भारतकोश
भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary

आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा

DevanagariHindipublished1,167 पृष्ठ

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अथ तृतीयं धातुवादिशोधनमारणविधिप्रकरणम् ९७३ मारे हुये सोने का गुण—मारा हुआ सोना शीतल, कामी पुरुषों के लिये हितकर, बलकारक' गुरु, रसायन, मधुर, तिक्त तथा कषायरसयुक्त, विपाक में मधुररसयुक्त, पिच्छिल, पवित्र, बृंहण (रस-रक्तादिवर्धक), नेत्र के लिये हितकर, मेधा (धारणशक्ति), स्मृति (स्मरणशक्ति) तथा बुद्धि को बढ़ाने वाला, हृदय के लिये हितकर, आयुवर्धक, कान्ति, वाणी की शुद्धता (इकलापन आदि दोषों का दूर होना), स्थिरताकारक, एवं दोनो प्रकार के विष (स्थावर तथा जंगम), क्षय, उन्माद (पागलपन), त्रिदोष, ज्वर तथा शोष को दूर करने वाला होता है ॥१८-१९॥ ❖ वृष्यं=वृषाय कामुकाय हितम् ॥१८-१९॥ यहाँ 'वृष्यम्' पद का 'कामी पुरुषों के लिये हितकर' यह अर्थ समझना चाहिये ॥ अथासम्यङ्मारितसुवर्णस्य दोषानाह- असम्यङ्मारितं स्वर्णं बलं वीर्यं च नाशयेत् । करोति रोगान् मृत्युं च तद्धन्याद् यत्नतस्ततः ॥२०॥ अच्छी तरह से नहीं मारे हुए सोने के दोष—अच्छी तरह से नहीं मारा हुआ सोना-सेवन करने से बल तथा वीर्य को नष्ट करनेवाला, रोगों को उत्पन्न करने वाला एवं मृत्यु को देने वाला होता है। अतः यत्नपूर्वक (सावधानी से) सोने का मारण करना चाहिये ॥२०॥ अथ धातुवादिमारणोपयुक्तान् पुट प्रकारानाह, रसप्रदीपे- तत्र महापुटस्य प्रकारमाह- लोहादेरन्पुर्नभवस्तद्गुणत्वं गुणाढ्यता । सलिले तरणं चापि तत्सिद्धिः पुटनाद्भवेत् ॥२१॥ गम्भीरे विस्तृते कुण्डे द्विहस्ते चतुरस्रके । वनोपलसहस्रेण पूरिते पुटनौषधम् ॥२२॥ कोष्ठे रुद्धं प्रयत्नेन गोविष्ठोपरि धारयेत् । वनोपलसहस्रार्द्ध कोष्ठिकोपरि निक्षिपेत् ॥२३॥ वह्नि विनिक्षिपेत्तत्र महापुटमिति स्मृतम् ॥२४॥ महापुट का प्रकार—पुट के द्वारा लोहादि सम्पूर्ण धातु अच्छी तरह से भस्म किये जाने पर वे सब (धातु) फिर जीवित नहीं होते अर्थात् पुनः अपनी पूर्वावस्था को नहीं प्राप्त होते तथा पुटपाक-जनित सम्पूर्ण गुणों को प्राप्त करते हैं एवं अधिक गुणकारी होते हैं और जल में डालने पर तैरने लग जाते हैं । तथा यथोक्त कार्य सिद्ध करने वाले होते हैं । महापुटप्रकार—दो हाथ गहरा तथा दो हाथ चौड़ा, चौकोर गड्डा बना कर उसके अन्दर एक हजार गोइठा (बिनुबा कण्डा) सजा कर रख दे, उसके बाद जिसका पुट देना हो उस औषध (धातु) की मिट्टी के मूषा के अन्दर रखकर कपड़मिट्टी से उसका मुख अच्छी तरह से बन्द कर तथा सुखाकर गोबर के ऊपर रखकर कुण्ड के बीच में रख दे और ऊपर पांच सौ गोइठा (बिनुआ कण्डा) पुनः रखकर आग लगा दे । इसी को 'महापुट' कहते हैं ॥२१-२४॥ ❖ कोष्ठं=मृन्मूषा । गोविष्ठा='गोबर' इति लोके ॥२१-२४॥ यहाँ 'कोष्ठ' पद का 'मिट्टी का मूषा' तथा 'गोविष्ठा' पद का 'गोबर' अर्थ समझना चाहिये ॥ अथ गजपुटस्य प्रकारमाह- सपादहस्तमानेन कुण्डे निम्ने तथाऽऽयते । वनोपलसहस्रेण पूर्णे मध्ये विधारयेत् ॥२५॥ पुटनद्रव्यसंयुक्तां कोष्ठिकां मुद्रितां मुखे । अधोऽर्धानि करण्डानि अर्धान्युपरि निक्षिपेत् ॥ एतद्गजपुटं प्रोक्तं ख्यातं सर्वपुटोत्तमम् ॥२६॥ गजपुट का प्रकार—सवा हाथ गहरा तथा सवा हाथ चौड़ा चौकोर गड्ढा बनाकर उसमें १००० गोइठा (बिनुआ कण्डा) भरना चाहिये तत्पश्चात् जिसका पुट देना हो उस द्रव्य (धातु) को मिट्टी के मूषा के अन्दर भर कर उसका मुख CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA