भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)
Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary
आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा
अथ तृतीयं धातुवादिशोधनमारणविधिप्रकरणम् ९७३ मारे हुये सोने का गुण—मारा हुआ सोना शीतल, कामी पुरुषों के लिये हितकर, बलकारक' गुरु, रसायन, मधुर, तिक्त तथा कषायरसयुक्त, विपाक में मधुररसयुक्त, पिच्छिल, पवित्र, बृंहण (रस-रक्तादिवर्धक), नेत्र के लिये हितकर, मेधा (धारणशक्ति), स्मृति (स्मरणशक्ति) तथा बुद्धि को बढ़ाने वाला, हृदय के लिये हितकर, आयुवर्धक, कान्ति, वाणी की शुद्धता (इकलापन आदि दोषों का दूर होना), स्थिरताकारक, एवं दोनो प्रकार के विष (स्थावर तथा जंगम), क्षय, उन्माद (पागलपन), त्रिदोष, ज्वर तथा शोष को दूर करने वाला होता है ॥१८-१९॥ ❖ वृष्यं=वृषाय कामुकाय हितम् ॥१८-१९॥ यहाँ 'वृष्यम्' पद का 'कामी पुरुषों के लिये हितकर' यह अर्थ समझना चाहिये ॥ अथासम्यङ्मारितसुवर्णस्य दोषानाह- असम्यङ्मारितं स्वर्णं बलं वीर्यं च नाशयेत् । करोति रोगान् मृत्युं च तद्धन्याद् यत्नतस्ततः ॥२०॥ अच्छी तरह से नहीं मारे हुए सोने के दोष—अच्छी तरह से नहीं मारा हुआ सोना-सेवन करने से बल तथा वीर्य को नष्ट करनेवाला, रोगों को उत्पन्न करने वाला एवं मृत्यु को देने वाला होता है। अतः यत्नपूर्वक (सावधानी से) सोने का मारण करना चाहिये ॥२०॥ अथ धातुवादिमारणोपयुक्तान् पुट प्रकारानाह, रसप्रदीपे- तत्र महापुटस्य प्रकारमाह- लोहादेरन्पुर्नभवस्तद्गुणत्वं गुणाढ्यता । सलिले तरणं चापि तत्सिद्धिः पुटनाद्भवेत् ॥२१॥ गम्भीरे विस्तृते कुण्डे द्विहस्ते चतुरस्रके । वनोपलसहस्रेण पूरिते पुटनौषधम् ॥२२॥ कोष्ठे रुद्धं प्रयत्नेन गोविष्ठोपरि धारयेत् । वनोपलसहस्रार्द्ध कोष्ठिकोपरि निक्षिपेत् ॥२३॥ वह्नि विनिक्षिपेत्तत्र महापुटमिति स्मृतम् ॥२४॥ महापुट का प्रकार—पुट के द्वारा लोहादि सम्पूर्ण धातु अच्छी तरह से भस्म किये जाने पर वे सब (धातु) फिर जीवित नहीं होते अर्थात् पुनः अपनी पूर्वावस्था को नहीं प्राप्त होते तथा पुटपाक-जनित सम्पूर्ण गुणों को प्राप्त करते हैं एवं अधिक गुणकारी होते हैं और जल में डालने पर तैरने लग जाते हैं । तथा यथोक्त कार्य सिद्ध करने वाले होते हैं । महापुटप्रकार—दो हाथ गहरा तथा दो हाथ चौड़ा, चौकोर गड्डा बना कर उसके अन्दर एक हजार गोइठा (बिनुबा कण्डा) सजा कर रख दे, उसके बाद जिसका पुट देना हो उस औषध (धातु) की मिट्टी के मूषा के अन्दर रखकर कपड़मिट्टी से उसका मुख अच्छी तरह से बन्द कर तथा सुखाकर गोबर के ऊपर रखकर कुण्ड के बीच में रख दे और ऊपर पांच सौ गोइठा (बिनुआ कण्डा) पुनः रखकर आग लगा दे । इसी को 'महापुट' कहते हैं ॥२१-२४॥ ❖ कोष्ठं=मृन्मूषा । गोविष्ठा='गोबर' इति लोके ॥२१-२४॥ यहाँ 'कोष्ठ' पद का 'मिट्टी का मूषा' तथा 'गोविष्ठा' पद का 'गोबर' अर्थ समझना चाहिये ॥ अथ गजपुटस्य प्रकारमाह- सपादहस्तमानेन कुण्डे निम्ने तथाऽऽयते । वनोपलसहस्रेण पूर्णे मध्ये विधारयेत् ॥२५॥ पुटनद्रव्यसंयुक्तां कोष्ठिकां मुद्रितां मुखे । अधोऽर्धानि करण्डानि अर्धान्युपरि निक्षिपेत् ॥ एतद्गजपुटं प्रोक्तं ख्यातं सर्वपुटोत्तमम् ॥२६॥ गजपुट का प्रकार—सवा हाथ गहरा तथा सवा हाथ चौड़ा चौकोर गड्ढा बनाकर उसमें १००० गोइठा (बिनुआ कण्डा) भरना चाहिये तत्पश्चात् जिसका पुट देना हो उस द्रव्य (धातु) को मिट्टी के मूषा के अन्दर भर कर उसका मुख CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA
९७४ भावप्रकाशस्य पूर्वखण्डे कपड़मिट्टी से खूब दृढ़ बन्द कर सुखा कर उसे उक्त गड्ढे के अन्दर बीच में आधे ५०० गोइठा के ऊपर रख दे बाकी आधे ५०० गोइठा को उसके ऊपर रख कर आग लगा दे। इसी को 'गजपुट' कहते हैं। यह सभी पुटों में उत्तम होता है। हस्तश्चतुर्विंशत्यङ्गुलप्रमाणः स सपादस्तेन त्रिंशदङ्गुलप्रमाणेनेत्यर्थः । अत एवोक्तम्- साधारणनराङ्गुल्या त्रिंशदङ्गुलको गजः ।।२५-२६।। ।। इति गजपुटम् ।। एक हाथ २४ अङ्गुल का अतः सवा हाथ ३० अङ्गुल का होता है। इससे सवा हाथ गहरा तथा सवा हाथ चौड़ा से ३० अंगुल गहरा तथा ३० अंगुल चौड़ा समझा चाहिये। अन्यत्र भी कहा है कि—'गजपुट का मान साधारण मनुष्यों के अङ्गुल से ३० अङ्गुल का होता है' ।।२५-२६।। अथ वाराहकौक्कुटपुटयोः प्रकारमाह- अरत्निमात्रके कुण्डे पुटं वाराहमुच्यते । वितस्तिमात्रके स्वाते कथितं कौक्कुटं पुटम् ।।२७।। वाराह तथा कौक्कुट पुट का प्रकार-एक अरत्निमात्र गहरे तथा चौड़े कुण्ड में जो पुट दिया जाता है उसे 'वाराहपुट' और एक बालिश्त मात्र गहरे तथा चौड़े कुण्ड में जो पुट दिया जाता है उसे 'कौक्कुटपुट' कहते हैं ॥२७॥ ❖ अरत्निस्तु निष्कनिष्ठेन मुष्टिने त्यमरः । निःसृतकनिष्ठया मुष्ट्योपलक्षितो हस्तोऽरत्निरित्यर्थः ।।२७।। यहाँ 'अरन्ति' पद का अरत्निस्तु' इत्यादि 'अमरकोश' के प्रमाण से मुठ्ठी बाध कर कनिष्ठा (कानी) अंगुली को सीधी खुली रखने पर जो नापने में एक हाथ होता है उसी का नाम 'अरग्नि' है अतः 'अरत्निमात्र' अर्थात् अरत्नि से उपलक्षित एक हाथ मात्र अर्थ समझना चाहिये। करीब २१ अंगुल के अरत्नि से उपलक्षित हाथ होता है ॥२७॥ अथ प्रकारान्तरेण पुनः कौक्कुटपुटस्य प्रकारमाह- षोडशाङ्गुलके खाते कस्यचित्कौक्कुटं पुटम् ।।२८।। प्रकारान्तर से पुनः कौक्कुटपुट का प्रकार-किसी-किसी के मत से १६ अंगुल गहरे तथा चौड़े गड्ढे का 'कौक्कुटपुट' होता है ।।२८।। अथ कपोतपुटप्रकारमाह- यत्पुटं दीयते खाते ह्यष्टसंख्यैर्वनोपलैः। कपोतपुटमेतत्तु कथितं पुटपण्डितैः ।।२९।। कपोतपुट का प्रकार-जिस गड्ढे में केवल ८ गोइठे से ही पुट दिया जा सके उसे 'कपोतपुट' क्रहते हैं ।।२९।। अथ गोबरस्य लक्षणमाह- गोष्ठान्तर्गोखुरक्षुण्णं शुष्कं चूर्णितगोमयम् । गोधरं तत्समाख्यातं वरिष्ठं रससाधने ।।३०।। गोबर का लक्षण-गोशाला के अन्दर गौओं के खुरों से खुना हुआ सूखा जो गोबर का चूर्ण होता है उसी को 'गोबर' कहते हैं। यह रस (पारा) के सिद्ध करने में उत्तम् होता है ॥३०॥ अथ गोबरपुटप्रकारमाह- बृहद्भाण्डस्थितर्यत्र गोबरैर्दीयते पुटम् । तद् गोबरपुटं प्रोक्तं भिषग्भिः सूतभस्मनि ।।३१।। गोबर के पुट का प्रकार-किसी बड़े बर्तन में उक्त गोबर को रख कर जो पुट दिया जाता है, उसे 'गोबरपुट' कहते हैं। वैद्य लोग इस पुट को पारा भस्म करने के समय काम में लाते हैं ॥३१॥ CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmmu. Digitized by S3 Foundation USA
अथ तृतीयं धात्वादिशोधनमारणविधिप्रकरणम् ९७५ अथ भाण्डपुटस्य प्रकारमाह- बृहद्भाण्डे तुषैः पूर्णे मध्ये मूषां विधारयेत्। क्षिप्त्वाऽग्निं मुद्रयेद्भाण्डं तद्भाण्डपुटमुच्यते ।। भाण्डपुट का प्रकार-एक किसी बड़े बड़े पात्र में भूसी भर कर उसके मध्य में मूषा (घरिया) रख कर अग्नि लगा दे और पात्र का मुख बन्द कर दे तो वह ‘भाण्डपुट’ कहलाता है ।।३२।। अथ यन्त्रप्रकारानाह- तत्र बालुकायन्त्रमाह- भाण्डे वितस्तिगम्भीरे मध्ये निहितकूपिके। कूपिकाकण्ठपर्यन्तं बालुकाभिश्च पूरिते ।।३३।। भेषजं कूपिकासंस्थं वह्निना यत्र पच्यते। बालुकायन्त्रमेतद्धि यन्त्रं तत्र बुधैः स्मृतम् ।।३४।। बालुकायन्त्र का प्रकार-एक बालिश्त चौड़े तथा गहरे के बीच में काच की कुप्पी (शीशी) रख कर और उसके गले के बराबर उक्त पात्र में बालू भर कर उसके नीचे आग लगा कर यदि उक्त काच की कुप्पी में औषध रख कर पकाया जाय तो उसे ‘बालुकायन्त्र’ कहते हैं ।।३४।। अथ दोलायन्त्रमाह- निबद्धमौषधं सूतं भूर्जे तत्रिगुणे वरे। रसपोटलिकां काष्ठे दृढं बद्ध्वा गुणेन हि ।।३५।। सन्धानपूर्णकुम्भान्तःस्वावलम्बनसन्थितम्। अधस्ताज्ज्वलयेदग्निं तत्तदुक्तक्रमेण हि ।। दोलायन्त्रमिदं प्रोक्तं स्वेदनाख्यं तदेव हि ।।३६।। दोलायन्त्र-पारा या अन्य औषध जिसका स्वेदन करना हो उसे उत्तम भोजपत्र से तीन पर्त करके लपेट कर उसकी पोटली बनाले पश्चात् उस पोटली को किसी लकड़ी में बीचोबीच डोरी से बाँध कर एक हांडी के ऊपर उक्त लकड़ी को इस भाँति रखे कि जिसमें पोटली हांड़ी के आधी दूर तक अन्दर लटकती रहे। उक्त हांड़ी के अन्दर कांजी किसी पदार्थ को इस तरह रख दे कि जिसमें पोटली भींगने न पावे, फिर उक्त हाँडी को चूल्हे पर रखकर नीचे आग लगा दे। उसके भाफ से पोटली के अन्दर स्थित औषध का स्वेदन करे। इसी को ‘दोलायन्त्र’ या ‘स्वेदनयन्त्र’ कहते हैं ।।३५-३६।। अथ स्वेदनयन्त्रमाह- साम्बुस्थालीमुखे बद्धे वस्त्रे स्वेद्यं निधाय च। पिधाय पच्यते तत्र तद् यन्त्रं स्वेदनं स्मृतम् ।।३७।। स्वेदनयन्त्र-एक हांडी में जल भर कर उसके मुख पर वस्त्र बाँध दे तत्पश्चात् जिसका स्वेदन करना हो उस द्रव्य को उसी वस्त्र के ऊपर रखकर हाँड़ी की चूल्हे पर रख नीचे अग्नि जलादे। इस भाँति उक्त द्रव्य का भाफ द्वारा स्वेदन करे। इसे भी ‘स्वेदनयन्त्र’ कहते हैं ।।३७।। अथ विद्याधरयन्त्रमाह- अधःस्थाल्यां रसं क्षिप्त्वा विदध्यात्तन्मुखोपरि। स्थालीमूर्ध्वमुखीं सम्यङ् निरुध्य मृदमृत्स्नया ।।३८।। ऊर्ध्वस्थाल्यां जलं क्षिप्त्वा चुल्ल्यामारोप्य यत्नतः। अधस्ताज्ज्वलयेदग्निं यावत्प्रहरपञ्चकम् ।।३९।। स्वाङ्गशीतं ततो यन्त्राद् गृह्णीयाद्रसमुत्तमम्। विद्याधराभिधं यन्त्रमेतत्तज्ज्ञैरुदाहृतम् ।।४०।। विद्याधर यन्त्र-एक हाँड़ी के भीतर पारा रख कर उसके ऊपर दूसरी हाँड़ी इस तरह रख दे कि जिसमें उसका मुख ऊपर की ओर रहे। पश्चात् मिट्टी से नीचे वाली हाँड़ी के मुख की सन्धियों को खूब यत्नपूर्वक बन्द करके और ऊपर की हाँड़ी में शीतल जल भर कर चूल्हे पर रख दे और उसके नीचे ५ प्रहर (१५ घण्टे) तक आग बराबर जलाता रहे, जब-जब ऊपर की हाँड़ी का जल गरम होता जाय तब तब उसे अलग कर के दूसरा शीतल जल उसके स्थान पर डालता CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammnu. Digitized by S3 Foundation USA
१७६ भावप्रकाशस्य पूर्वखण्डे जाय। इसके बाद ५ प्रहर बीत जाने पर आग बुझा दे और जब हाँड़ी एक दम शीतल हो जाय तब ऊपर की हाँड़ी के पेंदे में उड़कर चिपके हुये उत्तम पारे को निकाल कर अलग कर ले। इसी को यन्त्रविशारद वैद्यों ने 'विद्याधर' नामक यन्त्र कहा है ।।३८-४०।। अथ भूधरयन्त्रमाह- बालुकाभिः समस्ताङ्गं गर्ते मूषां रसान्विताम्। दीप्तोपलैः संवृणुयाद् यन्त्रं भूधरनामकम् ।।४१।। भूधरयन्त्र-प्रथम मूषा (घरिया) के अन्दर पारे को रख कर उसके मुख को अच्छी तरह बन्द कर दे बाद एक गड्ढे के अन्दर बालू भर कर उसी के अन्दर उक्त पारा युक्त मूषा (घरिया) को रख कर ऊपर से गोइठा से खूब ढक दे और आग लगा दे। इसी को 'भूधरयन्त्र' कहते हैं ।।४१।। अथ डमरुयन्त्रमाह- यन्त्रं डमरुसंज्ञं स्यात्तस्थाल्या मुद्रिते मुखे ।।४२।। डमरुयन्त्र-एक हाँड़ी के ऊपर दूसरी हाँड़ी औंधी रख कर दोनों के मुख की सन्धियों को मिट्टी से अच्छी तरह बन्द कर देने से जो डमरू के तरह आकार हो जाता है, उसी को 'डमरुयन्त्र' कहते हैं ।।४१।। अथ मारणयोग्यरजतस्य लक्षणमाह- गुरु स्निग्धं मृदु श्वेतं दाहे छेदे घनक्षमम्। वर्णाढ्यं चन्द्रवत् स्वच्छं तारं नवगुणं शुभम् ।। मारणयोग्य चाँदी के लक्षण-(१) तौल में भारी, (२) स्निग्ध, (३) कोमल, (४) सफेद और (५) तपाने तथा (६) काटने पर भी सफेद, (७) घन की चोट को सहने वाली, (८) वर्णयुक्त (बदरङ्ग नहीं), (९) चन्द्रमा के समान स्वच्छ कान्ति वाली इन ९ गुणों से युक्त जो चाँदी होती है वही अच्छी अत एव मारणयोग्य होती है ।।४३।। अथायोग्यरजतस्य लक्षणमाह- कठिनं कृत्रिमं रूक्षं रक्तं पीतदलं लघु। दाहच्छेदघनैर्नष्टं रूप्यं दुष्टं प्रकीर्त्तितम् ।।४४।। मारण के अयोग्य चाँदी-कठिन, बनावटी, रूक्षी, लालिमा लिये हुए, पीले दल (जोर) वाली, हलकी, तपाने, काटने तथा घन की चोट से नष्ट हो जाने वाली जो चाँदी होती है वह खराब समझी जाती है अत एव मारण के अयोग्य होती है ।।४४।। अथ रजतस्य शोधनमाह- पत्तलीकृतपत्राणि तारस्याग्नौ प्रतापयेत्। निषिञ्चेत्तप्ततप्तानि तैले तक्रे च काञ्जिके ।।४५।। गोमूत्रे च कुलत्थानां कषाये च त्रिधा त्रिधा। एवं रजत पत्राणां विशुद्धिः संप्रजायते ।।४६।। चाँदी के शोधने की विधि-चाँदी के पतले पतले पत्तरों को आग में अच्छी तरह तपाकर तेल (तिल का तेल) में बुझा दे पुनः तपाकर उसी तेल में बुझावे इसी भाँति तीन बार तेल में पुनः तीन-तीन बार तक्र, कांजी, गोमूत्र तथा कुलथी के क्वाथ में बुझावे। ऐसा करने से उक्त चाँदी के पत्तरों की शुद्धि होती है ।।४५-४६।। अथाशुद्धरजतस्य दोषानाह- रूप्यं त्वशुद्धं प्रकरोति तापं विबन्धकं वीर्यबलक्षये च। देहस्य पुष्टिं हरते तनोति रोगांस्ततः शोधनमस्य कुर्यात् ।।४७।। अशुद्ध चांदी के दोष-अशुद्ध चाँदी-शरीर में ताप तथा मलबन्ध को उत्पन्न करने वाली एवं वीर्य तथा बल का क्षय करने वाली और देह की पुष्टता को हरण करने वाली तथा अनेक प्रकार के रोगों को उत्पन्न करने वाली होती है। अतः इसका शोधन करना चाहिये ।।४७।। CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA
अथ तृतीयं धातुवादिशोधनमारणविधिप्रकरणम् ९७७ अथ रजतस्य मारणविधिमाह— भागैकं तालकं मर्द्यं याममम्लेन केनचित्। तेन भागत्रयं तारपत्राणि परिलेपयेत् ।।४८।। क्षप्त्वा मूषापुटे रुद्ध्वा पुटेत्त्रिंशद्वनोपलैः। समुद्धृत्य पुनस्तालं दत्त्वा रुद्ध्वा पुटे पचेत्। एवं चतुर्दशपुटैस्तारं भस्म प्रजायते ।।४९।। चाँदी मारने की विधि—प्रथम एक भाग तबकिया हरताल लेकर उसे एक प्रहर (३ घण्टे) तक किसी भी अम्ल पदार्थ (नींबू आदि) के रस में खरल करे, तत्पश्चात् शुद्ध किये हुये तीन भाग चाँदी के पत्तरों को लेकर उन पर पूर्वोक्त खरल किये हुए हरताल का अच्छी तरह लेप चढ़ा कर मूषा (घरिया) के संपुट के अन्दर रख कर कपड़मिट्टी से सन्धियों को खूब बन्द करके और सुखा कर ३० गोइठे (बिनुआ कण्डे) की आग में रखकर पुट देवे (पकाये), जब शीतल हो जाय तब निकाल कर पुनः हरताल का प्रलेप कर मूषा के अन्दर रख कर पूर्वोक्त रीति से पुट देवे। इसी भाँति १४ बार पुट देने से चाँदी भस्म हो जाती है ।।४८-४९।। अथ रजतमारणस्यापरं विधिमाह— स्नुहीक्षीरेण सम्पिष्टं माक्षिकं तेन लेपयेत् ।।५०।। तालकस्य प्रकारेण तारपत्राणि बुद्धिमान्। पुटेच्चतुर्दशपुटैस्तारं भस्म प्रजायते ।।५१।। चांदी मारने की दूसरी विधि—बुद्धिमान् वैद्य पूर्वोक्त वैद्य पूर्वोक्त हरताल की भाँति एकप्रहर (३ घण्टे) तक थूहर के दूध के साथ सोनामाखी या रूपामाखी एक भाग लेकर खरल करके ३ भाग चाँदी के पत्तरों को लेकर उसी के ऊपर उक्त सोनामाखी या रूपामाखी का प्रलेप करके मूषा (घरिया) के संपुट के अन्दर रख कर मुख बन्द कर दे और सुखा कर ३० गोइठे की अग्नि में रख कर पकावे जब शीतल हो जाय तब पुनः प्रलेप करके पुट दे इस भाँति १४ पुट देने से चाँदी भस्म हो जाती है ।।५०-५१।। अथ मारितरजतस्य गुणानाह— रौप्यं शीतं कषायं च स्वादुपाकरसं सरम्। वयसः स्थापनं स्निग्धं लेखनं वातपित्तजित् ।। प्रमेहादिकरोगांश्च नाशयत्यचिराद् ध्रुवम् ।।५२।। मारी हुई चाँदी के गुण—मारी हुई चांदी-शीतल, कषाय तथा मधुररसयुक्त, विपाक में मधुररसयुक्त, सारक अवस्था (युवावस्था) को स्थिर रखने वाली, स्निग्ध तथा लेखनगुण-विशिष्ट, वातपित्त नाशक एवं प्रमेहादि रोगों को शीघ्र निश्चित रूप से दूर करने वाली होती है ।।५२।। अथ मारणयोग्यताम्रस्य लक्षणमाह— जपाकुसुमसाङ्काशं स्निग्धं गुरु घनक्षमम्। लोहनागोज्झितं ताम्रं मारणाय प्रशस्यते ।।५३।। मारण के योग्य तामा के लक्षण जपाकुसुम (अढ़ौल के फूल) के समान रक्तवर्ण वाला, स्निग्ध, गुरु (तौल में भारी), घन की चोट को सहने वाला, लौह तथा सीसा के मल से रहित जो तामा होता है वह मारण के योग्य उत्तम होता है ।।५३।। अथायोग्यताम्रस्य लक्षणमाह— कृष्णं रूक्षमतिस्वच्छं श्वेतं चापि घनासहम्। लोहनागयुतं चेति शुल्बं दुष्टं दुष्टं प्रकीर्त्तितम् ।।५४।। मारण के योग्य तामा के लक्षण—काला, रूखा, अतिस्वच्छ, सफेदी लिये हुए, घन की चोट को न सहने वाला, लोह तथा सीसा मिला हुआ जो तामा होता है वह दुष्ट कहलाता है अत एव मारण के लिये अयोग्य होता है ।।५४।। ६५ भाव.I CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA
९७८ भावप्रकाशस्य पूर्वखण्डे अथ ताम्रस्य शोधनविधिमाह- पत्तलीकृतपत्राणि ताम्रस्याग्नौ प्रतापयेत् । निषिञ्चेत्तप्ततप्तानि तैले तक्रे च काञ्जिके ।।५५।। गोमूत्रे च कुलत्थानां कषाये च त्रिधा त्रिधा । एवं ताम्रस्य पत्राणां विशुद्धिः संप्रजायते ।। तामे के शोधने की विधि—तामे के पतले-पतले पत्तरों को अग्नि में तपा-तपा कर तेल, तक्र, कांजी, गोमूत्र और कुलथी के क्वाथ में क्रम से प्रत्येक में तीन-तीन बार बुझावे, ऐसा करने से तामे के पत्तरों की शुद्धि हो जाती है ।।५५-५६।। अथ ताम्रगतं दोषाष्टकमाह- एको दोषो विषे ताम्र त्वशुद्धेऽष्टौ भ्रमो वमिः । विरेकःस्वेद उत्क्लेदो मूर्च्छा दाहोऽरुचिस्तथा ।।५७।। न विषं विषमत्याहुस्ताम्रन्तु विषमुच्यते । एको दोषो विषे ताम्रे त्वष्टौ दोषाः प्रकीर्त्तिताः ।।५८।। तामे के ८ दोष—विष में तो एक दोष रहता है किन्तु बिना शोधे हुए तामे में (१) भ्रम, (२) वमन, (३) विरेचन, (४) पसीना, (५) उत्क्लेद (जी मचलाना), (६) मूर्च्छा, (७) दाह, (८) अरुचि ये ८ दोष रहते हैं । विद्वान् लोग विष को वस्तुतः विष नहीं कहते हैं किन्तु तामे को विष कहते हैं । क्योंकि विष में एक ही दोष कहा हुआ है किन्तु तामे में ८ दोष कहे हुये हैं ।।५७-५८।। अथ ताम्रस्य मारणविधिमाह- सूक्ष्माणि ताम्रपत्राणि कृत्वा संस्वेदयेद् बुधः । वासरत्रयमम्लेन ततः खल्वे विनिक्षिपेत् ।।५९।। पादांशं सूतकं दत्त्वा याममम्लेन मर्दयेत् । तत उद्धृत्य पत्राणि लेपयेद् द्विगुणेन च ।।६०।। गन्धकेनाम्लघृष्टेन तस्य कुर्याच्च गोलकम् । ततः पिष्ट्वा च मीनाक्षीं चाङ्गेरीं वा पुनर्नवाम् ।।६१।। तामे के मारने की विधि—प्रथम तामे के पतले-पतले पत्तरों का दो दिन तक अम्लपदार्थ (नींबू आदि) के रस के स्वेदन करे या उसी रस में उन्हें भिगो दे, उसके बाद उन पत्तरों को खरल में रख कर उसमें पत्तरों के चौथे भाग के बराबर पारा तथा ऊपर से अम्लपदार्थ (नींबू आदि) का रस डाल कर एक प्रहर तक खूबघोटें, फिर उन पत्तरों पर अम्लपदार्थ (नींबू आदि) के रस में घिसे हुए पत्तरों से दुगुने गन्धक का प्रलेप करके सभों का एक गोला बना ले । उसके बाद मछेछी, चाङ्गेरी और पुनर्नवा को पीस कर कल्क (चटनी) बना ले ।।५९-६१।। ❖ चाङ्गेरी=चतुष्पत्राम्ला लोणिकाभेदः ।।६१।। यहाँ ‘चांगेरी’ से ‘चार पत्तों वाली तथा खट्टी नोनिया के भेद की एक बूटी’ का ग्रहण करना चाहिये ।।५९-६१।। तत्कल्केन बहिर्गोलं लेपयेद्द्व्यङ्गुलोन्मितम् । धृत्वा तद् गोलकं भाण्डे शरावेण च रोधयेत् ।।६२।। बालुकाभिः प्रपूर्याथ विभूतिलवणाम्बुभिः । दत्त्वा भाण्डमुखे मुद्रां ततश्चुल्ल्यां विपाचयेत् ।।६३।। क्रमवृद्ध्याऽग्निना सम्यग् यावद्यामचतुष्टयम् । स्वाङ्गशीतं समुद्धृत्य मर्दयेच्छूरणद्रवैः ।।६४।। यामैकं गोलकं तञ्च निक्षेपेच्छूरणोदरे । मृदा लेपस्तु कर्त्तव्यः सर्वतोऽङ्गुष्ठमात्रकः ।।६५।। पाच्यं गजपुटे क्षिप्तं मृतं भवति निश्चितम् ।।६६।। वमनं च विरेकं च भ्रमं क्लममथारुचिम् । विदाहं स्वेदमुत्क्लेदं न करोति कदाचन ।।६७।। फिर उसी कल्क से पूर्वोक्त गोले के ऊपर दो अंगुल मोटा लेप चढ़ा कर उसे एक पात्र के अन्दर रख कर ऊपर से बालू भर कर पात्र का मुख एक शराव (कोसा) से ढक दे और राख तथा नमक को जल से सान कर उसी से सन्धियों को बन्द करके उक्त पात्र को चूल्हे पर रख कर उसके नीचे क्रम-क्रम से आँच को तेज करते हुए ४ प्रहर (१२ घंटे) तक पकावे, उसके बाद जब स्वयं शीतल हो जाय तब उक्त तामे के गोले को निकाल कर एक प्रहर तक सूरन के रस में खरल करे पश्चात् सूरन के एक बड़े कन्द के अन्दर गड्ढा बना कर उसी के अन्दर खरल किये हुये तामे के पत्तरों को
शुद्धिहीनमाक्षेपकम्पौ च किलासगुल्मौ । कुष्ठानि शूलं किल वातशोथं पाण्डुं प्रमेहञ्च भगन्दरञ्च ।।७२।।
Line 20: विषोपमं रक्तविकारवृन्दं क्षयञ्च कृच्छ्राणि कफज्वरञ्च । मेहाश्मरीविद्रधिमुष्करोगान् नागोऽपि कुर्यात्कथितान्विकारान् ।।७३।।
Line 21: अशुद्ध वङ्ग के दोष-बिना शोधा हुआ वङ्ग-आक्षेपक वात, कम्पवात, किलास (कुष्ठभेद), गुल्म, सभी प्रकार
Line 22: के कुष्ठ, शूल, वातसम्बन्धी शोथ, पाण्डु, प्रमेह, भगन्दर, विष के समान, रक्त सम्बन्धी अनेक प्रकार के विकार, क्षय,
Line 23: मूत्रकृच्छ्र आदि मूत्र रोग, कफज्वर, मेह, पथरी, विद्रधि और अण्डकोष सम्बन्धी रोगों को दूर करता है। इसी भाँति बिना Wait, "रोगों को दूर करता है"? Wait, look at line 23: "मूत्रकृच्छ्र आदि मूत्र रोग, कफज्वर, मेह, पथरी, विद्रधि और अण्डकोष सम्बन्धी रोगों को दूर करता है।" Wait, does it say "दूर करता है" or "पैदा करता है" or "
१८० भावप्रकाशस्य पूर्वखण्डे ततो द्वियाममात्रेण वङ्गं भस्म प्रजायते। अथ भस्मसमं तालं क्षिप्त्वाऽम्लेन विमर्दयेत् ॥७६॥ ततो गजपुटे पत्त्वा पुनरम्लेन मर्दयेत्। तालेन दशमांशेन याममेकं ततः पुटेत्। एवं दशपुटै पक्वं वङ्गं भवति मारितम् ॥७७॥ राँगा के मारण की विधि-मिट्टी के पात्र में गलाये हुये राँगे में इसका चतुर्थांश इमली तथा पीपल की छाल का चूर्ण डाल कर लोहे की कलछुल्ली से चलावे। उसके बाद उक्त रीति से दो प्रहर (६ घण्टे) तक चलाने से रांगा भस्म हो जाता है। फिर उस भस्म में उसके बराबर ही हरताल डाल कर अम्लपदार्थ (नींबू आदि) के रस के साथ खूब खरल कर उसे गजपुट की आग में पकावे। पक जाने के बाद पुनः दशवाँ भाग हरताल डाल कर अम्लपदार्थ के रस के साथ एक प्रहर तक खरल करे, तत्पश्चात् पुनः गजपुट की आग में पकाये। इस भाँति १० पुट देकर पकाने से वङ्ग (राँगा) अच्छी तरह मर जाता है ॥७५-७७॥ ❖ चिञ्चा=तिन्तिडी। रजः=चूर्णम्। अयोदर्वी=(लौहहाता) ॥७५-७७॥ ७५ वें श्लोक में 'चिञ्चा' पद से 'इमली' तथा 'रजः' पद से 'चूर्ण' और 'अयोदर्वी' पद से 'कलछुल्ली (लौहहाता)' अर्थ समझना चाहिये ॥७५-७७॥ अथ मारितवङ्गस्य गुणानाह- वङ्गं लघु सरं रूक्षं कुष्ठं मेहकफक्रिमीन्। निहन्ति पाण्डुं सश्वासं नेत्र्यमीषत् पित्तलम् ॥७८॥ सिंहो गजौघं तु यथा निहन्ति तथैव वङ्गोऽखिलमेहवर्गम्। देहस्य सौख्यं प्रबलेन्द्रियत्वं नरस्य पुष्टिं विदधाति नूनम् ॥७९॥ मारे हुए राँगा के गुण-मारा हुआ राँगा-लघु, सारक, रूक्ष एवं कुष्ठ, प्रमेह, कफ, कृमि, पाण्डु तथा श्वास रोग को दूर करने वाला, नेत्रों के लिये हितकर तथा किञ्चित् पित्तकारक होता है। जिस प्रकार सिंह हाथियों के समूह को नष्ट कर देता है उसी प्रकार मारा हुआ राँगा भी संपूर्ण मेह रोग के समूह को नष्ट करता है और मनुष्यों के देहसम्बन्धी सुख, पुष्टि तथा इन्द्रियों की प्रबलता को निश्चित रूप से करने वाला होता है ॥७८-७९॥ अथ यशदस्य स्वरूपं गुणांश्चाह- यशदं गिरिजं तस्य दोषाः शोधनमारणे। वङ्गस्येव हि बोद्धव्या गुणांस्तु गणयाभ्यथ ॥८०॥ यशदं च सरं तिक्तं शीतलं कफपित्तहृत्। चक्षुष्यं परमं मेहान् पाण्डुं श्वासञ्च नाशयेत् ॥८१॥ सीसे का स्वरूप-जस्ता (सीसा) भी पर्वत पर ही उत्पन्न होता है। अतः इसके दोष तथा शोधन और मारण की विधि पूर्वोक्त राँगे के समान ही समझना चाहिये। सीसे के गुण-सीसासारक, तिक्तरसयुक्त, शीतल नेत्रों के लिये अत्यन्त हितकार एवं कफ तथा पित्त को दूर करने वाला और सभी प्रकार के मेहरोग, पाण्डु-तथा श्वास को नष्ट करने वाला होता है ॥८०-८१॥ अथ सीसकस्य शोधनविधिमाह- तस्य साहजिका दोषा वङ्गस्येव निदर्शिताः। शोधनञ्चापि तस्येव भिषग्भिर्गदितं पुरा ॥८२॥ सीसा के शोधन विधि-सीसा के जो स्वाभाविक दोष हैं वे सब राँगा के समान ही होते हैं। अतः प्राचीन वैद्यों ने इसका शोधन भी राँगा के समान ही बतलाया है ॥८२॥ अथ सीसकस्य मारणबिधिमाह- ताम्बूलरससम्पिष्टं शिलालेपात् पुनः पुनः। द्वात्रिंशद्भिः पुटैर्नागो निरुत्थं भस्म जायते ॥८३॥ CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmmu. Digitized by S3 Foundation USA
अथ तृतीयं धात्वादिशोधनमारणविधिप्रकरणम् ९८१ सीसा के मारने की विधि- पान के रस के मैनसिल को बारीक चटनी सा पीस ले और सीसे पर उसी का चारो- तरफ लेकर गजपुट की अग्नि में पका ले। तत्पश्चात् पुनः निकाल कर उक्त मैनशिल का प्रलेप करके गजपुट में पकावे, इस प्रकार ३२ पुट देने से सीसे की निरुत्थ (पुनः नहीं जीवित होने वाली) भस्म तैयार हो जाती है ॥८३॥ ❖ शिला=मनःशिलाः ।।८३।। यहाँ शिला' से 'मैनशिल' का ग्रहणकरना चाहिये ॥८३॥ अथापरं सीसकमारणविधिमाह- अश्वत्थचिञ्चात्वक्चूर्णं चतुर्थांशेन निक्षिपेत्। मृत्पात्रे विद्रुतो नागो लोहदर्व्या प्रचालितः ।।८४।। यामैकेन भवेद्भस्म तत्तुल्या स्मान्मनःशिला । काञ्जिकेन द्वयं पिष्ट्वा पचेद्गजपुटेन च ।।८५।। स्वाङ्गशीतं पुनः पिष्ट्वा शिलया काञ्जिकेन च। पुनः पचेच्छरावाभ्यामेवं षष्ठिपुटैर्मृतिः ।।८६।। सीसा मारने की दूसरी विधि-मिट्टी के पात्र में सीसे को गला कर उसमें सीसे का चतुर्थांश पीपल तथा इमली के छाल का चूर्ण मिला कर एक पहर तक लोहे की कलछुली से चलाता रहे। ऐसा करने से सीसा भस्म हो जाता है। तत्पश्चात् उस भस्म में उसके बराबर ही मैनसिल मिला कर कांजी के साथ पीस कर गजपुट की आग में पकावे, पश्चात् स्वयं शीतल हो जाने पर निकाल कर पुनः पूर्वोक्त रीति से दो शराव (कोसा) के अन्दर रखकर मैनसिल मिला कर कांजी से पीसकर गजपुट की आग में पकावे। इसी भाँति ६० पुट की आँच देने से सीसा मर जाता है ॥८४-८६॥ अथ मारितसीसकस्य गुणानाह- सीसं रङ्गगुणं ज्ञेयं विशेषान्मेहनाशनम् ।।८७।। नागस्तु नागशततुल्यबलं ददाति व्याधिं च नाशयति जीवनमातनोति । वह्निं प्रदीपयति कामबलं करोति मृत्युञ्च नाशयति सन्ततसेवितः सः ।।८८।। मारे हुये सीसा के गुण-सीसा के गुण यद्यपि राँगा के समान ही होते हैं तथापि यह विशेष कर मेह्रोगनाशक होता है। सीसा निरन्तर सेवन करने से सौ हाथियों के समान बल देने वाला, रोगनाशक, जीवन को बढ़ाने वाला, अग्नि को प्रदीप्त करने वाला, कामशक्ति को बढ़ाने वाला तथा मृत्यु को दूर करने वाला होता है ॥८७-८८॥ अथाशुद्धलौहस्य दोषानाह- खञ्जत्वकुष्ठामयमृत्युकारी हृद्रोगशूलौ कुरुतेऽश्मरीञ्च । नानारुजानां च तथा प्रकोपं कुर्याच्च हल्लासमशुद्धलौहम् ।।८९।। अशुद्ध लोहा के दोष-अशुद्ध लोहा खञ्जता (लँगड़ापन), कुष्ठरोग, मृत्यु, हृद्रोग, शूल, पथरी, हल्लास (उबकाई) तथा अनेक प्रकार के रोगों की उत्पत्ति करता है ॥८९॥ अथ लौहस्य दोषशान्तये शोधनविधिमाह- पत्तलीकृतपत्राणि लौहस्याग्नौ प्रतापयेत् । निषिञ्चेत्तप्ततप्तानि तैले तक्रे च काञ्जिके ।।९०।। गोमूत्रे च कुलत्थानां कषाये च त्रिधा त्रिधा। एवं लौहस्य पत्राणां विशुद्धिः संप्रजायते ।।९१।। लोहा के दोष की शान्ति के लिये शोधनविधि-प्रथम लोहे के अत्यन्त पतले-पतले पत्तरों को लेकर अग्नि में पकावे, तत्पश्चात् तपे हुये उन सबों को क्रम से तिल का तेल, तक्र, कांजी, गोमूत्र तथा कुलथी के क्वाथ में प्रत्येक में तीन-तीन बार तपा-तपा कर बुझावे। ऐसा करने से लोहा के पत्तरों की शुद्धि होती है ॥९०-९१॥ अथ लौहस्य मारणविधिमाह- शुद्धं लौहभवं चूर्णं पातालगरुडीरसैः । मर्दयित्वा पुटेद्द्वौ दद्यादेवं पुटत्रयम् ।।९२।। पुटत्रयं कुमार्याश्च कुठारच्छिन्त्रिकारसैः । पुटषट्क ततो दद्यादेवं तीक्ष्णमृतिर्भवेत् ।।९३।। CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA
१८४ भावप्रकाशस्य पूर्वखण्डे लोहा के मारण विधि—शुद्ध किये हुये लोहे के चूर्ण को पातालगरुडी के रस में खूब खरल करके शराव के संपुट में रख गजपुट की आग में पकावे, पुनः शीतल होने पर निकाल कर उक्त रस से मर्दन कर पुनः गजपुट की आग में पकावे इस भाँति ३ बार गजपुट की आग में पकाने के बाद पुनः घीकुवार के रस में मर्दन कर ३ बार गजपुट में पकावे इसके बाद कुठारच्छिन्निका (कोरैया) के रस में मर्दन कर ६ बार गजपुट की आग में पकाने से लोहा का मारण होता है। अन्यच्च- क्षिपेच्च द्वादशांशेन दरदं तीक्ष्णचूर्णतः । सदयेत्कन्यकाद्रावैर्यामयुग्मं ततः पुटेत् । एवं सप्तपुटैर्मृत्युं लौहचूर्णमवाप्नुयात् ॥ ९४॥ लौह मारण का दूसरा प्रकार—लोहे के चूर्ण में बारहवाँ भाग सिंगरफ डाल कर घीकुवार के रस में २ प्रहर (६ घंटे) तक खूब खरल करे, उसके बाद गजपुट में रख फूँक दे इस प्रकार सातबार फूँकने से लोहा का मारण हो जाता है ॥९४॥ लोहमारणस्य तृतीयं विधिमाह- सत्योऽनुभूतो योगेन्द्रैः क्रमोऽन्यो लोहमारणे । कथ्यते रामराजेन कौतूहलधियाऽधुनाः ॥ ९५॥ सूतकाद् द्विगुणं गन्धं दत्त्वा कुर्याच्च कज्जलीम् । द्वयोः समं लौहचूर्ण मर्दयेत्कन्यकाद्रवैः ॥ ९६॥ यामयुग्मं ततः पिण्डं कृत्वा ताम्रस्य पात्रके । घर्मे धृत्वा रूवूकस्य पत्रैराच्छादयेद् बुधः ॥ ९७॥ यामत्रयाद्बवेदुष्णं धान्यराशौ न्यसेत्ततः । दत्त्वोपरि शरावं तु त्रिदिनान्ते समुद्धरेत् ॥ ९८॥ पिष्ट्वा च गालयेद्वस्त्रादेवं वारितरं भवेत् । दाडिमस्य दलं पिष्ट्वा तच्चतुर्गुणवारिणा ॥ ९९॥ तद्रसेनायसं चूर्ण शश्नीय प्लावयेदिति । आतपे शोषयेत्तञ्च पुटेदेवं पुनः पुनः ॥ १००॥ एकविंशतिवारैस्तन्म्रियते नात्र संशयः । एवं सर्वाणि लोहानि स्वर्णादीन्यपि मारयेत् ॥ १०१॥ लोहामारण की तीसरी विधि—लोहा के मारण करने में बड़े-बड़े योगियों के द्वारा सचमुच अनुभव किया हुआ एक विधि और है जिसे कि इस समय कौतुकबुद्धि से रामराज नामक वैद्य कह रहे हैं। पारा से दूना गन्धक लेकर उसकी कज्जली बना ले तत्पश्चात् उस कज्जली में उसके बराबर शुद्ध लोहे का चूर्ण मिलाकर घीकुवार के रस में २ प्रहर (६ घंटे) तक खरल करे उसके बाद उन सबों का एक पिण्ड बना कर तांबे के बर्तन में रख एरण्ड के पत्ते से उसे ढक कर घाम (धूप) में २ प्रहर (६ घंटे) तक रख दे फिर धूप से गर्म हुये उसके ऊपर पत्तों को हटा कर शराव रखकर मुख बन्द कर धान्य की राशि के अन्दर गाड़ दे, जब तीन दिन हो जाय तब निकाल कर उक्त पिण्ड को पीस कर कपड़े से छान ले। यह लोहे का चूर्ण ऐसा हल्का हो जाता है कि जल पर तैरने लगता है। इसके बाद चूर्ण को चौगुने जल में पिसे हुए अनार के पत्तों के रस से खूब भिगोकर धूप में सुखावै तत्पश्चात् गजपुट में फूँक दे। शीतल हो जाने पर निकाल कर पुनः उक्त रस में भिगो कर धूप में सुखाकर गजपुट में फूँके। इस तरह २१ बार पुट में रखकर फूँकने से सभी प्रकार के लोहा तथा सोना आदि भी मर जाते हैं। इसमें कोई संशय नहीं॥ अथ मारितलौहस्य गुणानाह- लौहं तिक्तं सरं शीतं कषायं मधुरं गुरु । रूक्षं वयस्यं चक्षुष्यं लेखनं वातलं जयेत् ॥ १०२॥ कफं पित्तं गरं शूलं शोफार्शःप्लीहपाण्डुताः भेदोमेहकृमीन् कुष्ठं तत्किटं तद्वदेव हि ॥ १०३॥ मारे हुए लोहे के गुण—मारा हुआ लोहा-तिक्त, कषाय तथा मधुररसयुक्त, सारक, शीतल, गुरु, रूक्ष, अवस्था को स्थिर रखने वाला, नेत्रों के लिये हितकर, लेखन, वातकारक एवं कफ, पित्त, गरसंज्ञक विष, शूल, शोथ, बवासीर, प्लीहा, पाण्डु, मेद, प्रमेह, क्रिमि तथा कुष्ठ को नष्ट करने वाला होता है। इसी प्रकार लोहे के कीट (मण्डूर) में भी ये सब गुण रहते हैं ॥१०२-१०३॥ CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmmu. Digitized by S3 Foundation USA
अथ तृतीयं धात्वादिशोधनमारणविधिप्रकरणम् १८३ अथ लौहभस्मभक्षणे मात्रामाह- गुञ्जामेकां समारभ्य यावत्स्युर्नवरक्तिकाः । तावल्लोहं समश्नीयाद्यथादोषानलं नरः ।।१०४।। लौहभस्म खाने की मात्रा-एक रत्ती से आरम्भ कर बढ़ाते-बढ़ाते नौ रत्ती तक मनुष्य दोष तथा अग्नि के अनुसार विचार कर यथायोग्य लौह भस्म का सेवन करे ।।१०४।। अथ लौहसेवनसमये वर्जनीयद्रव्याण्याह- कूष्माण्डं तिलतैलं च भाषान्नं राजिकां तथा । मद्यमम्लरसञ्चैव वर्जयेल्लोहसेवकः ।।१०५।। लौहभस्म खाने के समय त्याग करने योग्य द्रव्य-पेठा, तिल का तेल, उड़द, राई, मद्य, अम्लरस युक्त पदार्थ (इमली आदि) इन सबों का लौहभस्म खाने वाला व्यक्ति परित्याग कर देवे । अथ सर्वधातूनां मारणे साधारणविधिमाह- शिलागन्धार्कदुग्धाक्तः स्वर्णाद्याः सर्वधातवः । म्रियन्ते द्वादशपुटैः सत्यं गुरुवचो यथा ।। सब धातुओं के मारने की साधारण विधि-सोना आदि सभी धातु यदि मैनसिल तथा गन्धक को आक के दूध में महीन पीसकर और उसी कल्क से लपेट कर गजपुट में रख कर फूंक दिये जावें और शीतल होने पर पुनः उक्त कल्क से लपेट कर फूँके जावें तो इसी भाँति १२ बार फूँकने से भर जाते हैं । जैसे सद्गुरु का वचन सत्य होता है वैसे ही यह सत्य है ।।१०६।। अथोपधातूनां मारणप्रकारमाह- तत्राशुद्धस्वर्णमाक्षिकस्य दोषानाह- मन्दानलत्वं बलहानिमुग्रां विष्टम्भितां नेत्रगदान् सकुष्ठान् । भालां तथैव व्रणपूर्विकाञ्च कुर्यादशुद्धं खलु माक्षिकञ्च ।।१०७।। अशुद्ध 'स्वर्णमाक्षिक' (सोनामाखी) के दोष—अशुद्ध सोनामाखी-अग्नि की मन्दता, बल की हानि, अत्यन्त विष्टम्भ, नेत्रसम्बन्धी रोग, कुष्ठ, गण्डमाला तथा अनेक प्रकार के व्रणों को उत्पन्न करने वाली होती है ।।१०७।। अथ स्वर्णमाक्षिकस्य शोधनविधिमाह- माक्षिकस्य त्रयो भागा भागैकं सैन्धवस्य च । मातुलुङ्गद्रवैर्वाऽथ जम्बीरस्य द्रवैः पचेत् ।।१०८।। चालयेल्लौहजे पात्रे यावत्पात्रं सुलोहितम् । भवेत्ततस्तु संशुद्धिं स्वर्णमाक्षिकमृच्छति ।।१०९।। सोनामाखी शोधने की विधि-३ भाग सोनामाखी और एक भाग सेन्धानमक लेकर दोनों की बिजौरा अथवा जमीरी नींबू के रस के साथ लोहे के पात्र में रख कर पकावे और तब तक लोहे की करछुली से चलाता रहे जब तक लोहे का पात्र अच्छी तरह लाल न हो जाय । तदुपरान्त उतार कर सोनामाखी को अलग कर ले । ऐसा करने से सोनामाखी शुद्ध हो जाती है ।।१०८-१०९।। अथ स्वर्णमाक्षिकस्य मारणविधिमाह- कुलत्थस्य कषायेण घृष्ट्वा तैलेन वा पुटेत् । तक्रेण वाऽऽजमूत्रेण म्रियते स्वर्णभाक्षिकम् ।। सोनामाखी मारने की विधि-शुद्ध सोनामाखी को कुलथी के क्वाथ, तिल का तेल, तक्र (छाछ) या बकरे के मूत्र में घिस (खरल) कर अग्नि की पुट देवे तो वह (सोनामाखी) मर जाती है ।।११०।। CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA
१८४ भावप्रकाशस्य पूर्वखण्डे अथ तारमाक्षिकस्य शोधनविधिमाह- स्वर्णमाक्षिकवद्दोषा विज्ञेयास्तारमाक्षिके। अतस्तद्दोषशान्त्यर्थं शोधनं तस्य कथ्यते ।।१११।। कर्कोटीमेषशृङ्ग्युत्थैरार्द्रवैर्जम्बीरजैर्दिनम्। भावयेदातपे तीव्रे विमला शुद्ध्यति ध्रुवम् ।।११२।। रूपामाखी शोधने की विधि-सोनामाखी के जो दोष कहे हुए हैं वे ही रूपामाखी के भी समझने चाहिये। अतः उन सब दोषों को शान्त करने के लिये रूपामाखी के शोधने की विधि कहते हैं। रूपामाखी को एक दिन तक खेखसा, मेढ़ासि (शृ) ङ्गी तथा जमीरी नीबू के रस से भावना देकर तीव्र धूप में सुखाने से रूपामाखी शुद्ध हो जाती है ॥१११-११२॥ ❖ कर्कोंटी=खेखसा। मेषशृङ्गी। विमला=तारमाक्षिका ।।१११-११२।। यहाँ 'कर्कोंटी' पद से 'खेखसा' और 'मेढ़ाशृङ्गी' तथा 'विमला' पद से 'रूपामाखी का' ग्रहण करना चाहिये ।।१११- ११२॥ अथ तारमाक्षिकस्य मारणविधिमाह- कुलत्थस्य कषायेण घृष्ट्वा तैलेन वा पुटेत्। मरणं वाऽऽजमूत्रेण तारमाक्षिकमृच्छति ।।११३।। रूपामाखी के मारने की विधि-कुलथी का क्वाथ, तिल का तेल, तक्र या बकरे के मूत्र से रूपामाखी को घिस (खरल) करके अग्नि की आँच देने से रूपामाखी मर जाती है ।।११३।। अथ स्वर्णमाक्षिकरूप्यमाक्षिकयोर्विशेषगुणानाह- न केवलं स्वर्णरूप्यगुणास्तापीजयोर्मताः। द्रव्यान्तरस्य संसर्गात्सन्त्यन्येऽपि गुणास्तयोः ।।११४।। माक्षिकं मधुरं तिक्तं स्वर्यं वृष्यं रसायनम् ।।११५।। चक्षुष्यं बस्तिरुक्कुष्ठपाण्डुमेहविषोदरम्। अर्शः शोफं क्षयं कण्डूं त्रिदोषञ्च नियच्छति ।।११६।। सोनामाखी तथा रूपामाखी के विशेष गुण-केवल सोना तथा चाँदी के ही गुण क्रम से सोनामाखी तथा रूपामाखी में नहीं रहते हैं किन्तु दूसरे-दूसरे द्रव्यों का भी संयोग होने से उनके भी गुण रहते हैं। गुण-सोनामाखी तथा रूपामाखी-मधुर तथा तिक्तरसयुक्त, स्वर को उत्तम करने वाली, वीर्यवर्धक, रसायन, नेत्रों के लिये हितकर एवं बस्तिसम्बन्धी रोग, कुष्ठ, पाण्डु, मेहरोग, विष, उदररोग, बवासीर, शोथ, क्षय, खुजली तथा त्रिदोष को नष्ट करने वाली होती है ।। अथाशुद्धतुत्थस्य शोधनविधिमाह- विष्ठया मर्दयेत्तुत्थं मार्जारिककपोतयोः। दशांशं टङ्कणं दत्त्वा पचेल्लघुपुटे ततः। पुटं दध्ना पुटं क्षौद्रैर्देयं तुत्थविशुद्धये ।।११७।। अशुद्ध तूतिया के शोधन की विधि-बिल्ली और कबूतर की विष्ठा के साथ तूतिया को खरल कर उसी में दशवाँ भाग सुहागा भी डाल कर खरल कर हलकी आग की पुट देवे तदुपरान्त पहले दही के साथ और अन्त में शहद के साथ भी खरल करके पुट देने से तूतिया शुद्ध हो जाता है ।।११७।। अथ शुद्धतुत्थखर्परयोर्गुणानाह- तुत्थकं कटुकं क्षारं कषायं वामकं लघु ।।११८।। लेखनं भेदनं शीतं चक्षुष्यं कफपित्तहृत्। विषाश्मकुष्ठकण्डूघ्नं तद्गुणं खर्परं मतम् ।।११९।। CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmmu. Digitized by S3 Foundation USA
अथ तृतीयं धात्वादिशोधनमारणविधिप्रकरणम् १८५ शुद्ध तूतिया के गुण-शुद्धतूतिया-कटु तथा कषायरसयुक्त, खारा, वमन कराने वाला, लघु, लेखन, मल का भेदन करने वाला, शीतल, नेत्रों के लिये हितकर एवं कफ, पित्त, विष, पथरी, कुष्ठ तथा खुजली को दूर करने वाला होता है इसी प्रकार शुद्ध खपरिया के भी ये ही सब गुण हैं ॥११८-११९॥ अथ कांस्यपित्तलयोः शोधनविधिमाह- पत्तलीकृतपत्राणि कांस्यस्याग्नौ प्रतापयेत् । निषिञ्चेत्तप्ततप्तानि तैले तक्रे च काञ्जिके ॥१२०॥ गोमूत्रे च कुलत्थानां कषायेऽत्र त्रिधा त्रिधा । एवं कांस्यस्य रीतेश्च विशुद्धिः सम्प्रजायते ।। काँसा तथा पीतल के शोधन की विधि-काँसा के पतले-पतले पत्तरों को प्रथम आग में तपाले, पश्चात् उन्हें तपा-तपा कर तिल का तेल, तक्र, कांजी, गोमूत्र तथा कुलथी के क्वाथ में क्रम से प्रत्येक में तीन-तीन बार बुझावे, ऐसा करने से काँसे की शुद्धि हो जाती है । इसी प्रकार पीतल के पत्तरों की भी शुद्धि की जाती है ॥१२०-१२१॥ अथ तयोर्मारणविधिमाह- अर्कक्षीरेण सम्पिष्टो गन्धकस्तेन लेपयेत् । समेन कांस्यपत्राणि शुद्धान्यम्लद्रवैर्मुहुः ॥१२२॥ ततो मूषापुटे धृत्वा पचेद्गजपुटेन च । एवं पुटद्वयात् कांस्यं रीतिश्च म्रियते ध्रुवम् ॥१२३॥ काँसा तथा पीतल के मारने की विधि-प्रथम आक के दूध में पिसे हुये गन्धक के तौल के बराबर काँसे के शुद्ध किये हुये पत्तरों को लेकर अम्ल पदार्थ नींबू आदि के रस से बारम्बार लगाकर खूब साफ कर ले पश्चात् उन सबों पर उक्त गन्धक का लेप कर के मूषा (घरिया) के संपुट के अन्दर रख कर सन्धियों को कपड़मिट्टी से बन्द कर और सुखा कर गजपुट की आँच में पकावे, इस तरह दो बार पुट देने से काँसा मर जाता है । इसी भाँति शुद्ध पीतल के पत्तरों का भी मारण होता है ॥१२२-१२३॥ अथ मारितकांस्यरीत्योर्गुणानाह- कांस्यं कषायं तीक्ष्णोष्णं लेखनं विशदं सरम् । गुरु नेत्रहितं रूक्षं कफपित्तहरं परम् ॥१२४॥ रीतिका तु भवेद् रूक्षा सतिक्ता लवणा रसे । शोधनी पाण्डुरोगघ्नी कृमिहृन्नातिलेखनी ॥१२५॥ मारे हुये काँसा तथा पीतल के गुण-काँसा-कषायरसयुक्त, तीक्ष्ण, उष्ण, लेखन तथा विशदगुणयुक्त, सारक, गुरु, नेत्रों के लिये हितकर, रूक्ष एवं कफ तथा पिन का अत्यन्त नाशक होता है । पीतल-तिक्त तथा लवणरसयुक्त, रूक्ष, देह का शोधन करने वाला, पाण्डुरोगनाशक, कृमि को दूर करने वाला एवं अत्यन्त लेखनगुणयुक्त नहीं होता अर्थात् किंचित् लेखन गुण युक्त होता है ॥१२४-१२५॥ अथ सिन्दूरस्य शोधनबिधिमाह- दुग्धाम्लयोगतस्तस्य विशुद्धिर्गदिता बुधैः ॥१२६॥ सिन्दूर के शोधने की विधि-सिन्दूर को दूध तथा अम्लपदार्थ नींबू आदि के रस में दो प्रहर तक अलग-अलग खरल करने से उसकी शुद्धि होती है ॥१२६॥ अथ सिन्दूरस्य गुणानाह- सिन्दूर उष्णो वीसर्पकुष्ठकण्डूविषापहः । भग्नसन्धानजननो व्रणशोधनरोपणः ॥१२७॥ सिन्दूर के गुण-शुद्ध सिन्दूर-उष्ण, वीसर्प, कुष्ठ, खुजली तथा विष को दूर करने वाला, टूटी हुई हड्डियों को जोड़ने वाला तथा व्रण का शोधन एवं रोपण करने वाला होता है ॥१२७॥ CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA
९८६ भावप्रकाशस्य पूर्वखण्डे अथ शिलाजतुनो लक्षणं शोधनविधिश्चाह- गोमूत्रगन्धवत्कृष्णं स्निग्धं मृदु तथा गुरु। तिक्तं कषायं शीतञ्च सर्वश्रेष्ठं तदायसम् ।।१२८।। शिलाजीत के लक्षण-जिसमें गोमूत्र के समान गन्ध हो तथा जो देखने में काले रङ्ग का हो एवं स्निग्ध, कोमल, गुरु, तिक्त तथा कषाय रसयुक्त और शीतल हो ऐसे शिलाजीत को उत्तम समझना चाहिये। यह लोहे का उपधातु है ।।१२८।।
- आयसम् = अयउपधातुसम्बन्धि ।। १२८ ।। यहाँ 'आयसम्' पद का 'लोहे का उपधातु' यह अर्थ समझना चाहिये ।।१२८।। विन्ध्यादौ बहुलं तत्तु यत्र लौहं यतोऽधिकम् । तच्छोधनमृते व्यर्थमनेकमलमेलनात् ।।१२९।। शिलाजतु समानीय सूक्ष्मं खण्डं विधाय च । निक्षिप्यात्युष्णपानीये यामैकं स्थापयेत्सुधीः ।।१३०।। मर्दयित्वा ततो नीरं गृह्णीयाद्वस्त्रगालितम् । स्थापयित्वा च मृत्पात्रे धारयेदातपे बुधः ।।१३१।। उपरिस्थं घनं यत्स्यात्तत्क्षिपेदन्यपात्रके । एवं पुनः पुनर्नोतं द्विमासाभ्यां शिलाजतु ।।१३२।। भवेत्कार्यक्षमं वह्नौ क्षिप्तं लिङ्गोपमं भवेत् । निर्धूमञ्च ततः शुद्धं सर्वकर्मसु योजयेत् ।।१३३।। शोधनविधि-यह (शिलाजीत) विन्ध्य आदि पहाड़ों पर अधिकतर पाया जाता है, क्योंकि वहाँ लोहा अधिक रूप से होता है। शिलाजीत में अनेक प्रकार के मलों का मेल होने से बिना शोधन किये हुए कार्य में लेने योग्य नहीं होता है। अतः प्रथम शिलाजीत को लाकर उसके छोटे-छोटे टुकड़े कर अत्यन्त गरम जल में एक प्रहर तक रहने दे पश्चात् उसी जल में उसे खूब मल कर कपड़े से छान ले और छने हुए जल को मिट्टी के पात्र में रख कर धूप में रख दे। तत्पश्चात् जो उसके ऊपर उतराया हुआ घन भाग हो उसे धीरे से निकाल कर एक दूसरे पात्र में रख दे इस तरह से बारम्बार ऊपर तैरते हुये मलाई के समान घन भाग को निकाल कर एक दूसरे पात्र में रखता जाय, इस भाँति दो मास तक करने से जब ऊपर की मलाई पड़नी बन्द हो जाय तब नीचे के काले बैठे हुये भाग को निकाल लेना चाहिये। यही भाग शिलाजीत का कार्य में लेने योग्य होता है और वह आग में डालने से लिङ्ग के समान हो जाता है तथा उससे धूआँ नहीं निकलता। ऐसा जब शिलाजीत हो जाता है तब उसे शुद्ध समझना चाहिये और हर एक कार्य में उसका प्रयोग करना चाहिये ।।१२९-१३३।। अथान्यं प्रकारमाह- तत्र प्रथमतस्तस्य बहिर्मलमपाकर्त्तुं केवलजलेन प्रक्षालनं कर्त्तव्यं, ततस्तदन्तर्गतमृत्ति, कासिकतादि- दोषदूरीकरणाय वक्ष्यमाणक्वाथेन तत्र भावना देयेत्यत्र वाग्भटस्य मतमाह, तद्यथा- व्याधिव्याधितसात्म्यं समनुसरन् भावयेद्वयःपात्रे । प्राक् केवलजलधौतं शुष्कं क्वाथैस्ततो भाव्यम् ।।१३४।। तुल्यं गिरिजेन जले वसुगुणिते भावनौषधं क्काथ्यम् । तत्क्वाथे पादांशे पूतोष्णे प्रक्षिपेद् गिरिजम् ।।१३५।। तत्समरसतां यातं संशुष्कं प्रक्षिपेद्रसे भूयः । स्वैः स्वैरैवं क्वाथैर्भाव्यं वारान् भवेत्तु सप्त ।।१३६।। अथ स्निग्धस्य शुद्धस्य वृतं तिक्तकसाधितम् । त्र्यहं युञ्जीत गिरिsurface गिरिर्जैकैकन तथा त्र्यहम् ।।१३७।। फलत्रयस्य यूषेण पटोल्या मधुकस्य च शिलाजमेवं देहस्य भवत्यत्युपकारकम् ।।१३८।। शिलाजीत शोधने की दूसरी विधि-प्रथम शिलाजीत के बाहरी मल को दूर करने के लिये उसे केवल जल से धोवे, उसके बाद उसके अन्दर रहने वाली मिट्टी, बालू आदि दोष को दूर करने के लिये आगे कहे जाने वाले क्वाथ से उसमें भावना देनी चाहिये। इसी विषय में 'वाग्भट' का मत यह है कि-रोग तथा रोगी के लिये जो सात्म्य अर्थात् हितकर द्रव्य हो उसका विचार करते हुये उसी द्रव्य के क्वाथ से शिलाजीत को लोहे के पात्र में रख कर भावना देनी CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmmu. Digitized by S3 Foundation USA
अथ तृतीयं धात्वादिशोधनमारणविधिप्रकरणम् ९८७ चाहिये। उसका प्रकार यह है कि—प्रथम केवल जल से शिलाजीत को धोकर सुखा ले पश्चात् क्वाथ से भावना देवे और उस क्वाथ के बनाने में जिस द्रव्य का क्वाथ बनाना हो उसे शिलाजीत के बराबर भाग में लेकर अठगुने जल में पकावे और जब चतुर्थांश जल शेष रह जाय तब छान कर गरम-गरम रहते ही उसमें शिलाजीत को छोड़ दे। जब वह पानी में खूब घुल जाय तब सुखा डाले, पश्चात् पुनः उक्त प्रकार से दूसरा क्वाथ बना कर उसमें फिर से सूखे पूर्वोक्त शिलाजीत को डाल कर घुल जाने पर सुखा डाले इस प्रकार कुल सात भावना क्वाथ से दे। उसके बाद रोगी को स्निग्ध पदार्थों के द्वारा स्नेहन तथा विरेचनादि से शोधन करके उसे तिक्तक (अड़ूसा, नीम, गिलोय, कटेरी तथा परवल) द्रव्यों के कल्क से सिद्ध किया हुआ घी तीन दिन तक खिलावे तत्पश्चात् एक दिन त्रिफला के क्वाथ के साथ शिलाजीत खिलावे, दूसरे दिन परवर के जूस के साथ, तीसरे दिन मुलेठीके क्वाथ के साथ शिलाजीत खिलावे। इस तरह यदि शिलाजीत का प्रयोग किया जाय तो वह शरीर के लिये अत्यन्त उपकारक होता है ।।१३४-१३८।। अथ क्वाथ्यद्रव्याणां भावनाफलञ्चाह हारीतः- लोहस्थितं निम्बगुडूचिसर्पिर्यवैर्यथावत्परिभावयेत्तत्। सन्तानिकाकीटपतङ्गदंशदुष्टौषधीदोषनिवारणाय ।।१३९।। जिन द्रव्यों का क्वाथ बनाया जाता है उनकी भावना देने के फल के विषय में 'हारीत' का मतशिलाजीत के बाहर भाग में लगी हुई मिट्टी आदि की बनी हुई मलाई, कीट, पतङ्ग (फतिङ्गा), डाँस, मच्छर आदि तथा दुष्ट ओषधियों के दोष को दूर करने के लिये लोह के पात्र में शिलाजीत को देख कर नीम, गिलोय और जौ का क्वाथ एवं घी की यथोक्त रूप से भावना देवे ।।१३९।। ❖ सन्तानिका=तद्बहिःसंलग्नमृत्तिकादिमयी ।।१३९।। यहाँ 'सन्तानिका' पद का 'शिलाजीत के बाहरी भाग में लगी हुई मिट्टी आदि की बनी हुई मलाई' यह अर्थ समझना चाहिये ।।१३९।। एवं भावनां दत्त्वा संशोष्य केवलेन जलेन शोधनं कर्त्तव्यं तत्प्रकारमाहाग्निवेशः- उष्णे च काले रवितापयुक्ते व्यभ्रे निवाते समभूमिभागे । चत्वारि पात्राण्यसितायसानि न्यस्यातपे तत्र कृतावधानः ।।१४०।। शिलाजतु श्रेष्ठमवाप्य पात्रे प्रक्षिप्य तस्माद् द्विगुणञ्च तोयम् । उष्णं तदूर्ध्वं क्वथितञ्च दत्त्वा विशोधयेत्तन्मृदितं यथावत् ।।१४१।। ततस्तु यत्कृष्णमुपैति चोर्ध्वं सन्तानिकावद्रविरश्मितप्तम् । पात्रे तदन्यत्र ततो निदध्यात्तत्रापरं कोष्णजलं क्षिपेच्च ।।१४२।। पुनश्च तस्मादपरत्र पात्रे पश्चाच्च पात्रादपरत्र भूयः । यदा विशुद्धं जलमेवमूर्ध्वं कृष्णं समस्तं मलमेत्यधस्तात् । तदा त्यजेत्तत्सलिलं भलञ्च शिलाजतु स्याज्जलशुद्धमेवम् ।।१४३।। इस प्रकार भावना देकर और सुखा कर पश्चात् केवल जल से साफ करना चाहिये, उसका प्रकार 'अग्निवेश' महर्षि कहते हैं कि—ग्रीष्मऋतु में जब सूर्य का ताप (धूप) अधिक हो, आकाश मेघ से रहित दीख पड़ता हो तथा हवा न चलती हो ऐसे समय में किसी समतल भूमि पर धूप में काले लोहे के पात्र रख कर एक में उत्तम शिलाजीत सावधानी से लाकर रख दे और उसी में जो जलते-जलते आधा शेष रह गया हो ऐसा दूना गरम जल छोड़ दे तथा इसमें शिलाजीत को खूब मल कर मिला दे इसके बाद जो सूर्य की किरणों से तप कर ऊपर काली सी मलाई पड़ जावे उसे धीरे से उठा कर दूसरे लोहे के पात्र में रख कर पुनः उसमें गरम जल थोड़ा छोड़ दे फिर उसमें भी जब मलाई पड़ जाय तो उसे निकाल कर तीसरे लोहे के पात्र में रख कर पुनः उसमें भी गरम जल थोड़ा छोड़ दे, जब इसमें भी भलाई पड़ जाय तो उसे निकाल कर चौथे लोहे के पात्र में रख कर ऊपर से गरम जल कुछ छोड़ दे ऐसा करते-करते ऊपर केवल उत्तम निर्मल जल रह जाता है और काला मल नीचे बैठ जाता है। ऐसा जब हो जाय तब जल को निकाल कर फेंक दे और नीचे बैठा हुआ जो काला सा पदार्थ होता है वही जल से शुद्ध शिलाजीत होता है ।।१४०-१४३।। CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammnu. Digitized by S3 Foundation USA
९८८ भावप्रकाशस्य पूर्वखण्डे अथ शोधितशिलाजतुनो गुणानाह- शिलाजतु स्मृतं तिक्तं कटूष्णं कटुपाकि च । रसायनं योगवाहि श्लेष्ममेहाश्मशर्कराः ।। १४४ ।। मूत्रकृच्छ्रं क्षयं श्वासं शोधमर्शसि पाण्डुताम् । वातरक्तं तथा कुष्ठपस्मारोदरं हरेत् ।। १४५ ।। शुद्ध किये हुये शिलाजीत के गुण-शोधित शिलाजीत तिक्त तथा कटु रसयुक्त, उष्ण, विपाक में कटुरसयुक्त, रसायन, योगवाही और कफ, मेहरोग, पथरी, शर्करा, मूत्रकृच्छ्र, क्षय, श्वास, शोथ, बवासीर, पाण्डुरोग, वातरक्त, कुष्ठ, मिर्गी तथा उदर रोग को दूर करने वाला होता है ॥१४४-१४५॥ अथ रसस्य शोधनविधिमाह । तत्रादौ स्वेदनमाह- नानाधान्यैर्यथाप्राप्तैस्तुषवजैर्जलान्वितैः । मृद्भाण्डं पूरितं रक्षेद्यावदम्लत्वमाप्नुयात् ।। १४६ ।। तन्मध्ये भृङ्गराङ् मुण्डी विष्णुकान्ता पुनर्नवा । मीनाक्षी चैव सर्पाक्षी सहदेवी शतावरी ।। त्रिफला गिरिकर्णी च हंसपादी च चित्रकम् । समूलं कुट्टयित्वा तु यथालाभं विनिक्षिपेत् ।। रस के शोधने की विधियों में प्रथम स्वेदन की विधि-एक मिट्टी के पात्र में जितने धान्य उस समय मिल सकें उन सबों की भूसी अलग कर केवल धान्यों को रखकर ऊपर से जल भी पूर्णरूप से भरकर तक रख दे जब तक खट्टापन न आजावे अर्थात् कांजी न बन जाय पश्चात् उस कांजी युक्त पात्र में भांगरा, गोरखमुण्डी, कोयल, पुनर्नवा, मछेछी, सरहटी, सहदेई, शतावर, त्रिफला (हरड़ बहेरा, आँवला), सफेद फूल की कोयल, हंसराज और चीता इन सबों को जहाँ तक मिल सके वहाँ तक जड़ के सहित ही कूट कर डाल दे ॥१४६-१४८॥ ❖ विष्णुकान्ता गिरिकर्णी चापराजितैव श्वेतनीलपुष्पभेदात् ।। १४६-१४८ ।। यहाँ 'विष्णुकान्ता तथा गिरिकर्णी' इन दोनों से श्वेत तथा नील फूलों के भेद से कोई दो प्रकार की अपराजिता (कोयल) होती है उसी का ग्रहण करना चाहिये ॥१४६-१४८॥ पूर्वाम्लभाण्डमध्ये तु धान्याम्लकमिदं स्मृतम् । स्वेदनादिषु सर्वत्र रसराजस्य योजयेत् । अत्यम्लमारनालं वा तदभावे प्रयोजयेत् ॥१४९॥ पूर्वोक्त कांजी युक्त पात्र में उक्त ओषधियों के छोड़ने से उस कांजी का नाम 'धान्याम्लक' होता है। उसका पारा के स्वेदन आदि कार्यों में सर्वत्र प्रयोग किया जाता है। धान्याम्ल के अभाव में अत्यन्त खट्टी कांजी का भी प्रयोग किया जाता है ॥१४९॥ ❖ तदभावे=धान्याम्लाभावे ।। १४९ ।। यहाँ 'तदभावे' पद का 'धान्याम्ल के अभाव में' यह अर्थ करना चाहिये ॥१४९॥ त्र्यूषणं लवणं राखी रजनी त्रिफलाऽऽर्द्रकम् । महाबला नागबला मेघनादः पुनर्नवा ।। १५० ।। मेषशृङ्गी चित्रकञ्च नवसारं समं समम् । एतत्समस्तं व्यस्तं वा पूर्वाम्लेनैव पेषयेत् ।। १५१ ।। प्रलिम्पेत् तेन कल्केन वस्त्रमङ्गुलमात्रकम् ।। १५२ ।। तन्मध्ये निक्षेपेत्सूतं बद्ध्वा तत्त्रिदिनं पचेत् । दोलायन्त्रेऽम्लसंयुक्ते जायते स्वेदितो रसः ।। इसके बाद सोंठ, पीपर, मिर्च, सेंधा नमक, राई, हरदी, त्रिफला (हरड़, बहेरा, आँवला), अदरक, महाबला (सहदेई, नागबला (गंगेरन), चौलाई (शाक), पुनर्नवा, मेढ़ाशृङ्गी, चीता, नवसादर इन सबों को समान भाग लेकर एकत्र अथवा अलग-अलग उक्त धान्याम्लक से पीस कर कल्क सा बना ले और उसी कल्क से एक वस्त्र के ऊपर एक अंगुल
अथ तृतीयं धात्वादिशोधनमारणविधिप्रकरणम्. १८९ मोटा लेप करके उसी के अन्दर पारे को बाँध कर कांजी भरे हुये दोलायन्त्र में लटका कर तीन दिन तक पकावे, ऐसा करने से पारे का स्वेदन होता है ॥१५०-१५३॥ ❖ मेघनादः= 'चौलाई' इति शाकविशेषः । मेषशृङ्गी (मेढ़ाशृङ्गी), तदभावे 'कर्कटशृङ्गी' ग्राह्या । नवसारं=नवसादरम् ।।१५०-१५३।। यहाँ 'मेघनाद' पद का 'चौलाई (शाकविशेष)' तथा 'मेषशृङ्गी' पद का 'मेढ़ाशृङ्गी' अर्थ समझना चाहिये। इसके अभाव में 'काकड़ाशिंगी' लेना चाहिये एवं 'नवसारम्' पद से 'नवसादर' समझना चाहिये ॥१५०-१५३॥ अन्यच्च- मूलकानलसिन्धूत्थत्र्यूषणार्द्रकराजिकाः । रसस्य षोडशांशेन द्रव्यं युञ्ज्यात् पृथक्पृथक् ।। द्रव्येष्वनुक्तमानेषु मतं मानमितं बुधैः । पट्टावृतेषु चैतेषु सूतं प्रक्षिप्य काञ्जिके ।।१५५।। स्वेदयेद्दिनमेकञ्च दोलायन्त्रेण बुद्धिमान् । स्वेदात्तीव्रो भवेत्सूतौ मर्दनाच्च सुनिर्मलः ।। १५६ ।। अन्य प्रकार - मूली, चीता, सेंधा नमक, सोंठ, पीपर, मिर्च, अदरख और राई इनमें से प्रत्येक पदार्थ पारे से सोलहवाँ भाग लेकर कल्क (चटनी) के समान बना डाले, 'जहाँ द्रव्यों का मान (तौल) न लिखा हो वहाँ जितने मान में द्रव्य लेने से कार्य ठीक हो उतना लेना चाहिये' यह परिभाषा सर्वत्र समझनी चाहिये, विशेषतः रसकर्म में तो अवश्य ही । पश्चात् उक्त कल्क का एक वस्त्र के ऊपर लेप करके उसके अन्दर पारा को रख कर और पोटली बना कर एक पात्र में कांजी रख कर उसी में दोला की भाँति उक्त पोटली को लटका कर दोलायन्त्र से एक दिन तक बुद्धिमान वैद्य स्वेदन करे । इस प्रकार स्वेदन कर्म करने से पारा तीव्र हो जाता है तथा आगे लिखी हुई रीति से मर्दन करने से अति निर्मल हो जाता है ।।१५४-१५६।। ❖ मूलकम् 'मुरई, मूली' वा इति लोके । अनलं=चित्रकम् । त्र्यूषणं=त्रिकुट । राजिका (राई) ।।१५४- १५६।। यहाँ 'मूलकम्' पद से 'मुरई या मूली' इस नाम से लोकप्रसिद्ध वस्तु तथा 'अनल' से चित्रक (चीता)' । 'त्र्यूषणम्' से 'त्रिकटु (सोंठ, पीपर, मिर्च)' और 'राजिका' से 'राई' का ग्रहण करना चाहिये ॥१५४-१५६॥ अथ मर्दनविधिमाह- इष्टिकाचूर्णचूर्णाभ्यामादौ मर्द्यो रसस्ततः । दध्ना गुडेन सिन्धूत्थराजिकागृहधूमकैः ।।१५७।। मर्दन की विधि स्वेदन के पश्चात् ईंट का चूर्ण तथा चूना से प्रथम पारे का खूब मर्दन करे उसके बाद जल से धोकर दही, गुड़, सेंधा नमक, राई और घर का धूआँ इन सबों से अलग-अलग क्रम से मर्दन करे ।।१५७।। अन्यच्च- कुमारिकाचित्रकरक्तसर्षपैः कृतैः कषायैर्बृहतीविमिश्रितैः । फलत्रिकेणापि विमर्दितो रसो दिनत्रयं सर्वमलैर्विमुच्यते ।। १५८ ।। अथवा—घीकुवार, चीता, लाल सरसों, कटेरी इनके क्वाथ से तथा त्रिफला के क्वाथ से तीन दिन तक पारे का खूब मर्दन करने से वह सम्पूर्ण मलों से छूटकर स्वच्छ हो जाता है ॥१५८॥ अथ मूर्च्छनविधिमाह- त्र्यूषणत्रिफलाबन्ध्याकन्दैः क्षुद्राद्वयान्वितैः । चित्रकोर्णानिशाक्षारकन्याऽर्ककनकद्रवैः ।।१५९।। सूतं कृतेन यूषेण वारान्सप्त विमर्दयेत् । इत्थं संमूर्च्छितः सूतस्त्यजेत्सप्तापि कञ्चुकान् ।।१६०।।
९९० भावप्रकाशस्य पूर्वखण्डे मूर्च्छन विधि-सोंठ, पीपल, मिर्च, हरड़, बहेड़ा, आँवला, बाँझककोड़े का कन्द, छोटी कटेरी, बड़ी कटेरी, चीता, भेड़ की ऊन, हरदी, जवाखार, घीकुवार, आक के पत्तों का रस, धतूरे के पत्तों का रस इन सबों के क्वाथ से सात बार मर्दन करने से पारा मूर्च्छित हो जाता है तथा सात प्रकार के कञ्चुक दोषों से रहित हो जाता है ॥१५९-१६०॥ ❖ बन्ध्याकन्दः=बान्दु खेखसाकन्दः (बाँझ काँकूड)। (छोटीकटाई, बड़ी कटाई)। ऊर्णा (मेषकी ऊन)। निशा=हरिद्रा। क्षारः=यवक्षारः। कन्या=कुमारिका। अर्कः=अर्कपत्ररसः। कनकद्रवः=धत्तूर- पत्ररसः ॥१५९-१६०॥ यहाँ 'बन्ध्याकन्द' से 'बाँझककोड़े का कन्द' । 'क्षुद्राद्वयम्' से 'छोटी तथा बड़ी कटेरी' । 'ऊर्णा' से 'मेष (भेड़) की ऊन' । 'निशा' से 'हरदी' । 'क्षार' से 'जवाखार' । 'कन्या' से 'घीकुवार' । 'अर्क' 'आक' से 'आक के पत्तों का रस' । 'कनकद्रव' से 'धतूरे के पत्तों का रस' समझना चाहिये ॥ अथोर्ध्वपातनविधिमाह- मयूरग्रीवताप्याभ्यां नष्टपिष्टीकृतस्य च। यन्त्रे विद्याधरे कुर्याद्रसेन्द्रस्योर्ध्वपातनम् ॥१६१॥ ऊर्ध्वपातन विधि-नीलाथोथा तथा सोनामाखी इन दोनों के साथ पारे को मिलाकर घीकुवार के रस के साथ तब खरल करे जब तक पारा अलग न देख पड़े। पश्चात् उसे डमरूयन्त्र में रख कर भाफ द्वारा पारे को उड़ा ले। इसी को पारे का ऊर्ध्वपातन (ऊपर उड़ाना) कहते हैं ॥१६१॥ ❖ ताप्यम्=सुवर्णमाक्षिकम्। नष्टपिष्टीकृतस्य=कुमारिकाद्रवयोगेन तावन्मर्दनं कर्तव्यं यावत् पारदः पृथङ् न दृश्यत इत्यर्थः । विद्याधरयन्त्रे=डमरूयन्त्रे ॥१६१॥ यहाँ 'ताप्य' पद का 'सोनामाखी' तथा 'नष्टपिष्टीकृतस्य' पद का 'घीकुमार के रस के साथ तब तक खरल करे जब तक पारा अलग न देख पड़े' एवं 'विद्याधरयन्त्र' पद का 'डमरूयन्त्र' अर्थ समझना चाहिये ॥१६१॥ अथाधःपातनविधिमाह- त्रिफलाशिग्रुशिखिभिर्लवणासुरिसंयुतैः । नष्टपिष्टं रसं कृत्वा लेपयेदूर्ध्वभाजनम् ॥१६२॥ ततो दीप्तैरधः पातमुपलैस्तस्य कारयेत्। यन्त्रे भूधरसंज्ञे तु ततः सूतो विशुद्ध्यति ॥१६३॥ स्वेदनादिक्रियाभिस्तु शोधितोऽसौ यदा भवेत्। तदा कार्याणि कुरुते प्रयोज्यः सर्वकर्मसु ॥१६४॥ अधःपातन विधि-त्रिफला (हरड़, बहेरा, आँवला), सहिजना, चीता, सेंधा नमक और राई इन सबों को पारे के साथ घीकुवार के रस में तब तक खरल करे जब तक पारा अलग न दिखाई पड़े। पश्चात् उन सबों को ऊपर की हाँड़ी में लेप कर भूधरयन्त्र में रख ऊपर से दहकते हुए उपलों को रख कर पारे को नीचे की हाँड़ी में गिरावे। इसी को पारे का अधः पातन कहते हैं। इससे पारा शुद्ध हो जाता है और स्वेदन आदि (स्वेदन, मूर्च्छन, ऊर्ध्वपातन, अधःपातन) क्रियाओं से जब पारा का शोधन हो जाय तब पारे को सब कामों में लेवे। अन्यथा वह अनिष्टकर होता है ॥१६२-१६४॥ अथ मुख्यदोषहरणार्थं शोधनविधिणमाह- गृहकन्या हरति मलं त्रिफलाऽग्निं चित्रको विषं हन्ति। तस्मादेभिर्मिश्रैर्वारान् संमूर्च्छयेत्सप्त ।। पारा के मुख्य दोषों को दूर करने की विधि-घीकुवार-पारा के मलदोष को दूर करता है, त्रिफला- अग्निदोष को तथा चीता-विषदोष को दूर करता है। अतः इन सबों को एकत्र कर इनमें ७ बार पारे को खरल कर मूर्च्छित करे अर्थात् एक बार का डाला रस जब खरल करते-करते सूख जाय तब पुनः रस डालकर खरल करे। इस भाँति ७ बार करे ॥१६५॥
अथ तृतीयं धात्वादिशोधनमारणविधिप्रकरणम् ९९१ अथ सर्वदोषहरसंक्षिप्तशोधनविधिमाह- कुमारिकाचित्रकरक्तसर्षपैः कृतैः कषायैर्बृहतीविमिश्रितैः । फलत्रिकेणापि विमर्दितो रसो दिनत्रयं सर्वमलैर्विमुच्यते ।। १६६ ।। कुमार्या च निशाचूर्णेर्दिनं सूतं विमर्दयेत् । एवं कदर्थितः सूतः षण्ढो भवति निश्चितम् ।। १६७ ।। बह्वौषधिकषायेण स्वेदितः स बली भवेत् । सर्पाक्षीचिञ्चिकाबन्ध्याभृङ्गाब्दैः स्वेदितो बली । ततः स पावकद्रावैः स्विन्नः स्यादतिदीप्तिमान् ।। १६८ ।। पारा के सम्पूर्ण दोषों को दूर करने के लिये संक्षिप्त शोधन विधि-घीकुवार, चीता, लाल सरसों और कटेरी के क्वाथ के साथ तीन दिन तक खरल करने से तथा त्रिफला के क्वाथ में भी तीन दिन तक खरल करने से पारा सब मलों से रहित हो जाता है । तत्पश्चात् घीकुवार का रस और हरदी के चूर्ण के साथ एक दिन खरल करने से पारा निश्चय नपुंसक हो जाता है । उसके बाद बहुत सी ओषधियों के क्वाथ से पारे का स्वेदन करने से वह बली हो जाता है जैसे- नागफनी, इमली, बाँझककोड़ा, भाँगरा और नागरमोथा इन सबों के क्वाथ से दोलायन्त्र में रख कर स्वेदन करने से पारा बली हो जाता है । चीता के क्वाथ से पुनः स्वेदन करने से पारा अत्यन्त दीप्तिमान् हो जाता है ।। १६६-१६८ ।। ❖ सर्पाक्षी (नागफनी), चिञ्चिका (इमली), बन्ध्या (बाँझ ककोड़ा), भृङ्गः=भृङ्गराज, अब्दः=मुस्ता, पावकः=चित्रकम् ।। १६६-१६८ ।। यहाँ 'सर्पाक्षी' से 'नागफनी' । 'चिञ्चिका' से 'इमली' । 'बन्ध्या' से 'बाँझ ककोड़ा' । 'भृङ्ग' से 'भृङ्गराज (भाँगरा)' । 'अब्द' से 'मुस्ता (नागरमोथा) और 'पावक' से 'चीता' का बोध करना चाहिये ।। १६६-१६८ ।। अथ पारदस्य मारणविधिमाह- धूमसारं रसं तोरीं गन्धकं नवसादरम् । यामैकं मर्दयेदम्लैर्भागं कृत्वा समं समम् ।। १६९ ।। काचकूप्यां विनिक्षिप्य ताञ्च मृद्वस्त्रमुद्रया । विलिप्य परितो वक्त्रे मुद्रां दत्त्वा विशोषयेत् ।। १७० ।। अधः सच्छिद्रपिठरीमध्ये कूपीं निवेशयेत् । पिठरीं बालुकापूरैर्भृत्वा चाकूपिकागलम् ।। १७१ ।। निवेश्य चुल्ल्यां तदधो वह्निं कुर्याच्छनैः शनैः । तस्मादत्यधिकं किञ्चित्पावकं ज्वालयेत्क्रमात् ।। १७२ ।। एवं द्वादशभिर्यामैर्म्रियते रस उत्तमः । स्फोटयेत्स्वाङ्गशीतं तमूर्ध्वगं गन्धकं त्यजेत् ।। १७३ ।। अधःस्थञ्च मृतं सूतं गृह्णीयातं तु मात्रया । यथोचितानुपानेन सर्वकर्मसु योजयेत् ।। १७४ ।। पारा के मारने की विधि-घर का धुआँ, पारा, फिटकिरी, गन्धक, नवसादर इन सबों को समान भाग लेकर अम्ल पदार्थ नींबू आदि के रस में एक प्रहर (३ घण्टे) तक खरल करे । तत्पश्चात् काँच की कूपी के चारो तरफ कपरोटी (मिट्टी लिपटे वस्त्र द्वारा लपेट) कर और उसे धूप में रख कर सुखा डाले । फिर उसी काँच की कूपी में उपर्युक्त खरल किये द्रव्यों को रख कर कूपी का मुख बन्द करके सुखा लेने के बाद एक मिट्टी के पात्र के तल भाग में छिद्र करके उसी छिद्र के ऊपर उक्त कूपी को रख उसके गले तक उक्त पात्र में बालू भर कर उसे चूल्हे पर रख दे और उसके नीचे धीरे-धीरे आँच अधिक करता जाय अर्थात् प्रथम मृदु पुनः मध्यम तदनन्तर तीव्र आँच करे । इस तरह १२ प्रहर (३६ घण्टे) तक आँच देने से उत्तम रीति से पारा भर जाता है । पुनः स्वयं शीतल हो जाने पर सावधानी से कूपी को फोड़ कर ऊपर लगे हुये गन्धक को छोड़ कर शेष नीचे स्थित मरे हुये पारे को निकाल ले और उसे मात्रानुसार यथोचित अनुपान से जहाँ-जहाँ आवश्यकता हो वहाँ-वहाँ प्रयोग में लेवे ।।१६९-१७४।। अथ पारदमारणेऽपरं विधिमाह- अपामार्गस्य बीजानां मूषायुग्मं प्रकल्पयेत् । तत्सम्पुटे क्षिपेत्सूतं मलयूदुग्धमिश्रितम् ।। १७५ ।। द्रोणपुष्पीप्रसूनानि विडङ्गमरिमेदकः । एतच्चूर्णमध्यश्चोर्ध्वं दत्त्वा मुद्रा प्रदीयते ।। १७६ ।। तद्गोलं स्थापयेत्सम्यङ् मृन्मूषासम्पुटे पचेत् ।। १७७ ।। एवमेकपुटेनैव सूतकं भस्म जायते । तत्प्रयोज्यं यथास्थाने यथामात्रं यथाविधि ।। १७८ ।। CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammnu. Digitized by S3 Foundation USA
१९२ भावप्रकाशस्य पूर्वखण्डे पारा मारने की दूसरी विधि—प्रथम चिचिड़ा के बीजों को पीस कर उसके दो मूषे (घरिया) बना ले, फिर पारा को कठूमर (कठगूलर) के दूध में खूब खरल करके उसे उक्त मूषा के सम्पुट के अन्दर नीचे गूमा के फूल, बायविडङ्ग अरिमेद (दुर्गन्ध खैर) इन सबों का चूर्ण रख कर उसके ऊपर रख कर पुनः उसी चूर्ण को ऊपर से भी रखकर मूषा का मुख बन्द कर दे। पुनः एक दूसरे मिट्टी के मूषा के अन्दर उक्त मूषा के सम्पुट को रख कर मुख बन्द कर तथा सुखा कर अग्नि की पुट देवे। इस तरह एक ही पुट में पारा भस्म हो जाता है। फिर जब जहाँ आवश्यकता हो वहाँ विधि के अनुसार यथोचित मात्रा में उस भस्म का प्रयोग करे ॥१७५-१७८॥ ❖ मलयूः=काकोडुम्बरिका ।।१७५-१७८।। यहाँ 'मलयू' पद से 'कठूमर' का बोध करना चाहिये ॥१७५-१७८॥ अथ पारदमारणे तृतीयं विधिमाह- काकोडुम्बरिकादुग्धै रसं किञ्चिद्विमर्दयेत् । तद्दुग्धघृष्टहिङ्गोश्च मूषायुग्मं प्रकल्पयेत् ।।१७९।। क्षिप्त्वा तत्संुपुटे सूतं तत्र मुद्रां प्रदापयेत् । धृत्वा तद् गोलकं प्राज्ञो मृन्मूषासम्पुटेऽधिके ।। पचेद् गजपुटेनैव सूतकं याति भस्मताम् ।।१८०।। पारा मारने की तीसरी विधि—प्रथम कठूमर के दूध के साथ पारे को किञ्चित् खरल कर ले पश्चात् उसी के दूध के साथ हींग को पीस कर उसकी दो मूषा बना कर उसी के सम्पुट के अन्दर उक्त पारे को रख कर सन्धि भली-भाँति से बन्द कर दे फिर एक दूसरे मिट्टी के बने मूषे (घरिया) के सम्पुट के अन्दर उक्त मूषा-सम्पुट को रखकर कपड़मिट्टी द्वारा मुख दृढ़ता से बन्द कर तथा सुखाकर गजपुट की आग में रख कर पकावे। इस भाँति एक ही पुट देने से पारा भस्म हो जाता है ॥१७९-१८०॥ अथ पारदमारणे चतुर्थ विधिमाह- नागवल्लीरसैर्घृष्टः कर्कोटीकन्दगर्भितः । मृन्मूषासम्पुटे पक्वं सूतो यात्येव भस्मताम् ।।१८१।। पारा मारने की चौथी विधि—प्रथम पारे को पान के रस में खरल कर ले पश्चात् उसे बाँझककोड़ा के कन्द के अन्दर रख दे पुनः उक्त कन्द को मिट्टी के मूषा (घरिया) के सम्पुट के अन्दर रखकर कपड़मिट्टी से मुख बन्द कर सुखा दे पश्चात् गजपुट की आँच में पका डाले। इस भाँति एक ही पुट में पारा भस्म हो जाता है ॥१८१॥ अथ रसकर्पूरनिर्माणविधिमाह- तत्र पारदस्य संक्षिप्तं शोधनं कर्त्तव्यम्। शुद्धसूतसमं कुर्यात्प्रत्येकं गैरिकं सुधीः । इष्टिकां खटिकां तद्वत्स्फटिकां सिन्धुजन्म च ।।१८२।। वल्मीकं क्षारलवणं भाण्डरञ्जकमृत्तिकाम् । सर्वाण्येतानि संचूर्ण्य वाससा चापि शोधयेत् ।।१८३।। एभिश्चूर्णैर्युतं सूतं यावद्यामं विमर्दयेत् । तच्चूर्णसहितं सूतं स्थालमध्ये परिक्षिपेत् ।।१८४।। तस्याः स्थाल्या मुखे स्थालीमपरां धारयेत्समाम् । सवस्त्रकुट्टितमृदा मुद्रयेदनयोर्मुखम् ।।१८५।। संशोष्य मुद्रयेद्भूयो भूयः संशोष्य मुद्रयेत् । सम्यग्विशोष्य मुद्रां तां स्थालीं चुल्ल्यां विधारयेत् ।।१८६।। अग्निं निरन्तरं दद्याद्यावद्दिनचतुष्टयम् । अङ्गारोपरि तद्यन्त्रं रक्षेद्यत्रादहर्निशम् ।।१८७।। शनैरुद्घाटयेद्यन्त्रमूर्ध्वस्थालीगतं रसम् । कर्पूरवत्सुविमलं गृह्णीयाद् गुणवत्तरम् ।।१८८।। तद्देवकुसुमचन्दनकस्तूरीकुङ्कुमैर्युक्तम् । खादन् हरति फिरङ्गं व्याधिं सोपद्रवं सपदि ।।१८९।। बिन्दति वह्नेर्दीप्ति पुष्टिं वीर्य बलं विपुलम् । रमयति रमणीशतकं रसकर्पूरस्य सेवकः सततम् ।।१८०।। CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA