भारतकोश
भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary

आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा

DevanagariHindipublished1,167 पृष्ठ

पृष्ठ 1021, कुल 1167 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 1021

१७० भावप्रकाशस्य पूर्वखण्डे अथ तुषोदकसौवीरारनालकाञ्जिकशिण्डाकीलक्षणान्याह- तुषाम्बु सन्थितं ज्ञेयमामैर्विदालतैर्यवैः । यवैस्तु निस्तुषैः पक्वैः सौवीरं साधितं भवेत् ।।७७।। आरनालन्तु गोधूमैरामैः स्यान्निस्तुषीकृतैः । पक्वैर्वा संहितं तत्तु सौवीरसदृशं गुणैः ।।७८।। कुल्माषधान्यमण्डादिसहितं काञ्जिकं विदुः । शिण्डाकी संहिता ज्ञेया मूलकैः सर्षपादिभिः ।। तुषोदक, सौवीर, आरनाल, काञ्जिक (कांजी) तथा शिण्डाकी के लक्षण—कच्चे, तुष (भूसी) सहित जौ की दलिया का जो सन्धान किया जाय तो ‘वह ‘तुषाम्बु’ और बिना भूसी के पकाये हुये जौ का जो सन्धान किया जाता है वह ‘सौवीर’ कहलाता है। बिना भूसी के कच्चे या पक्के गेहूँ का जो सन्धान किया जाता है वह ‘आरनाल’ कहलाता है और वह गुणों में सौवीर के समान होता है। कुल्माष (घुघु