भावप्रकाश: चिकित्सा भाग (भावमिश्र - विद्योतिनी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सम्पूर्ण कायचिकित्सा)
Bhavaprakasha Chikitsa Bhaga with Vidyotini Commentary
आचार्य भावमिश्र (टीकाकार: पं. ब्रह्मशंकर मिश्र एवं रूपलालजी वैश्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअथ तृतीयं धात्वादिशोधनमारणविधिप्रकरणम् १८३ अथ लौहभस्मभक्षणे मात्रामाह- गुञ्जामेकां समारभ्य यावत्स्युर्नवरक्तिकाः । तावल्लोहं समश्नीयाद्यथादोषानलं नरः ।।१०४।। लौहभस्म खाने की मात्रा-एक रत्ती से आरम्भ कर बढ़ाते-बढ़ाते नौ रत्ती तक मनुष्य दोष तथा अग्नि के अनुसार विचार कर यथायोग्य लौह भस्म का सेवन करे ।।१०४।। अथ लौहसेवनसमये वर्जनीयद्रव्याण्याह- कूष्माण्डं तिलतैलं च भाषान्नं राजिकां तथा । मद्यमम्लरसञ्चैव वर्जयेल्लोहसेवकः ।।१०५।। लौहभस्म खाने के समय त्याग करने योग्य द्रव्य-पेठा, तिल का तेल, उड़द, राई, मद्य, अम्लरस युक्त पदार्थ (इमली आदि) इन सबों का लौहभस्म खाने वाला व्यक्ति परित्याग कर देवे । अथ सर्वधातूनां मारणे साधारणविधिमाह- शिलागन्धार्कदुग्धाक्तः स्वर्णाद्याः सर्वधातवः । म्रियन्ते द्वादशपुटैः सत्यं गुरुवचो यथा ।। सब धातुओं के मारने की साधारण विधि-सोना आदि सभी धातु यदि मैनसिल तथा गन्धक को आक के दूध में महीन पीसकर और उसी कल्क से लपेट कर गजपुट में रख कर फूंक दिये जावें और शीतल होने पर पुनः उक्त कल्क से लपेट कर फूँके जावें तो इसी भाँति १२ बार फूँकने से भर जाते हैं । जैसे सद्गुरु का वचन सत्य होता है वैसे ही यह सत्य है ।।१०६।। अथोपधातूनां मारणप्रकारमाह- तत्राशुद्धस्वर्णमाक्षिकस्य दोषानाह- मन्दानलत्वं बलहानिमुग्रां विष्टम्भितां नेत्रगदान् सकुष्ठान् । भालां तथैव व्रणपूर्विकाञ्च कुर्यादशुद्धं खलु माक्षिकञ्च ।।१०७।। अशुद्ध 'स्वर्णमाक्षिक' (सोनामाखी) के दोष—अशुद्ध सोनामाखी-अग्नि की मन्दता, बल की हानि, अत्यन्त विष्टम्भ, नेत्रसम्बन्धी रोग, कुष्ठ, गण्डमाला तथा अनेक प्रकार के व्रणों को उत्पन्न करने वाली होती है ।।१०७।। अथ स्वर्णमाक्षिकस्य शोधनविधिमाह- माक्षिकस्य त्रयो भागा भागैकं सैन्धवस्य च । मातुलुङ्गद्रवैर्वाऽथ जम्बीरस्य द्रवैः पचेत् ।।१०८।। चालयेल्लौहजे पात्रे यावत्पात्रं सुलोहितम् । भवेत्ततस्तु संशुद्धिं स्वर्णमाक्षिकमृच्छति ।।१०९।। सोनामाखी शोधने की विधि-३ भाग सोनामाखी और एक भाग सेन्धानमक लेकर दोनों की बिजौरा अथवा जमीरी नींबू के रस के साथ लोहे के पात्र में रख कर पकावे और तब तक लोहे की करछुली से चलाता रहे जब तक लोहे का पात्र अच्छी तरह लाल न हो जाय । तदुपरान्त उतार कर सोनामाखी को अलग कर ले । ऐसा करने से सोनामाखी शुद्ध हो जाती है ।।१०८-१०९।। अथ स्वर्णमाक्षिकस्य मारणविधिमाह- कुलत्थस्य कषायेण घृष्ट्वा तैलेन वा पुटेत् । तक्रेण वाऽऽजमूत्रेण म्रियते स्वर्णभाक्षिकम् ।। सोनामाखी मारने की विधि-शुद्ध सोनामाखी को कुलथी के क्वाथ, तिल का तेल, तक्र (छाछ) या बकरे के मूत्र में घिस (खरल) कर अग्नि की पुट देवे तो वह (सोनामाखी) मर जाती है ।।११०।। CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA