भारतकोश
भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)

Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary

आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा

DevanagariHindipublished1,167 पृष्ठ

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१८४ भावप्रकाशस्य पूर्वखण्डे लोहा के मारण विधि—शुद्ध किये हुये लोहे के चूर्ण को पातालगरुडी के रस में खूब खरल करके शराव के संपुट में रख गजपुट की आग में पकावे, पुनः शीतल होने पर निकाल कर उक्त रस से मर्दन कर पुनः गजपुट की आग में पकावे इस भाँति ३ बार गजपुट की आग में पकाने के बाद पुनः घीकुवार के रस में मर्दन कर ३ बार गजपुट में पकावे इसके बाद कुठारच्छिन्निका (कोरैया) के रस में मर्दन कर ६ बार गजपुट की आग में पकाने से लोहा का मारण होता है। अन्यच्च- क्षिपेच्च द्वादशांशेन दरदं तीक्ष्णचूर्णतः । सदयेत्कन्यकाद्रावैर्यामयुग्मं ततः पुटेत् । एवं सप्तपुटैर्मृत्युं लौहचूर्णमवाप्नुयात् ॥ ९४॥ लौह मारण का दूसरा प्रकार—लोहे के चूर्ण में बारहवाँ भाग सिंगरफ डाल कर घीकुवार के रस में २ प्रहर (६ घंटे) तक खूब खरल करे, उसके बाद गजपुट में रख फूँक दे इस प्रकार सातबार फूँकने से लोहा का मारण हो जाता है ॥९४॥ लोहमारणस्य तृतीयं विधिमाह- सत्योऽनुभूतो योगेन्द्रैः क्रमोऽन्यो लोहमारणे । कथ्यते रामराजेन कौतूहलधियाऽधुनाः ॥ ९५॥ सूतकाद् द्विगुणं गन्धं दत्त्वा कुर्याच्च कज्जलीम् । द्वयोः समं लौहचूर्ण मर्दयेत्कन्यकाद्रवैः ॥ ९६॥ यामयुग्मं ततः पिण्डं कृत्वा ताम्रस्य पात्रके । घर्मे धृत्वा रूवूकस्य पत्रैराच्छादयेद् बुधः ॥ ९७॥ यामत्रयाद्बवेदुष्णं धान्यराशौ न्यसेत्ततः । दत्त्वोपरि शरावं तु त्रिदिनान्ते समुद्धरेत् ॥ ९८॥ पिष्ट्वा च गालयेद्वस्त्रादेवं वारितरं भवेत् । दाडिमस्य दलं पिष्ट्वा तच्चतुर्गुणवारिणा ॥ ९९॥ तद्रसेनायसं चूर्ण शश्नीय प्लावयेदिति । आतपे शोषयेत्तञ्च पुटेदेवं पुनः पुनः ॥ १००॥ एकविंशतिवारैस्तन्म्रियते नात्र संशयः । एवं सर्वाणि लोहानि स्वर्णादीन्यपि मारयेत् ॥ १०१॥ लोहामारण की तीसरी विधि—लोहा के मारण करने में बड़े-बड़े योगियों के द्वारा सचमुच अनुभव किया हुआ एक विधि और है जिसे कि इस समय कौतुकबुद्धि से रामराज नामक वैद्य कह रहे हैं। पारा से दूना गन्धक लेकर उसकी कज्जली बना ले तत्पश्चात् उस कज्जली में उसके बराबर शुद्ध लोहे का चूर्ण मिलाकर घीकुवार के रस में २ प्रहर (६ घंटे) तक खरल करे उसके बाद उन सबों का एक पिण्ड बना कर तांबे के बर्तन में रख एरण्ड के पत्ते से उसे ढक कर घाम (धूप) में २ प्रहर (६ घंटे) तक रख दे फिर धूप से गर्म हुये उसके ऊपर पत्तों को हटा कर शराव रखकर मुख बन्द कर धान्य की राशि के अन्दर गाड़ दे, जब तीन दिन हो जाय तब निकाल कर उक्त पिण्ड को पीस कर कपड़े से छान ले। यह लोहे का चूर्ण ऐसा हल्का हो जाता है कि जल पर तैरने लगता है। इसके बाद चूर्ण को चौगुने जल में पिसे हुए अनार के पत्तों के रस से खूब भिगोकर धूप में सुखावै तत्पश्चात् गजपुट में फूँक दे। शीतल हो जाने पर निकाल कर पुनः उक्त रस में भिगो कर धूप में सुखाकर गजपुट में फूँके। इस तरह २१ बार पुट में रखकर फूँकने से सभी प्रकार के लोहा तथा सोना आदि भी मर जाते हैं। इसमें कोई संशय नहीं॥ अथ मारितलौहस्य गुणानाह- लौहं तिक्तं सरं शीतं कषायं मधुरं गुरु । रूक्षं वयस्यं चक्षुष्यं लेखनं वातलं जयेत् ॥ १०२॥ कफं पित्तं गरं शूलं शोफार्शःप्लीहपाण्डुताः भेदोमेहकृमीन् कुष्ठं तत्किटं तद्वदेव हि ॥ १०३॥ मारे हुए लोहे के गुण—मारा हुआ लोहा-तिक्त, कषाय तथा मधुररसयुक्त, सारक, शीतल, गुरु, रूक्ष, अवस्था को स्थिर रखने वाला, नेत्रों के लिये हितकर, लेखन, वातकारक एवं कफ, पित्त, गरसंज्ञक विष, शूल, शोथ, बवासीर, प्लीहा, पाण्डु, मेद, प्रमेह, क्रिमि तथा कुष्ठ को नष्ट करने वाला होता है। इसी प्रकार लोहे के कीट (मण्डूर) में भी ये सब गुण रहते हैं ॥१०२-१०३॥ CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmmu. Digitized by S3 Foundation USA