भारतकोश
भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary

आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा

DevanagariHindipublished1,167 पृष्ठ

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अथ तृतीयं धातुवादिशोधनमारणविधिप्रकरणम् १७१ अथाशुद्धसुवर्णस्य दोषानाह- बलं सवीर्य्यं हरते नराणां रोगव्रजं पोषयतीह काये। असौख्यकार्येव सदा सुवर्णमशुद्धमेतन्मरणञ्च कुर्यात् ॥५॥ अशुद्ध सुवर्ण के दोष-बिना शोधा हुआ सोना सेवन करने से मनुष्यों के बल तथा वीर्य को हर लेता है, तथा शरीर में अनेक प्रकार के रोगों को बढ़ाता है और सदा दुखदायी होकर अन्त में मृत्यु भी कर देता है॥५॥ अथ सुवर्णस्य मारणविधिमाह- स्वर्णस्य द्विगुणं सूतमम्लेन सह मर्दयेत्। तद्गोलकसमं गन्धं निदध्यादधरोत्तरम् ॥६॥ सुवर्ण के मारण की विधि-अत्यन्त पतले-पतले सोने के टुकड़ों के दूना पारा लेकर उसमें उन टुकड़ों को मिला कर अम्ल पदार्थ नींबू आदि के रस के साथ खूब मर्दन करे तत्पश्चात् सबों का गोला बनाकर तौल में उसी के बराबर गन्धक का चूर्ण लेकर उस गोले के नीचे, ऊपर, चारो तरफ लपेट दे ॥६॥ स्वर्णस्य-अतितनूकृतपत्रस्य। गन्धं=गन्धकचूर्णम् ॥६॥ यहाँ 'स्वर्णस्य' पद का 'अत्यन्त पतले-पतले सोने के टुकड़ों के' तथा 'गन्धम्' पद का 'गन्धक का चूर्ण' यह अर्थ समझना चाहिये ॥६॥ मोलकञ्च ततो रुद्ध्वा शरावदृढ़सम्पुटे। त्रिंशद्गोपलैर्दद्यात्पुटान्येवं चतुर्दश ।। निरुत्थं जायते भस्म गन्धो देयः पुनः पुनः ॥७॥ इसके बाद शराव (गोला रखने की घरिया) में भी गन्धक का चूर्ण बिछा कर उसके ऊपर उक्त गोला को रख कर ऊपर से दूसरा शराव औंधा कर रख दे और कपड़ा (रुई) डाल कर खूब कुटी हुई चिकनी मिट्टी से दोनों का मुख बन्द करके सुखा ले पश्चात् उसे ३० गोइठे की आग के अन्दर बीचोबीच में रखकर १४ पुट दे अर्थात् प्रथम बार जब अग्नि शान्त हो जाय तब सम्पुटित शराव को निकाल कर पुनः उसका मुख खोल कर उसके अन्दर गन्धक का चूर्ण बिछा कर पुनः कपड़मिट्टी से मुख बन्द कर तथा सुखा कर ३० गोइठे की अग्नि में पुनः पुट दे, इसी भाँति १४ बार पुट दे। जब दूसरा पुट आरम्भ करे तब गन्धक का चूर्ण बराबर रखता जाय। इस प्रकार से १४ पुट देने से सोना का जो भस्म तैयार होता है वह निरुत्थ (पुनः जीवित नहीं होने वाला) होता है अर्थात् घी, सुहाना आदि मित्रपञ्चक के योग से भी पुनः अपने पूर्ववत् आकार को नहीं प्राप्त होने वाला होता है ॥७॥ ❖ रुद्ध्वा=सवस्त्रकुट्टितचिक्कणमृत्तिकया। वनोपलः 'गोइठा' इतिलोके। निरुत्थं=यत्पुनर्नजीवति ॥७॥ यहाँ 'रुद्ध्वा' पद का 'कपड़ा (रुई) डाल कर खूब कुटी हुई चिकनी मिट्टी से दोनों शरावों का मुख बन्द करके' तथा 'वनोपल' पद का 'गोइठा' और 'निरुत्थ' पद का 'पुनः जीवित नहीं होने वाला' यह अर्थ समझना चाहिये ॥७॥ अथ सुवर्णमारणस्य द्वितीयं विधिमाह- काञ्चने गलिते नागं षोडशांशेन निक्षिपेत्। चूर्णयित्वा तथाम्लेन घृष्ट्वा कृत्वा तु गोलकम् ।। गोलकेन समं गन्धं दत्त्वा चैवाधरोत्तरम् ॥९॥ शरावसम्पुटे धृत्वा पुटेत् त्रिंशद्गोपलैः। एवं सप्तपुटैर्हेम निरुत्थं भस्म जायते ।।१०।। सुवर्णमारण की दूसरी विधि-प्रथम सुवर्ण को गला कर उसके सोलहवें हिस्से के बराबर नाग (सीसा) लेकर उसमें छोड़ दे पश्चात् सबों का चूर्ण करके उसमें अम्ल पदार्थ नींबू आदि का रस डाल कर खूब मर्दन करके एक गोला बना डाले और गोले के तौल के बराबर गन्धक का चूर्ण लेकर पूर्वोक्त रीति से नीचे-ऊपर, चारो तरफ लपेट कर तथा शराव में भी रखकर ऊपर से गोले को रख शराव को संपुटित कर कपड़मिट्टी से मुख बन्द कर धूप में सुखाकर ३०