भारतकोश
भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary

आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा

DevanagariHindipublished1,167 पृष्ठ

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९७४ भावप्रकाशस्य पूर्वखण्डे कपड़मिट्टी से खूब दृढ़ बन्द कर सुखा कर उसे उक्त गड्ढे के अन्दर बीच में आधे ५०० गोइठा के ऊपर रख दे बाकी आधे ५०० गोइठा को उसके ऊपर रख कर आग लगा दे। इसी को 'गजपुट' कहते हैं। यह सभी पुटों में उत्तम होता है। हस्तश्चतुर्विंशत्यङ्गुलप्रमाणः स सपादस्तेन त्रिंशदङ्गुलप्रमाणेनेत्यर्थः । अत एवोक्तम्- साधारणनराङ्गुल्या त्रिंशदङ्गुलको गजः ।।२५-२६।। ।। इति गजपुटम् ।। एक हाथ २४ अङ्गुल का अतः सवा हाथ ३० अङ्गुल का होता है। इससे सवा हाथ गहरा तथा सवा हाथ चौड़ा से ३० अंगुल गहरा तथा ३० अंगुल चौड़ा समझा चाहिये। अन्यत्र भी कहा है कि—'गजपुट का मान साधारण मनुष्यों के अङ्गुल से ३० अङ्गुल का होता है' ।।२५-२६।। अथ वाराहकौक्कुटपुटयोः प्रकारमाह- अरत्निमात्रके कुण्डे पुटं वाराहमुच्यते । वितस्तिमात्रके स्वाते कथितं कौक्कुटं पुटम् ।।२७।। वाराह तथा कौक्कुट पुट का प्रकार-एक अरत्निमात्र गहरे तथा चौड़े कुण्ड में जो पुट दिया जाता है उसे 'वाराहपुट' और एक बालिश्त मात्र गहरे तथा चौड़े कुण्ड में जो पुट दिया जाता है उसे 'कौक्कुटपुट' कहते हैं ॥२७॥ ❖ अरत्निस्तु निष्कनिष्ठेन मुष्टिने त्यमरः । निःसृतकनिष्ठया मुष्ट्योपलक्षितो हस्तोऽरत्निरित्यर्थः ।।२७।। यहाँ 'अरन्ति' पद का अरत्निस्तु' इत्यादि 'अमरकोश' के प्रमाण से मुठ्ठी बाध कर कनिष्ठा (कानी) अंगुली को सीधी खुली रखने पर जो नापने में एक हाथ होता है उसी का नाम 'अरग्नि' है अतः 'अरत्निमात्र' अर्थात् अरत्नि से उपलक्षित एक हाथ मात्र अर्थ समझना चाहिये। करीब २१ अंगुल के अरत्नि से उपलक्षित हाथ होता है ॥२७॥ अथ प्रकारान्तरेण पुनः कौक्कुटपुटस्य प्रकारमाह- षोडशाङ्गुलके खाते कस्यचित्कौक्कुटं पुटम् ।।२८।। प्रकारान्तर से पुनः कौक्कुटपुट का प्रकार-किसी-किसी के मत से १६ अंगुल गहरे तथा चौड़े गड्ढे का 'कौक्कुटपुट' होता है ।।२८।। अथ कपोतपुटप्रकारमाह- यत्पुटं दीयते खाते ह्यष्टसंख्यैर्वनोपलैः। कपोतपुटमेतत्तु कथितं पुटपण्डितैः ।।२९।। कपोतपुट का प्रकार-जिस गड्ढे में केवल ८ गोइठे से ही पुट दिया जा सके उसे 'कपोतपुट' क्रहते हैं ।।२९।। अथ गोबरस्य लक्षणमाह- गोष्ठान्तर्गोखुरक्षुण्णं शुष्कं चूर्णितगोमयम् । गोधरं तत्समाख्यातं वरिष्ठं रससाधने ।।३०।। गोबर का लक्षण-गोशाला के अन्दर गौओं के खुरों से खुना हुआ सूखा जो गोबर का चूर्ण होता है उसी को 'गोबर' कहते हैं। यह रस (पारा) के सिद्ध करने में उत्तम् होता है ॥३०॥ अथ गोबरपुटप्रकारमाह- बृहद्भाण्डस्थितर्यत्र गोबरैर्दीयते पुटम् । तद् गोबरपुटं प्रोक्तं भिषग्भिः सूतभस्मनि ।।३१।। गोबर के पुट का प्रकार-किसी बड़े बर्तन में उक्त गोबर को रख कर जो पुट दिया जाता है, उसे 'गोबरपुट' कहते हैं। वैद्य लोग इस पुट को पारा भस्म करने के समय काम में लाते हैं ॥३१॥ CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmmu. Digitized by S3 Foundation USA