भारतकोश
भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary

आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा

DevanagariHindipublished1,167 पृष्ठ

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पृष्ठ 1020

अथ द्वितीयं भेषजविधानप्रकरणम्. ९६१ अथ द्विविधसीधुमाह- ज्ञेयः शीतरसः सीधुरपक्वमधुरद्रवः । सिद्धः पक्वरसः सीधुः सम्पक्वमधुरद्रवैः ॥७०॥ सीधु के दो प्रकार-बिना पकाये हुये ऊख के रस आदि मधुर द्रव पदार्थों से बने हुये मद्य विशेष को 'शीतरस सीधु' और पकाये हुए ऊख के रस आदि मधुर द्रव पदार्थों से बने हुये मद्य विशेष को 'पक्वरस सीधु' कहते हैं ॥७०॥ ❖ मधुरद्रवैः=इक्षुरसादिभिः ।।७०।। यहाँ 'मधुरद्रव' पद से 'ऊख का रस आदि मधुर द्रव पदार्थों' का ग्रहण करना चाहिये ॥७०॥ अथ सुरां सुराजातिं चाह- परिपक्वान्नसंधानात्समुत्पन्नां सुरां जगुः । सुरामण्डः प्रसन्ना स्यात्ततः कादम्बरी घना ।।७१।। तदधो जगलो ज्ञेयो मेदको जगलाद्धनः । वक्कसो हतसारः स्यात्सुराबीजंतु किण्वकम् ॥७२॥ सुरा तथा सुरा की जातियां-पकाये हुए अन्न का सन्धान करने से जो मद्यविशेष बनता है उसे 'सुरा', सुरा के ऊपर के पतले द्रव भाग को 'प्रसन्ना', उससे किञ्चित् घन (गाढ़े भाग को 'कादम्बरी' तथा उससे अधिक घन भाग को 'जगल', जगल से भी अधिक घन भाग अर्थात् सबसे नीचे के भाग को 'भेदक', सारभाग निकाल लेने पर बची हुई सीठी को 'बक्कस' और सुरा के बीज को 'किण्डव' कहते हैं ॥७१-७२॥ ❖ सुराबीजं=यवगोधूममण्डुलादि ।।७१-७२।। यहाँ 'सुरा के बीज' से जौ, गेहूँ, चावल आदि का बोध करना चाहिये क्योंकि इन्हीं से सुरा बनाई जाती है अतः सुरा के नीचे स्थित इन पदार्थों को 'सुराबीज' कहते हैं ॥७१-७२॥ अथ वारुणीमाह- यत्तालखर्जूररसैः सन्धिता सा हि वारुणी ॥७३॥ वारुणी-ताड़ तथा खजूर के रस का सन्धान करके जो मद्यविशेष बनता है उसे 'वारुणी' कहते हैं ॥७३॥ अथ शुक्तलक्षणमा- कन्दमूलफलादीनि सस्नेहलवणानि च । यत्र द्रवेऽभिषूयन्ते तच्छुक्तमभिधीयते ।।७४।। शुक्त का लक्षण-जिस द्रव पदार्थ में तेल तथा नमक के साथ कन्द, मूल तथा फलादि को डुबोकर उसका संधान करते हैं उसे 'शुक्त' कहते हैं ॥७४॥ ❖ अभिषूयन्ते=द्रवेणाप्लावय सन्धीयते ।।७४।। यहाँ 'अभिषूयन्ते' पद का 'द्रव पदार्थ में डुबोकर सन्धान करते हैं' यह अर्थ समझना चाहिये ॥७४॥ अथ चुक्रलक्षणमाह- विनष्टमम्लतां यातं मद्यं वा मधुरद्रवः । विनष्टः सन्धितो यस्तु तच्चुक्रमभिधीयते ।।७५।। गुड़ाम्बुना सतैलेन कन्दशाकफलैस्तथा। संधितं चाम्लतां यातं गुडचुक्रं प्रचक्ष्यते ।। एवमेव हि शुक्तं स्यान्मृद्वीकासम्भवं तथा ।।७६।। चुक्र का लक्षण-जो मद्य बिगड़ कर खट्टा हो जाय उसे और बिगड़ जाने पर जिसका सन्धान किया जाय उस मधुर द्रव (ऊख के रस आदि) पदार्थ को भी 'चुक्र' कहते हैं। गुड़ का जल (गुड़मिश्रित जल), तेल तथा कन्द, शाक और फल इन सबों का सन्धान करने पर जब खट्टा हो जाय तब उसे 'गुडचुक्र' कहते हैं। इसी प्रकार दाख का भी शुक्त बनाया जाता है ॥७५-७६॥