भारतकोश
भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary

आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा

DevanagariHindipublished1,167 पृष्ठ

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पृष्ठ 1023

१७२ भावप्रकाशस्य पूर्वखण्डे गोइठा की अग्नि के अन्दर रखकर पुट दे जब अग्नि शान्त हो जाय तब पुनः पूर्वोक्त रीति से ३० गोइठे की अग्नि में पुट दे। इस भाँति सात बार पुट देने से ही सोना का निरुत्थ भस्म तैयार हो जाता है ।।८-१०।। ❖ अत्रापि पूर्ववद्गन्धः प्रदातव्यः ।।८-१०।। यहाँ भी पूर्ववत् गन्धक का चूर्ण प्रत्येक पुट में देना चाहिये ।।८-१०।। अथ सुवर्णमारणस्य तृतीयं विधिमाह- काञ्चनाररसैर्घृष्ट्वा समसूतकगन्धयोः । कज्जलीं हेमपत्राणि लेपयेत्समया तथा ।।९१।। काञ्चनारत्वचः कल्कैर्मूषायुग्मं प्रकल्पयेत् । धृत्वा तत्संपुटे गोलं मृण्मूषासम्पुटे च तत् ।।९२।। निधाय सन्धिरोधं च कृत्वा संशोष्य गोलकम् । वह्नि खरतरं कुर्यादेवं दत्त्वा पुटत्रयम् ।।९३।। निरुत्थं जायते भस्म सर्वकर्मसु योजयेत् । काञ्चनारप्रकारेण लाङ्गली हन्ति काञ्चनम् ।।९४।। सुवर्णमारण की तीसरी विधि-प्रथम पारा और गन्धक को समान भाग लेकर दोनों को लाल कचनार के रस से खूब घोंट कर कज्जली बना ले, तत्पश्चात् सोने के पतले-पतले पत्रों के बराबर तौल की कज्जली से उन सबों के नीचे ऊपर लेप कर दे और लाल कचनार के छिल्कों को पीसकर उस की दो मूषा (सोने के पत्र रखने की घरिया) बनाकर उसके संपुट के अन्दर पूर्वोक्त सोने के पतले-पतले पत्रों के गोले को रख कर और गोले सहित उस संपुट को दूसरी मिट्टी की बनी हुई मूषा (घरिया) के संपुट के अन्दर रख कर उसका मुख कपड़मिट्टी से खूब बन्द कर सुखा ले तत्पश्चात् अत्यन्त तीव्र अग्नि में रख कर पुट दे दे, इस भाँति तीन ही पुट देने से सोने का निरुत्थ भस्म तैयार हो जाता है। यह भस्म सभी रोगों पर देने योग्य होता है। यहाँ लाल कचनार के स्थान पर 'कलिहारी' का भी प्रयोग उक्त रीति से करने पर सोने का निरुत्थ भस्म तैयार होता है ।।९१-९४।। ❖ तया समया=हेमपत्रसमया, लाङ्गली=कलिहारी ।।९१-९४।। यहाँ 'तया समया' पदों का 'सोने के पतले-पतले पत्रों के बराबर तौल की कज्जली से, तथा 'लाङ्गली' पद का 'कलिहारी' अर्थ समझना चाहिये ।।९१-९४।। ज्वालामुखी तथा हन्याद् यथा हन्ति मनःशिला ।।९५।। जिस प्रकार मैनशिल के कल्क के अन्दर सोने का पत्र रख कर पूर्वोक्त रीति से पुट देने से सोने का निरुत्थ भस्म तैयार होता है उसी प्रकार से हुरहुर के कल्क के अन्दर भी रख कर पुट देने से निरुत्थ भस्म तैयार होता है ।।९५।। अथ सुवर्णमारणस्य चतुर्थ विधिमाह- शिलासिन्दूरयोश्चूर्णं समयोर्कदुग्धकैः । सप्तधा भावनां दद्याच्छोषयेच्च पुनः पुनः ।।९६।। ततस्तु गलिते हेम्नि कल्कोऽयं दीयते समः । पुनर्धमेदतितरां यथा कल्को विलीयते ।। एवं वेलात्रयं दद्यात्कल्कं हेममृतिर्भवेत् ।।९७।। सुवर्णमारण की चौथी विधि-मैनशिल तथा सिन्दूर का समभाग चूर्ण लेकर उसमें आक के दूध की सात बार भावना देकर (भिगोकर) सुखावे। फिर उसका कल्क बनाकर सोने को गलाकर उसी में उस कल्क को सोने के बराबर तौल में लेकर डाल दे पश्चात् धौंकनी से कल्कमिश्रित सुवर्ण को खूब आँच दे, जब कल्क जल जाय तब पुनः कल्क देकर धौंके इस प्रकार तीन बार कल्क डालकर धौंकाने से सोने का मारण हो जाता है ।।९६-९७।। अथ मारितसुवर्णस्य गुणानाह- सुवर्णं शीतलं वृष्यं बल्यं गुरु रसायनम् । स्वादु तिक्तं च तुवरं पाके च स्वादु पिच्छिलम् ।।९८।। पवित्रं बृंहणं नेत्र्यं मेधास्मृतिमतिप्रदम् । हृद्यामायुष्करं कान्तिवाग्विश्शुद्धिस्थिरत्वकृत् । विषद्वयक्षयोन्मादत्रिदोषज्वरशोषजित् ।।९९।।