं ।।३४।। अथ दोलायन्त्रमाह- निबद्धमौषधं सूतं भूर्जे तत्रिगुणे वरे। रसपोटलिकां काष्ठे दृढं बद्ध्वा गुणेन हि ।।३५।। सन्धानपूर्णकुम्भान्तःस्वावलम्बनसन्थितम्। अधस्ताज्ज्वलयेदग्निं तत्तदुक्तक्रमेण हि ।। दोलायन्त्रमिदं प्रोक्तं स्वेदनाख्यं तदेव हि ।।३६।। दोलायन्त्र-पारा या अन्य औषध जिसका स्वेदन करना हो उसे उत्तम भोजपत्र से तीन पर्त करके लपेट कर उसकी पोटली बनाले पश्चात् उस पोटली को किसी लकड़ी में बीचोबीच डोरी से बाँध कर एक हांडी के ऊपर उक्त लकड़ी को इस भाँति रखे कि जिसमें पोटली हांड़ी के आधी दूर तक अन्दर लटकती रहे। उक्त हांड़ी के अन्दर कांजी किसी पदार्थ को इस तरह रख दे कि जिसमें पोटली भींगने न पावे, फिर उक्त हाँडी को चूल्हे पर रखकर नीचे आग लगा दे। उसके भाफ से पोटली के अन्दर स्थित औषध का स्वेदन करे। इसी को ‘दोलायन्त्र’ या ‘स्वेदनयन्त्र’ कहते हैं ।।३५-३६।। अथ स्वेदनयन्त्रमाह- साम्बुस्थालीमुखे बद्धे वस्त्रे स्वेद्यं निधाय च। पिधाय पच्यते तत्र तद् यन्त्रं स्वेदनं स्मृतम् ।।३७।। स्वेदनयन्त्र-एक हांडी में जल भर कर उसके मुख पर वस्त्र बाँध दे तत्पश्चात् जिसका स्वेदन करना हो उस द्रव्य को उसी वस्त्र के ऊपर रखकर हाँड़ी की चूल्हे पर रख नीचे अग्नि जलादे। इस भाँति उक्त द्रव्य का भाफ द्वारा स्वेदन करे। इसे भी ‘स्वेदनयन्त्र’ कहते हैं ।।३७।। अथ विद्याधरयन्त्रमाह- अधःस्थाल्यां रसं क्षिप्त्वा विदध्यात्तन्मुखोपरि। स्थालीमूर्ध्वमुखीं सम्यङ् निरुध्य मृदमृत्स्नया ।।३८।। ऊर्ध्वस्थाल्यां जलं क्षिप्त्वा चुल्ल्यामारोप्य यत्नतः। अधस्ताज्ज्वलयेदग्निं यावत्प्रहरपञ्चकम् ।।३९।। स्वाङ्गशीतं ततो यन्त्राद् गृह्णीयाद्रसमुत्तमम्। विद्याधराभिधं यन्त्रमेतत्तज्ज्ञैरुदाहृतम् ।।४०।। विद्याधर यन्त्र-एक हाँड़ी के भीतर पारा रख कर उसके ऊपर दूसरी हाँड़ी इस तरह रख दे कि जिसमें उसका मुख ऊपर की ओर रहे। पश्चात् मिट्टी से नीचे वाली हाँड़ी के मुख की सन्धियों को खूब यत्नपूर्वक बन्द करके और ऊपर की हाँड़ी में शीतल जल भर कर चूल्हे पर रख दे और उसके नीचे ५ प्रहर (१५ घण्टे) तक आग बराबर जलाता रहे, जब-जब ऊपर की हाँड़ी का जल गरम होता जाय तब तब उसे अलग कर के दूसरा शीतल जल उसके स्थान पर डालता CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammnu. Digitized by S3 Foundation USA